Sunday, April 28, 2013

संविधान को पढ़े और समझे – अरूणा रॅाय


भीलवाड़ा - आज अम्बेडकर जयंती पर एक अनूठे कार्यक्रम में अम्बेडकर के अधूरे सपनों पर विभिन्न दलों के लोगों ने मिलकर विचार रखा। सामाजिक क्षेत्र के अलावा वामपंथी नेता, डी.राजा, कांग्रेस के स्थानीय विधायक रामलाल जाट तथा भाजपा सांसद अर्जुनराम मेघवाल इन तीनों ने मिलकर इस बात को दोहराया कि अम्बेडकर ने हमको महत्वपूर्ण संविधान तो दिया है लेकिन उस संविधान को देते समय ये चेतावनी भी दी कि वोट से हमें केवल राजनीतिक बराबरी मिली है, सामाजिक और आर्थिक बराबरी की लड़ाई अभी भी बाकी है। इस बराबरी को प्राप्त करने का संघर्ष बेहद जरूरी है। इसके साथ-साथ सभी वक्ताओं ने शिक्षा पर जोर दिया।
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समारोह को सम्बोधित करते कामरेड डी. राजा
भाकपा सांसद कामरेड डी. राजा ने कहा कि मैं बचपन से अम्बेडकर के विचारों से सीखते रहा हूं, मैं एक दलित खेतीहर मजदूर पैदा हुआ, शिक्षा की वजह से ही मेरा परिवार आगे बढ़ पाया और वह हिम्मत हमें अम्बेडकर के विचारों से प्राप्त हुई।
उन्होंने कहा कि वो भीलवाड़ा में आकर कबीर-फुले-अम्बेडकर चेतना यात्रा से बहुत खुश हुये, क्योंकि इस याख ने आर्थिक एवं सामाजिक गैर बराबरी के संघर्षों को एकजुट किया है। यात्रा के लाल झण्डे जिन पर ‘जय भीम’ लिखा हुआ है, उस पर टिप्पणी करते हुये उन्होंने कहा कि मैंने यह अपनी जिन्दगी में पहली बार देखा है और मैं इससे अभिभूत हूं। उन्होंने माना कि अम्बेडकर ने बुद्ध और कार्लमाक्र्स के विचारों को एक किया है और आज इस झण्डे को देखकर मेरे लिये अम्बेडकर जयंती में भीलवाड़ा आना बहुत सार्थक रहा। उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिक फांसीवाद और भूमण्डलीकृत पूंजीवाद के दो बड़े खतरे देश के सामने है, जिससे संघर्ष के लिये अम्बेडकर का रास्ता ही पकड़ना पड़ेगा।
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समारोह में उमड़ा जन सैलाब
भाजपा सांसद अर्जुनराम मेघवाल ने कबीर-फुले-अम्बेडकर के विचारों को आज के लिये अत्यंत प्रासंगिक बताते हुये कहा कि इन महापुरूषों की विचारधारा मानवतावादी विचारधारा थी जिसने सबका भला किया, उन्होंने दलित आदिवासी समुदाय के लिये शिक्षा की महत्ता पर जोर देते हुये कहा कि हमें किसी भी परिस्थिति में शिक्षा, संगठन और संघर्ष से विमुख नहीं होना चाहिये।
उन्होंने बाबा साहेब अम्बेडकर की यह बात दोहराई कि समाज में अभी भी आर्थिक एवं सामाजिक गैर बराबरी का विरोधाभाषी वातावरण व्याप्त है। उन्होंने कहा कि डॅा. अम्बेडकर ने अपनी पूरी जिन्दगी में कभी भी मजदूरों के खिलाफ कोई मुकदमा नहीं लड़ा।
माण्डल विधायक रामलाल जाट ने जनसंघर्षों के जरिये बने सूचना के अधिकार तथा रोजगार गारण्टी जैसे कानून बने है लेकिन जब तक दलित पिछड़े समाज में शिक्षा नहीं आयेगी तब तक वह लोक हितकारी कानूनों का कोई फायदा नहीं होगा।
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रैली को रवाना करते महंत शिवानन्द स्वामी और समाजसेवी अशोक कोठारी
आजाद चौक में डॅा. अम्बेडकर जयंती समारोह समिति भीलवाड़ा, स्कूल फोर डेमोक्रेसी तथा मजदूर किसान शक्ति संगठन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित अम्बेडकर जयंती समारोह में जिले भर की सभी तहसीलों से आये हजारों लोगों की मौजूदगी में सभी वक्ताओं ने शिक्षा, संगठन तथा संघर्ष के अम्बेडकर के तीन मंत्रों को जीवन में उतारने का आह्वान किया।
 सभा से पूर्व सुखाडि़या सर्कल से एक विशाल रैली निकाली गई, जिसे शिवानन्द जी महाराज तथा समाजसेवी उद्यमी अशोक कोठारी ने रैली को हरी झण्डी दिखाई।
3उन्होंने यात्रा के संयोजक परशराम बंजारा और सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी को झण्डी देकर रैली को रवाना किया। रैली सुखाडि़या सर्किल से अजमेर चौराहा होते हुए अम्बेडकर सर्किल पर पहुंची जहां पर भाजपा सांसद अर्जुनराम मेघवाल, अरूणा रॅाय, एनी राजा, डी. राजा, निखिल डे, भंवर मेघवंशी ने माल्यार्पण किया।
सभा को सम्बोधित करते हुये मजदूर किसान शक्ति संगठन की सदस्य अरूणा रॅाय ने उपस्थित लोगों से पूछा कि कितने लोगों ने संविधान को पढ़ा है और कितनों ने देखा है? उन्होंने इस इलाके के नवयुवकों का आव्हान् किया कि वे संविधान को पढ़े और सम वही हमारे सामाजिक बदलाव का उपकरण है। श्रीमती रॅाय ने गैर बराबरी, अन्याय और असमानता कि किसी भी व्यवस्था की खिलाफत का संकल्प दोहराया। अरूणा रॅाय ने राजस्थानी भाषा में बोलते हुये कहा कि दुनिया की किसी भी भाषा से नफरत नहीं करनी चाहिए, हमें अंग्रेजी भी सीखनी चाहिए।
सभा को सम्बोधित करते हुए युवा चिन्तक निखिल डे ने कहा कि भीलवाड़ा के दलित आन्दोलन ने देश की नही बल्कि पूरे विश्व को ‘सुनवाई, कार्यवाही, सुरक्षा ता भागीदारी जैसे शब्द दिये है।
salim baba
संगठित होकर गरीबों की मदद करने की बात कहते सलीम बाबा साहेब
नेशनल फैडरेशन फोर इण्डियन वुमेन की राष्टीय सचिव एनी राजा ने भीलवाड़ा से शुरू हुये इस कारवां को एक नये प्रकार के प्रगतिशील अम्बेडकरवाद की शुरूआत बताया, एनी राजा ने दलित आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया।
सभा को समाजसेवी अशोक कोठारी, यूआईटी चैयरमेन रामपाल शर्मा, सैलानी आश्रम करेड़ा सज्जादानशीन बाबा सलीम सैलानी कप्युनिष्ट नेता ताराचंद सिद्धू, जयंती समारोह समिति के संयोजक राजमल खींची, यात्रा संयोजक परशराम बंजारा, डगर के संभाग संयोजक देबी लाल मेघवंशी, जिला संयोजक महादेव रेगर, कबीर क्रांति मंच के जिलाध्यक्ष प्रहलादराय मेघवंशी इत्यादि ने सम्बोधित किया।
इस अवसर पर बोलते हुये सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने दलित अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया तथा कहा कि कबीर-फुले और अम्बेडकर की वैचारिक यात्रा सदैव जारी रहेगी, मेघवंशी ने स्पष्ट किया कि उनका कोई राजनीतिक एजेण्डा नहीं है, न वे किसी पार्टी में शामिल हो रहे है और न ही चुनाव लड़ रहे है।

Thursday, February 28, 2013

आप तो हमारे महाराज है !

यूं तो जिन्दगी बदस्तूर ठीक वैसे ही खिसकती जा रही है जैसे गुजिश्ता सालों में गुजरती रही मगर इस बार 38वें साल का उल्लंघन करते हुये सोचा गया कि एक यात्रा की जाये, जो बाहर से ज्यादा भीतर की हो।

24 फरवरी को मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के लूनिया खेड़ी ग्राम में कबीर महोत्सव भी था। इस महोत्सव में जाने की दिली ख्वाहिश थी। सद्गुरू सैलानी साहेब के दीदार का मन तो कर ही रहा था तो यात्रा शुरू कर दी, कबीर महोत्सव में शिरकत करने और सद्गुरू के दीदार के लिए।

इस अंतरयात्रा पर जो सहयात्री बने, वे लोग परम मित्रों में शुमार होते है दोस्त, सखा, हमनवां, हमसफर, सहयोगी, साथी, मित्र, सर्वस्व। आन्दोलनों और संघर्षों के सहभागी सुख-दुःख के मीत, नितान्त अपने बंधु, बांधव। सामाजिक जीवन में जिनके बिना मैं ‘मैं’ नहीं बनता, ऐसे मित्रजनों के साथ मेवाड़ की धरती से चला काफिला मालवे की तरफ बढ़ा, नया गांव में अखिल भारतीय गाडि़या लौहार समाज कल्याण समिति के अध्यक्ष माधव सिंह सिसोदिया तथा बैरण के निवासी कबीरपंथी छोगजी के यहां चाय और चर्चा करते हुये पीपल्यामण्ड़ी पहुंचे, जहां पर वरिष्ठ समाजसेवी एवं मध्यप्रदेश शिक्षा विभाग के अधिकारी गोपाल जी के घर अतिशय प्रेमपूर्वक नैवेद्य ग्रहण किया, उन्होंने अत्यन्त स्नेह से भोजन करवाया। दिनेश जी गुरूजी भी वहीं थे, उन्हें जब ज्ञात हुआ कि हमारा रात्रि विश्राम उज्जैन होगा तो उन्होंने फूल सिंह जी पंवार को फोन कर दिया।


हम रात्रि 11 बजे उज्जैन पहुंचे, वहां फूल सिंह जी, उनकी पत्नि और पूरे परिवार ने हम सब मित्रों का इस्तकबाल किया।

गरमागरम चाय के साथ खूब सारी चर्चाएं हुई। समाज के मत मतान्तर पर बेहद रोचक चर्चा के बाद सो गए। प्रातः उठे और मक्सी के समीप स्थित लूनिया खेड़ी के लिये प्रस्थायित हुये।

ठीक 8 बजे पद्मविभूषण मंहत प्रहलाद सिंह जी टिपाणिया के गांव लूणिया खेड़ी में उनकी पैतृक कृषि भूमि में बने कबीर स्मारक पहुंच गये। आज यहां कबीर सांस्कृतिक चेतना यात्रा पहुंच रही है, जिसमें देश-विदेश से कई लोग शिरकत कर रहे है, दिन भर कबीर महोत्सव है। टिपाणिया जी से मुलाकात हुई, उन्होंने बताया कि कबीर स्मारक पर ध्वज पूजन के पश्चात सभी लोगों को मक्सी पहुंचना होगा, वहां कबीर सांस्कृतिक चेतना यात्रा पहुंचने वाली है, यात्रा में पधार रहे लोगों को स्वागत सत्कार किया जाएगा और फिर विशाल शोभायात्रा निकाली जाएगी जो मक्सी के मुख्य मार्गों से होती हुई लूनिया खेड़ी पहूंचेगी। हम लूनिया खेड़ी से पुनः मक्सी आ गए, वहां सर्किट हाउस पर पहुंची सांस्कृतिक चेतना यात्रा में आए लोगों का स्वागत किया गया। गुरू वन्दना के साथ ही शोभायात्रा का शुभारंभ किया गया। बैण्ड बाजों के साथ विशाल शोभायात्रा निकाली गई। टिपाणिया जी ने बैण्ड बाजों के साथ कबीर के भजन गाकर हरेक को मस्त कर दिया। शोभायात्रा में टिपाणिया जी, भूरा लाला मारवाड़ी सहित कई लोगों की मधुरवाणियां सुनने को मिली। निरन्तर 17 वर्षों से यह यात्रा निकल रही है, कबीर यात्रा, कबीर के शब्द, चारों तरफ कबीर ही कबीर, हमने इसमें शिरकत कर पाने को अपना सौभाग्य माना। लगा कि मक्सी के बाजार मंे कबीर लिये लुकाटी हाथ खड़ा है। साथी परशराम जी बंजारा, रतननाथ जी कालबेलिया, लखन जी सालवी, हीरजी तथा अनाड़नाथ जी भी खूब आनंदित हुये। हीरजी और रतनजी तो आनंनदातिरेक नाचे भी। वैसे नाचे तो हम भी, मगर मन ही मन। किसी ने शायद ही हमें नृत्यावस्था में पाया हो मगर हम ‘नाच उठ्यो मनमोर’ की स्थिति में रहे।


कबीर साहब की वाणियों से सरोबार होकर निकले तो पहुंचे मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित सैंधवा में। सैंधवा के शांति पैलेस में रात रूके। 25 फरवरी की प्रातः 7 बजे रवाना हुये टाक्या पानी के लिये, सद्गुरू सैलानी साहब के दीदार को। सैंधवा से बलवाड़ी जाते वक्त करीब 30 किलोमीटर के फासले पर यह आदिवासी गांव आता है। टाक्यापानी गांव के मध्य स्थित है संत श्री सैलानी सरकार की खानकाह। अजब बाबा की गजब लीला स्थली, देखदेख अचरच भयो की मनस्थिति में पहुंचे। यह सुनकर बेहोश होते-होते बचे कि बाबा साहब तो कल अपराह्न 3 बजे ही बुलढ़ाणा चले गये। अब कहां है पता नहीं, मुझे लगा कि सरकार नाराज है . . मुझ नाचीज से। कितनी तमन्ना थी कि 39वां जन्मदिन हुजूर के कदमों में गुजारूं मगर अब क्या करे, हुजरे के बाहर धोक लगाई, बोराणा वाले चांद भाई मिल गये, बोले दीदार की प्रबल इच्छा है तो गाड़ी दौड़ाओं और पहुंच जाओ बुलढ़ाणा, यहां से करीब 250 किलोमीटर होगा, उन्होंने कुछ मोबाइल नम्बर भी दे दिये, जिन पर सम्पर्क कर हम सरकार तक पहुंच सके।

इसी दौरान यह भी पता चला कि सरकार की जन्मस्थली अनसिंग (जिला-वाशिम-महाराष्ट्र) से भी 10-12 युवाओं की एक टोली आई है, वह भी सरकार के दीदार के लिए बुलढ़ाणा जा रही है। हमने उन्हें ‘हनीफ शाह तुम्हारे दीवाने आये है’ की धुन पर नाचते हुये गाते हुये देखा ही था, उनकी शिरनी (तर्बरूका) भी खाई थी, हमें प्रसन्नता हुई कि सरकार के गांव के लोगों के साथ जाने का मौका मिलेगा। हम साथ-साथ रवाना हुये। अभी हम 70-75 किलोमीटर का रास्ता तय कर पाये थे, यावल कस्बे के पास ही पहुंचे थे कि खबर मिली कि सरकार ने वापस टाक्या पानी का रूख कर लिया है। हम रूक गये राह पर ही, एक घण्टे लम्बे इंतजार के बाद सरकार की गाड़ी यावल के नदी किनारे वहां रूकी जहां हम लोग खड़े थे। मुझे रामदेव पीर के भक्त हरजीभाटी की वाणी का स्मरण हो आया - ‘हरजी ने हर मिल्या आड़े मार्ग आय’, हमें भी बीच राह मिल गये, सदगुरू।

सरकार के दीदार हो गए, उनसे 10 मिनट तक बातें हुई। वे बोलते रहे, हम वशीभूत हुये सुनते रहे ‘‘पांव जमाओं, रास्ता खोजो, चल पड़ो’’ जैसे सूत्र वाक्यों के साथ आध्यात्मिक ज्ञान की सैकड़ों बातें। फिर 75 किलोमीटर का वापसी का सफर सद्गुरू के साथ हुआ। यावल में नाश्ता, अड़ावदा में थोड़ा रूकना, चौपड़ा होते हुये काफिला बढ़ता ही गया, बलवाड़ी में दिलशेर भाई के मकान पर आपने मुकाम किया। हम फिर दीदार को पहुंचे, बाबजी ने पूछा - कहां से आये ? मैं बोला-भीम से, फिर पूछा-मार्ग में कहां मिले ? मैंनें बताया-यावल में, फिर बोले-क्या करते हो ? मैंने कहा-पत्रकार हूं, सरकार ने एक क्षण मेरी और देखा और ठहाके के साथ हंसते हुए कहा - आप तो हमारे महाराज है।

फिर इजाजत दी - चलो। बाकी साथी भी मिले, इजाजत ली, फिर चल पड़े सैंधवा के लिये, भोजनोपरान्त फिर से होटल शांति पैलेस के उसी कमरा नम्बर 114 में पहुंचे। लखनजी, हीरजी, अनाड़जी केक वगैरह लेकर आ गये, केक काटने से लेकर गुब्बारा फोड़ने तक का जुग-जुग जीओ का आशीष भरा ‘कारजक्रम’ सम्पन्न हुआ, अब कमल हासन की बहुचर्चित फिल्म ‘विश्वरूपम’ देखनी है, हीरजी ने खर्राटे लेने शुरू कर दिये है और दूसरी ओर चलचित्र पर हमारी दृष्टियां जमती जा रही है।

इस प्रकार सतपुड़ा की पहाडि़यों में निर्मल आदिवासियों और दण्डकारण्य क्षेत्र में 39वां बरस जिन्दगी का साक्षात सामने आ गया, स्वागत है भाई आपका भी।

26 फरवरी की सुबह प्रस्थान किया मेवाड़ की ओर, हुसैन टेकरी में दो घण्टे गुजारते हुये, रास्ते में बेडि़न औरतों के यौनकर्म के नजारों से दो-चार होते हुये न्यू राजस्थानी ढ़ाबा, भाटखेड़ा पहुंचकर रूके, संयोग से होटल मालिक सरकार का मुरीद निकला, भोजन अत्यन्त स्वादिष्ट था और प्रचुर मात्रा में भी, भरपेट खाये, अधाये और निम्बाहेड़ा कोतवाली जा धमके, थानेदार श्री राजूराम जी ने कॅाफी पिलाई, बातें हुई, वसीम इरफानी जी, सिराज साहब से जी भरकर बातें हुई, वसीम जी ने तो बाथरूम को ही हुजरा बना दिया, हम दोनों ने वहीं बैठकर बुल्लेशाह का कलाम ‘‘बुल्लिया की जाणां मैं कौण’’ सुना, शेष साथी एनजीओ की रामकहानी सुनते रहे, राह में अशोक भाई मिले, फिर पहुंचे चित्तौड़ सलीम बाबा साहब के पास, कण्डक्टर साहब, वकील साहब इत्यादि ने खूब प्रेमपूर्वक सामिष निरामिष भोज करवाया, बाबा साहब बोले-भजिया बनाओ, हमने दाल, रोटी, भजिया, गुलाब जामुन ना जाने क्या-क्या खाया। करेड़ा में आगामी दिनों में आयोज्य उर्स शरीफ की तैयारियों पर चर्चा हुई, दाता से मुलाकात की बात तफसील से सुनकर सलीम बाबा ने व्याख्यायित की, बोले-‘भाई जान अब चल पड़ो, रास्ता बनाओं, पांव जमाओ, चल पड़ो, चल पड़ो, चल पड़ो।

बाद में कुंभानगर में जाकिर भाई के यहां चायपान करके रात 12 बजे घर के लिये रवाना हुये, रास्ते भर साबरी बद्रर्स, वडाली बंधु, नुसरत फतेहअली के रंग और रूबरू-ए-यार के सुनते हुये 01:30 बजे घर पहुंचे, थोड़ी देर रहस्यवादी लेखक पॅालो कोएलो की विजेता अकेला पढ़ी और नींद के आगोश में समा गये, एक ऐसी नींद जो कल सुबह टूट जानी है।

Saturday, February 16, 2013

यू आई डी बेस्ड कैशट्रांसफर : मिथक और सच्चाई


  • अरूणा रॅाय/ भॅवर मेघवंशी 

यूआईडी अथॅारिटी का यह दावा निराधार साबित हुआ है कि आधार कार्ड ऐच्छिक है अनिवार्य नहीं, दिल्ली सरकार ने इसे अनिवार्य कर दिया है, राजस्थान में आधार के बिना कर्मचारियों को वेतन नहीं मिलेगा। यूआईडी ने गरीबों पर अपना ताना-शाही रवैया दिखाना शुरू कर दिया है तथा यह स्पष्ट हो चुका है कि गरीब को अपनी हरेक सुविधा पाने के लिये आधार कार्ड लगाना जरूरी है। 

प्रश्न यह है कि क्या हम चाहते है कि हमारी सारी सूचनाएं सत्तातंत्र और किन्हीं कम्पनियों के पास रहे? यहांहमें यह समझना जरूरी है कि नागरिकों की सूचनाएं सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा इस प्रकार लिये जाना सूचना के अधिकार के बिल्कुल विपरीत कदम है क्योंकि आरटीआई में सत्ता की सूचनाएं जनता के पास होती है, इस प्रकार सत्ता का तंत्र कमजोर होता है और लोक मजबूत, यह ठीक इसके खिलाफ कदम है क्योंकि यहां पर सत्ता के पास जनता की सारी सूचनाएं एकत्र की जा रही है, बाद में इन सूचनाओं की सुरक्षा के नाम पर पूरे सूचनातंत्र पर एक बार पुनः गोपनीयता का आवरण चढ़ाया जायेगा तथा अन्ततः सूचना के अधिकार को भी इससे सीमित करने की कोशिश की जायेगी।

आधार परियोजना के कर्ताधर्ता और सत्ता प्रतिष्ठान यह साफ-साफ नहीं बोलना चाहता है कि इसे क्यों किया जा रहा है, आधार बेस्ड नकद हस्तातंरण को वे गेम चेंजर कह रहे है, जादू की छड़ी कह रहे हैं, कह रहे है कि आपका पैसा आपके हाथ। देखें तो पता चलता है कि जिन योजनाओं में कैश ट्रांसफर अथवा डायरेक्ट बैनीफिट को लागू किया गया है, वहां तो पहले से ही पैसा लोगों के हाथों में ही आ रहा था, फिर नया क्या है? इतना ढिंढोरा क्यों पीटा जा रहा है़? क्या यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली को समाप्त करने की दिशा में कदम है? फिलहाल तो वे इससे मना कर रहे है मगर बहुत सम्भावना है कि एक दिन वे अनाज, केरासीन आदि सुविधाएं देना बंद करके सीधे नकद खातों में भेजना शुरू कर देंगें। सरकार मानती है कि हम राशन बांटने में असफल रहें है, पीडीएस में चोरियां रोकने में विफल रहे है इसलिये हम सुविधाओं के बदले पैसा दे देंगे। हमें लगता है इस सोच में ही बड़े खतरे निहित है, सरकार अपनी असफलताओं का सामना करने के बजाय घुटने टेकती रहेगी तथा उसका खामियाजा देश के लोग उठाने को मजबूर होगें, उन पर जोर जबरदस्ती आधार आधारित नकद हस्तातंरण योजना लाद दी जायेगी। अन्ततः गरीबों के पास भूख से बचने का जो एकमात्र साधन पीडीएस के रूप में मौजूद है वह भी खत्म हो जायेगा। क्योंकि खुले बाजार में अनाज के दाम बढ़ जायेगें तथा बाजार के लिये सबसे आसान है गरीबों से पैसे ऐंठ लेना। खुले बजार में बढ़ती कीमतों के समक्ष सरकार द्वारा खातों में डाली जाने वाली राशि ऊंट के मुंह में जीरे जितनी ही होगी।

वैसे भी कैश ट्रंासफर वाले रास्ते में और भी खतरे है, सरकार जनकल्याण की कई अन्य जिम्मेदारियों में भी अपनी असफलताओं का तर्क देकर अपने दायित्वों से भाग खड़ी होगी। कल वह यहीं तर्क शिक्षा के लिये और स्वास्थ्य के लिये भी देगी, कहेगी कि हम विद्यालय चलाने में सक्षम नहीं है, पैसे ले लो और अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाओं, क्या निजी स्कूलों की फीस में एकरूपता है? क्या सभी निजी स्कूल सरकार द्वारा कथित रूप से देय नकदी, जितनी ही फीस में आपके बच्चों को पढ़ायेंगे ? ऐसा ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी होगा, सरकार कहेगी, हम स्वास्थ्य सेवाएं देने में सक्षम नहीं है, ये पैसे ले लो और प्राइवेट हॅास्पीटल में इलाज करवा लो, क्या निजी अस्पताल सरकार द्वारा दी गई नकदी में जनता का ईलाज कर देंगे? बिल्कुल भी नहीं? जब हम जानते है कि निजी विद्यालय और निजी अस्पताल सरकार द्वारा दी गई नकदी के बदले जनता को शिक्षा और स्वास्थ्य नहीं दे पायेंगे तब क्या बाजार जनता को अनाज, केरोसीन अथवा अन्य सुविधाऐं उन्ही पैसों में देगा? कतई नहीं यह जनता को बाजार के हवाले करने का एक तरीका है, यह सरकार द्वारा अपनी जिम्मेदारियों से भागने का एक रास्ता है। सच्चाई यह है कि यह बाजारीकरण और निजीकरण की एक ऐसी साजिश है जिसमें नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, अनाज जैसी तमाम बुनियादी जरूरत की चीजें भी सरकार नहीं दे सकती है तो फिर जनता को सरकार की जरूरत ही क्या है ?

यूआईडी आधारित कैश ट्रांसफर जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना को लागू करने से पहले तथा इसे लागू किये जाने के बाद भी यह पूछा जाना जरूरी होगा कि इस प्रकार की योजनाएं लाने का मकसद क्या है? वास्तव में जनता इससे लाभान्वित होगी? साथ ही समय-समय पर इसकी समीक्षा व मूल्यांकन करके बताया जाना चाहिये कि लक्षित फायदा जनता तक पहुंचा अथवा नहीं?

जब भी कैष ट्रांसफर के लक्षित लाभार्थियों के बारे में हमनें यूआईडी कैश ट्रांसफर के पक्षधरों से सवाल पूछा, उनकी ओर से कोई भी जवाब नहीं मिलता है। सोचने की बात यह है कि कई योजनाओं में तो आज भी उस लक्षित लाभार्थी को पहले भी पैसा ही मिल रहा था। आज भी पैसा ही मिल रहा हैं, पहले भी बैंक खाते में जमा हो रहा था, आज भी बैंक खाते में ही जमा हो रहा हैं। नया सिर्फ इतना सा है कि पहले लोग लाभार्थी की पहचान करते थे, अब वह अपनी 10 अंगुलियों और आँख की पुतलियों द्वारा मशीन से पहचाना जायेगा तथा इन्हीं पहचानों के आधार पर उसे उसका पैसा मिलेगा।

दरअसल सरकार को अपना नारा बदल लेना चाहिये - “आपका पैसा-आपके हाथ” नहीं बल्कि “आपका हक-मशीन के पास” कहा जाना चाहिये , क्योंकि मशीन को ठीक लगेगा तो वह आपका पैसा आपके हाथ देने की इजाजत देगी अन्यथा नहीं। अब इसके व्यवहारिक पहलुओं पर भी नजर डालनी चाहिये। राजस्थान के अजमेर जिले की तिलोनियां ग्राम पंचायत की सरपंच कमला देवी का ही उदाहरण लीजिये, उसका आधार कार्ड नहीं बन पा रहा है क्योंकि उसके अगुलियों के कोई निशान ही नहीं आते है, ऐसा ही उनकी पंचायत की दर्जनों वृद्ध व विद्यवा महिलाओं के साथ है जिन्हें अब तक तो पैंशन मिलती रही है मगर फिंगर प्रिन्टस के अभाव में आधार कार्ड नहीं बनने पर अब उनकी पैंशन अटक जायेगी, मशीन के खराब होने, कनेक्टिविटी नहीं होने तथा हैंग हो जाने की तो अभी हम बात ही नहीं कर रहे हैं मगर उन लाखों बच्चों, बूढ़ों और मेहनत मजदूरी करने वाले लोगों का क्या होगा जिन्हें आधार कार्ड बनाने वाली मशीन पहचान ही नहीं पा रही हैं, उनके हाथ की अंगुली व अंगूठे कोई निशान नहीं देते अथवा उन निरन्तर बुढ़ाती आंखों का क्या होगा जो मोतियाबिंद की शिकार होकर इन मशीनों की समझ से परे हैं, क्या ये मेहनती हाथ और वृद्ध होती आंखें कभी अपना हक ले पायेंगे? यूआईडी अथॅारिटी का जवाब है कि जिनके फिंगरप्रिंट और आंखों के रेटिना नहीं मिलेंगे उनको भी बिना मशीन की इजाजत के पैसा मिलेगा, इससे स्पष्ट हो जाता है कि यूआईडी को निगरानी के लिये काम में नहीं लिया जा सकता है। फर्जी आधार कार्ड के आधार पर भी फर्जीवाड़े की संभावना बनी रहेगी यह एक ऐसी तकनीक है, जिसकी शत प्रतिशत सफलता नहीं हो तो चोर दरवाजे सदैव खुले रहते है तथा भ्रष्टाचार पर रोक का उसका दावा भी खोखला साबित होता है। हमें लगता है कि जैसे यह सूचना के अधिकार के खिलाफ है वैसे ही यह जन निगरानी के भी विपरीत है, जनता को सूचना देकर उनको शक्तिशाली बनाने के बजाय हम पूरा काम मशीनों पर छोड़ रहे है, हम आज तक पूरे देश में मतदाता पहचान पत्र लागू नहीं कर पाये तो यह अंगूठा छाप तकनीक (आधार कार्ड) कब लागू हो पायेगी इस पूरी परियोजना के लागू होने में भारी सन्देह है, आधार कार्ड पर आधारित नकद हस्तांतरण को लागू किये जाने के पहले दिन को देखें तो भी इसकी पोल खुल जाती है राजस्थान के अलवर, उदयपुर तथा अजमेर जिलों में इसे लागू किया गया है। योजना के पहले दिन (1 जनवरी 2013) हालात इस प्रकार रहे -

अजमेर में पहले दिन 22 हजार लाभार्थियों मे से केवल 527 को लाभ मिला, 25 लाख लोगों के आधार कार्ड बनने थे बने सिर्फ 6 लाख के, उदयपुर जिले में 16,500 लाभार्थियों में से महज 800 लागों के ही बैकों में खाते खुल पाये है।

ऐसा ही बहु प्रचारित अलवर जिले में हुआ जहां पर पहले दिन तक मात्र 99,174 आधार कार्ड ही बन पाये जिनमें भी केवल 84,000 के ही बैक खाते खुल पाये है। यह स्थिति तो तब है जबकि अलवर, अजमेर तथा उदयपुर जिलों का पूरा प्रशासन महीनों तक सिर्फ इसी कवायद में जुटा रहा, बावजूद इसके भी जो उपलब्धि हासिल हुई वह खोदा पहाड़ निकली चुहिया जैसी है।

वैसे तो आधार कार्ड बनाने की परियोजना पर संसदीय समिति ने बहुत से सवाल उठाये है, मगर संसद को दरकिनार करके भी आधार कार्ड बनाने का काम जारी है, इसके लिये संसद में कोई कानून बनाने की बात तो दूर संसदीय समिति की आपत्तियों पर भी गौर नही किया गया है।

वैसे भी आधार कार्ड से कोई नागरिकता की पहचान तो मिल नहीं रहीं है, इसे बनाने के लिये पहचान के सबूत लाना जरूरी है, बहुत सारे कार्डो के साथ एक और कार्ड जरूर बन जायेगा।

हमें यह समझना होगा कि यह पहचान का कार्ड नहीं है, इससे न तो नागरिकता मिलती है और ना ही बहुत सारे कार्ड रखने के झंझट से मुक्ति। हमारी पहचान तो उन्ही कार्डो से स्थापित होगी, लेकिन सत्ता को हमारी खबर लेने का यह एक उपकरण जरूर बन जायेगा। यह पहचान से ज्यादा नागरिकों की ट्रेकिंग करने का यंत्र बनेगा। 

इसके जरिये हमारी सूचनाएं जरूर बड़ी कम्पनियों तक पहुंच जायेगी उन्हें पता चलेगा कि हमने कहां, क्या खरीदा है? जैसे बैंक वाले हमारी जानकारियां किसी और को नहीं मगर कम्पनियों को जरूर देते है, अब आधार कार्ड के जरिये जनता की सूचनाएं पुलिस, आई.बी. और सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे सारे शक्तिशाली लोगों तक पहुंचेगी। पहली बार एक ऐसा प्लेटफॅार्म तैयार हो रहा है, जहां हमारी सारी सूचनाएं एक जगह पर होगी तथा इसके दुरूपयोग के जरिये लोगों के निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा ।

ताज्जुब की बात है कि इन सारी सूचनाओं को एकत्र करने वाली वे कम्पनियां है जिनका अमेरिका के रक्षा मंत्रालय से अनुबंध रहा है कुछ प्राइवेट कम्पनियों का तो कुख्यात अमेरिकन खुफिया एजेन्सी सीआईए से भी रहा है क्या इस खतरे के प्रति हमें आंख मूंद लेनी चाहिये?

आधार कार्ड के पक्ष धरों का कहना है कि ये सूचनाएं कभी भी सुरक्षा तथा व्यवसायिक एजेंसियों को नहीं दी जायेगी इनका उपयोग तो गरीबों को उनका हक दिलाने तथा उन्हे विकास से जोड़ने के काम में लिया जायेगा, मगर सच्चाई तो यह है कि इस तकनीक के चलते कई लोग इसके फायदे बाहर ही रह जायेंगे, नकद को बैंक तथा व्यक्ति के हाथों तक आते आते इतनी देरी हो जायेगी कि अन्ततः लोग इस व्यवस्था से ही तंग आकर इसको उखाड़ फैंकेगें मगर तब तक कितना खर्चा और कितनी तकलीफें सहनी होगी, इस पर विचार किया जाना आवश्यक है। हाल ही में केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने इस सिस्टम का उद्घाटन करते वक्त कहा कि उनके पास आधार कार्ड नहीं हैं क्योंकि उन्हें सुविधाएं लेने के लिये इसकी जरूरत नहीं है। 

हमारा सुझाव है कि पहले दौर में यूआईडी को, एक साल के लिये सासंदों, मंत्रियों, विधायकों, कर्मचारियों तथा अधिकारियों के लिये काम में लिया जाये, उनकी तमाम आय, सम्पत्ति और बैंक खातों आदि के विवरण को आधार के साथ जोड़ दिया जाये तथा उससे कोई जादुई असर दिखे तो शायद हम बाकी के लोग भी इसे अपनाने के लिये तैयार हो जायेंगे वर्ना यह योजना ‘गेमचैंजर‘ नहीं बल्कि गर्वनमेंट चेंजर साबित हो सकती है।

(लेखकद्वय मजदूर किसान शक्ति संगठन के साथ कार्यरत है)

आधार कार्ड: झूठे जग भरमाय


  • भंवर मेघवंशी
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के समर्थक दावा करते है कि आधार कार्ड के जरिये फर्जीवाड़ा रोकने में मदद मिलेगी, लेकिन अगर आधार कार्ड बनाने में ही फर्जीवाड़ा होने लगे तो ?
UIDजी हां, पिछले दिनों राजस्थान के भीलवाड़ा शहर में ऐसा ही मामला उजागर हुआ, शहर के आजादनगर क्षेत्र में 22 जनवरी को पुलिस ने एक युवती राधिका को हिरासत में लेकर पूछताछ की, जिस पर आरोप है उसने नीतू सुथार तथा महेन्द्र लाल इत्यादि से आधार कार्ड बनवाने के लिये 200-200 रुपए ले लिये। आधार के नाम पर फर्जीवाड़ा कर रही इस महिला की हरकत के उजागर होने के बाद कुछ लोगों ने इसकी शिकायत एडीएम टीकमचंद बोहरा से की, एडीएम बोहरा पुलिस के साथ मौके पर पहुंचे तथा महिला से मामले की जानकारी ली। पुलिस की पूछताछ से पता चला कि पैसा वसूल रही युवती राधिका आधार पंजीयन करने वाले ठेकेदार के यहां मशीन अॅापरेटर है तो यह स्थिति है आधार कार्ड बनाने के दौरान की, अब जो आधार फर्जीवाड़े से शुरू हो रहा है वह भ्रष्टाचार को कैसे रोकेगा यह विचारणीय प्रश्न है।
दूसरी चौंकाने वाली सच्चाई यह सामने आई कि राजस्थान सरकार ने बीपीएल लोगों को आधार कार्ड बनवाने पर मिलने वाले 100 रुपये प्रति व्यक्ति प्रोत्साहन देने की राशि को ही दबा लिया, जिससे गरीबों का हक मारा गया। जानकारी के मुताबिक इस केंद्रीय योजना के लिये वित्त आयोग ने कुल 2989.10 करोड़ रुपये स्वीकृत किये थे। यह राशि वर्ष 2004-05 की बीपीएल जनसंख्या के आधार पर तय की गई थी। राजस्थान को भी इसमें से 134.9 करोड़ रुपये स्वीकृत हुये, मगर राज्य सरकार ने राज्य में इसे लागू ही नहीं किया, इस प्रकार आधार कार्ड बनवाने वाले प्रत्येक परिवार को औसतन 400-500 रुपये का नुकसान हो गया, अब सरकार कह रही है कि वह जल्दी ही इस योजना को लागू करेगी लेकिन सवाल यह है कि अगर समाचार पत्रों ने इस गड़बड़झाले को उजागर नहीं किया होता तो यह योजना सामने ही नहीं आ पाती। आधार कार्ड को हर योजना को लागू करने की जीवन रेखा बता रहे लोग इसका क्या जवाब देंगे कि आधार कार्ड बनवाने के लिये जो योजनाएं बनाई गई, वे ही लागू नहीं की जा रही तो इस आधार पर दूसरी योजनाओं की सफलता कैसे सुनिश्चित हो पायेगी?
तीसरी बात यह है कि सरकार ने विशिष्ट पहचान पत्र (आधार कार्ड) बनाने को ऐच्छिक माना है, उसका दावा है कि यह अनिवार्य नहीं है लेकिन सरकारी दावे के विपरीत गरीबों को यह कहा जा रहा है कि अगर उन्होंने वक्त रहते आधार कार्ड नहीं बनवाया तो उन्हें किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिलेगी, यहां तक भ्रम फैलाया जा रहा है कि जिनका आधार कार्ड नहीं होगा उन्हें वोट ही नहीं डालने दिया जायेगा, भीलवाड़ा में तो कांग्रेस का जिला मुख्यालय आधार कार्ड बनाने का कार्यालय बन चुका है, वैसे तो सत्तारूढ़ दल का कार्यालय कार्यकत्र्ताओं की आमद के लिये तरसता रहा है मगर आजकल जिलाध्यक्ष एक कमरे तक सिमट गये है तथा पूरे कार्यालय में आधार ही आधार दिखाई पड़ेगा, जिले में पार्टी इस प्रकार अपना ‘जन-आधार’ बढ़ा रही है!
आधार कार्ड बनवाने की ऐच्छिकता तो कोरी बयानबाजी ही है क्योंकि सरकारी कर्मचारियों को स्पष्ट कर दिया गया है कि अगर उन्हें वेतन चाहिये तो आधार कार्ड का नम्बर लगाना होगा, इसी प्रकार गैस एजेन्सी के संचालक कह रहे है कि रसोई गैस के लिये आधार कार्ड का नम्बर देना आवश्यक है। अगर आधार कार्ड और उससे लिंक बैंक खाते की जानकारी नहीं दी गई तो उपभोक्ताओं के खाते में गैस अनुदान राशि नहीं पहुंच पायेगी।
भीलवाड़ा के अतिरिक्त जिला कलक्टर (प्रशासन) टीकमचंद बोहरा का कहना है कि 1 अप्रेल से जिले में नकद हस्तान्तरण योजना लागू की जा रही है, इसका लाभ लेने के लिये आधार कार्ड बनवाना ही होगा। इसी प्रकार राज्य के मुख्य सचिव सी.के. मैथ्यु का कहना है कि एक अप्रेल से बिना आधार कार्ड व बैंक खाते के राज्य की 18 योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा। इस प्रकार के फरमान यह साबित करने के लिये काफी है कि आधार कार्ड बनवाना ऐच्छिक न होकर अनिवार्य कर दिया गया है।
आधार कार्ड बनवाने में आ रही चुनौतियों पर विचार किये बिना ही इसे अनिवार्य कर देना गरीबों को उन्हें मिलने वाले फायदों से वंचित करने की रणनीति का हिस्सा है, सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग, श्रम, शिक्षा, रोजगार, महिला एवं बाल विकास विभाग, चिकित्सा विभाग की जननी सुरक्षा योजना, घरेलू गैस सब्सिड़ी, अजा, जजा तथा अन्य पिछड़ा वर्ग छात्रवृत्ति योजनाएं तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलने वाली वस्तुओं सहित कुल 18 योजनाओं को राज्य सरकार आधार से जोड़ रही है, सरकार ‘प्रलोभन’ देकर अथवा ‘भय’ दिखाकर हर हाल में ‘आधार कार्ड’ बनवाने पर तुली हुई है, सवाल यह है कि क्या एक कार्ड गरीबों की सब समस्याओं को खत्म कर देगा अथवा सरकार गरीबों की विशिष्ट पहचान बनाकर धीरे-धीरे उन्हें खत्म कर देगी ?

औवेसी, हमें भी जवाब देना आता है


  • भंवर मेघवंशी
मेरे कानों में मुसलमानों के एक घटिया नेता और झूठे खैख्वाह अकबरूद्दीन औवेसी की कड़वी भाषा रह रह कर गूंज रही है, यू ट्यूब पर जब से मैंने उस आस्तीन के सांप का जहर उगलता हुआ एक घण्टे का भाषण सुना तब से मेरा रोम-रोम विद्रोह किये हुये है, मेरा ही नहीं बल्कि तमाम वतनपरस्त और इंसानियतपरस्त लोगों का खून खौल रहा है, खौलना भी चाहिये क्योंकि कोई भी हरामजादा गीदड़ मुल्क के किसी भी कोने में अपने द्वारा जुटाई गई किराये की भीड़ के सामने शेर बनकर दहाड़ने की कोशिश करें तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, अकबरूद्दीन औवेसी कहता है – मैं सिर्फ मुस्लिम परस्त हूं, उसे अजमल कसाब को फांसी दिये जाने का सख्त अफसोस है, वह टाइगर मेनन जैसे आतंकी का हमदर्द है, वह मुम्बई के बम धमाकों को जायज ठहराता है, देश के मुम्बई संविधान, सेकुलरिज्म और बहुलतावादी संस्कृति की खिल्ली उड़ता है। कहता है, हम तो दफन होकर मिट्टी में मिल जाते है मगर हिन्दू जलकर फिजा में आवारा की तरह बिखर जाते है, वह देश के दलितों व आदिवासियों को दिये गये रिजर्वेशन पर सवाल खड़े करता है और इन वर्गों की काबिलियत पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है।
औवेसी की नजर में भारत जालिमों का मुल्क है, दरिन्दों का देश है, जहां पर मुसलमान सर्वाधिक सताये जा रहे है, उसने गुजरात से लेकर आसाम तक के उदाहरण देते हुये आदिलाबाद की सभा में मौजूद लोगों को उकसाया कि हमसे मदद मत मांगों खुद ही हिसाब बराबर कर दो, बाद में हम सम्भाल लेंगे। इतना ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान की सेकुलर अवाम से भी औवेसी को बहुत सारे जवाब चाहिये, बहुत सारे हिसाब चाहिए, अयोध्या का बदला चाहिये, गुजरात का प्रतिरोध चाहिये, खुलेआम खून खराबा चाहिये, जब यह रक्तपात हो जायेगा तब वह सेकुलर होने के बारे में सोचेगा ! नहीं तो अभी की तरह कम्युनल ही बना रहेगा, हद तो यह है कि देश के खिलाफ जंग छेड़ने की धमकी देते हुये वह मुल्क के अन्य धर्मों के लोगों को ‘‘नामर्दों की फौज’’ कहता है, और राम को राम जेठमलानी के बहाने इतिहास का ’सबसे गंदा आदमी बताता है जो औरतों का एहतराम नहीं करता था।’
औवेसी की ख्वाहिश है कि महज 15 मिनट के लिये इस मुल्क से पुलिस हटा ली जाये तो वो हजार बरस के इतिहास से ज्यादा खून खराबा करने की ताकत रखता है और देश के 25 करोड़ मुसलमान इस देश का इतिहास बदलने की कुव्वत! बकौल औवेसी तबाही और बर्बादी हिन्दूस्तान का मुस्तकबिल बन जायेगा। ऐसा ही प्रलाप, भाड़े के टट्टूओं की भीड़ में, अल्लाह हो अकबर के उन्मादी नारों के बीच में आंध्रप्रदेश असेम्बली के इस विधायक ने किया, उसने पूरे मुल्क को एक बार नहीं कई-कई बार ललकारा, जिसकी जितने कड़े शब्दों में निन्दा की जाये वह कम है।
औवेसी को अपना ‘एक कुरान, एक अल्लाह, एक पैगम्बर, एक नमाज,‘ होने का भी बड़ा घमण्ड है, उसके मुताबिक बुतपरस्तों के तो हर 10 किलोमीटर पर भगवान और उनकी तस्वीरें बदल जाती है, इस मानसिक दिवालियेपन का क्या करें, कौन से पागलखाने में इस पगलेट को भेजे जो उसे बताये कि ‘तुम्हारा एक तुम्हें मुबारक, हमारे अनेक हमें मुबारक’ लेकिन औवेसी, हबीबे मिल्लत, पैगम्बर की उम्मत, यह तुम्हारा प्रोब्लम है कि तुम्हारे पास सब कुछ ‘एक’ ही है, क्योंकि बंद दिमाग न तो महापुरूष पैदा करते है और न ही दर्शन, न पूजा पद्धतियां विकसित होती है और न ही ढे़र सारी किताबें मुकद्दस। वे बस एक से ही काम चलाते है बेचारे, अनेक होने के लिये दिमाग की जरूरत होती है, धर्मान्ध, कट्टरपंथी लोगों का मस्तिष्क ठप्प हो जाता है, वे नयी सोच, वैज्ञानिक समझ, तर्क और बुद्धि विकसित ही नहीं कर पाते है, खुद नहीं सोचते, सिर्फ उनका अल्लाह सोचता है, वे सिर्फ मानते है, जानते कुछ भी नहीं, इसलिये नया कुछ भी नहीं होता, सदियों पुरानी बासी मान्यताएं दिमाग घेर लेती है और हीनता से उपजी कट्टरता लोगों को तालिबानी बना देती है।
और अकबरूद्दीन औवेसी, तुम शायद भूल रहे हो कि सब कुछ ‘एक’ होने के बावजूद तुम्हारे हम बिरादर एक नहीं है। मैं पूछता हूं अकबर, तुम्हारा अल्लाह एक, पैगम्बर एक, नमाज एक, कुरान एक तो फिर मुसलमान एक क्यों नहीं ? क्यों पाकिस्तान में शिया और सुन्नी लड़ रहे है, क्यों ? अहमदिया काटे जा रहे है? क्यों इस्माइली अपनी पहचान छुपा रहे है, क्यों निजारी, क्यों आगाखानी, क्यों अशरफी, क्यों अरबी और क्यों चीनी मुसलमान अपने अपने तौर तरीकों, मस्जिदों, अजानों के लिये संघर्ष कर रहे है, अरे तुम्हारा सब कुछ एक है तो मस्जिदें अलग-अलग क्यों है? मजार पूजकों को बहाबी क्यों गरिया रहे है ? शियाओं की मस्जिदों में क्यों बम फोड़ रहे हो और क्यों इतने सारे मुल्कों में तकसीम हो।
शर्म करो औवेसी, तुम्हारे कई सारे कथित पाक, अल्लाह की शरीयत पर चलने वाले मुल्क पूरे विश्व में भीख का कटोरा लिये खड़े है, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, पलीस्तीन क्या-क्या गिनाऊं हर जगह मुसलमान पशेमान और परेशान है ? भारत पाक और बांग्लादेश का मुसलमान जातियों में बंटा हुआ है, अरे हिम्मत है तो स्वीकार करो कि तुम्हारे एक होने के तमाम दावों के बावजूद तुम्हारी मस्जिदें, रस्मों रिवाज, पहनावें, अजान और कब्रस्ताान तक अलग-अलग है। मुल्क-ए-हिन्दूस्तान से लड़ने की सौचने से पहले खुद से लड़ो औवेसी, तुम्हारे सालार ने तुम्हें यह नेक सलाहियत नहीं दी कि नरक जैसी जिन्दगी जी रहे गरीब गुरबां मुसलमानों की बहबूदगी और तरक्की के लिये तुम काम करो, शायद न दी होगी, हम दे देते है।
तुम्हें मुम्बई के बम धमाके जायज लगे, क्योंकि यह क्रिया की प्रतिक्रिया थी, फिर उन लोगों का क्या जो गुजरात को गोधरा की प्रतिक्रिया कहते है, तुम्हें टाइगर मेनन और अजमल कसाब जैसे आतंकियों की इतनी चिंता है, निर्दोष और निरपराध भारतीयों की जान की तुम्हारी नजरों में कोई कीमत नहीं, तुममें हमें इंसानियत नहीं हैवानियत नजर आती है, जो खून खराबे की धमकी दे ऐसे आस्तीन के सांपों के फन बिना देरी किये हमें पूरी बेहरमी से कुचल देने चाहिये, क्योंकि ये सांप हमारे मुल्क, हमारी जम्हूरियत और हमारी गंगा जमुनी तहजीब के लिये खतरा है, हजारों बरस बाद आज यह मुल्क रहने लायक जगह बना है, उस जगह को औवेसी जैसे लोग खत्म करें इससे पहले हमे ऐसे लोगों का इलाज करना होगा।
औवेसी को एससी/एसटी को दिये गये रिजर्वेशन से बड़ी कोफ्त है, उसे इससे काबलियत का नाश होते लगता है और वह तभी आरक्षण का पक्षधर बनेगा जबकि मुसलमानों को भी रिजर्वेशन मिले, अकबरूद्दीन तुम जिस काबिलियत का बेसुरा राग निकालते हो, वह तो इस मुल्क के 25 करोड़ दलितों और आदिवासियों के मुकाबले तुम में कुछ भी नहीं है, ऐसी मेहनतकश कौमें विश्व में दूसरी नहीं जिन पर कभी तुमने, कभी उनने, सबने अत्याचार किये, फिर भी वे जिन्दा है क्योंकि उनमें जिजीविषा है, जीने की अदम्य इच्छा है, वे किसी पूजा स्थल में घण्टियां नहीं बजाते, घुटने टेककर हाथ नहीं फैलाते, वे किन्हीं आसमानबापों और किताबों से मदद नहीं मांगते, वे अपने परिश्रम से अपनी तकदीर खुद बनाते है, उन्होंने इस मुल्क को कला, संस्कृति, साहित्य, नृत्य, संगीत, गणंतत्र, बहुलतावाद, प्रकृति के साथ समन्वयन, शांति, करूणा और भाईचारा दिया है, तुम जैसे कूढमगज लोगों ने तो ये शब्द सुने भी नहीं होंगे, उन दलितों और आदिवासियों को ललकारते हो, तुम शायद भूल रहे हो कि देश के इन मूल निवासियों ने तुम्हारे पूर्वजों की तरह अलग मुल्क मांगने की सौदेबाजी नहीं की, इस देश को तोड़ा नहीं, छोड़ा नहीं, इसे रचा है, इसे गढ़ा है, इसलिए आरक्षण जैसा सामाजिक उपचार कोई खैरात नहीं दलितों आदिवासियों का अधिकार है, उनसे मुकाबला मत करो वर्ना मिट जाओगे औवेसी, हम किसी अल्लाह, ईश्वर, गाॅड, यहोवा में यकीन नहीं करते है, कोई वेद, पुरान, कुरान, बाइबिल हमारा मार्गदर्शन नहीं करती, हम अपनी तकरीर और तदबीर खुद रचते है, बेहतर होगा कि इस मुल्क के मूल निवासियों को कभी मत छेड़ो, वर्ना वो हश्र करेंगे कि तुम जैसे देशद्रोहियों और संविधान विरोधियों की रोम-रोम कांपने लगे, हमें मत ललकारों, हमें मत छेड़ो और ये गीदड़ भभकियां अपने तक सीमित रखो, आईन्दा दलितों, आदिवासियों के रिजर्वेशन पर कुछ भी कहने से बचो तो ही तुम्हारे हक में अच्छा होगा।
औवेसी, तुम्हें अपने मुसलमान होने पर बड़ा नाज है, हैदराबाद में आने पर बता देने की धमकियां देते हो, जरा हैदराबाद से बाहर भी निकलों, हिन्दुस्तान के हजार कोनों में तुम्हें आम हिन्दुस्तानी कभी भी सबक सिखा देंगे, क्योंकि तुम जैसे कट्टरपंथी की इस मुल्क को कोई जरूरत नहीं है, तुम्हारे बिना यह मुल्क और अधिक अच्छा होगा।
रही बात मुल्क-ए-हिन्दुस्तान को बर्बाद करने की तो तुम जैसे लोगों से कुछ होने वाला नहीं है, इतनी ही ताकत थी तो निजाम हैदराबाद के वक्त फौज के होते दिखा देते मर्दानगी, नहीं दिखा पाये, अब भी नहीं दिखा पाओगे, भारत कभी मिट नहीं सकता यह दाउद इब्राहीमों, टाइगर मेननों, अजमल कसाबों और अकबररूद्दीन औवेसियों के रहमो करम पर नहीं बना है, इसलिये मुल्क की तबाही और बर्बादी के सपने मत पालना, खून खराबे की धमकियां मत देना, तुम्हारे हक में यही अच्छा होगा कि संविधान के दायरे में रहो, कोई शिकायत है तो लोकतांत्रिक संघर्ष करो, भारतीय होने का गर्व करो, क्योंकि किसी भी इस्लामी कंट्री में तो तुम्हें कोई एमएमए भी नहीं बनायेगा किसी गली मौहल्ले में पड़े मिलोगे, यही एक ऐसा देश है जिसमें सब लोग आराम में है, जी रहे है, अपनी-अपनी बकवास भी कर रहे है, फिर भी ऐश कर रहे है, किसी और मुल्क में होकर उस मुल्क को चुनौती देते तो फिर तुम सिर्फ यू-ट्यूब पर ही नजर आते, मगर यह अच्छा देश है, सभ्य और सज्जन लोगों का देश है, कई बार तो लगता है कि डरपोक और कायरों का देश है जिसमें तुम जैसे विषैले नाग फन उठाकर फूंफकारने के बावजूद भी मौजूद है।
अकबरूद्दीन औवेसी, बेशक अपने लोगों के हित में आवाज उठाओ, उनके हक में लड़ो, संघर्ष करो, हम भी करते है मगर मुल्क की तबाही के सपने मत देखना क्योंकि इस तरह की बातें कोई भी भारतीय बर्दाश्त नहीं करेगा, ऐसा न हो कि देश की जवानी जाग जाये और तुम जैसे कट्टरपंथियों, धर्मान्धों और फसादपरस्तों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर निपटें। काश, वह दिन न आये, लेकिन कभी भी आ सकता है बस इतना याद रखना।
जय भीम-जय भारत
(लेखक खबरकोश डॅाटकॅाम के सम्पादक है, उनसे bhanwarmeghwanshi@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते है।)

Saturday, January 19, 2013

उधर चिंतन-इधर चिंता


आम जनता के मुद्दों को भूल गई सरकार
  • भंवर मेघवंशी

सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान से जुड़े प्रदेशभर के 18 जिलों से आए लोगों ने आज समग्र सेवा संघ, दुर्गापुरा में एक दिवसीय बैठक कर जनता के जुड़े मुद्दों पर गहरी चिंता व्यक्त की। जन संगठनों का कहना था कि सरकार के समस्त शीर्ष नेता चिंतन शिविर आयोजित कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ आम जनता एवं जन अधिकारों के मुद्दों में सरकार को कोई चिंता ही नहीं है। जिस यूपीए सरकार ने सूचना के अधिकार और नरेगा जैसे कानून पारित किए वही सरकार उनके क्रियान्वयन में उदासीनता बरत रही है। जनसंगठनों ने चिंता व्यक्त की है कि इसी कारण नरेगा जैसे कानून की स्थिति बिगड़ती जा रही है। नरेगा पर किया जाने वाला व्यय वर्ष 2009-10 में 5 हजार 700 करोड़ था जो घटकर 2 हजार करोड़ रह गया है। जरूरतमंद अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लाभान्वित लोगों की संख्या लगातार घटती जा रही है। केन्द्र सरकार ने तो कोर्ट की अवहेलना करते हुए न्यूनतम मजदूरी देने से भी इंकार किया और राज्य सरकार नरेगा रेट से भी कम मजदूरी देकर लोगों को नरेगा से दूर कर रही है।
नरेगा में भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर होने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गई। लग रहा है कि सरकार नरेगा को खत्म करने को तुली हुई है। इसी प्रकार सूचना के अधिकार की जन्म स्थली रहे राजस्थान में भी सूचना के अधिकार का हाल बुरा है। सूचना आयोग में आयुक्त नहीं होने से सुनवाई नहीं हो रही है। आयोग भी बंद पड़ा है। इसी का नतीजा है कि सूचना आयोग में 11 हजार अपीलें लम्बित पड़ी हैं। इसी तरह वन अधिकार कानून के तहत् परम्परागत वननिवासियों को पट्टे दिए जाने का दावा भी खोखला साबित हो रहा है और सरकार इस कानून के तहत् कहीं भी सामुदायिक अधिकार नहीं दे पा रही है।
जन संगठनों ने केन्द्र की यूपीए सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा है कि सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का अपना चुनावी वादा निभाने में भी विपल रही है तथा नगद हस्तांतरण जैसी योजनाओं के बहाने सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं अन्य अनुदानों को समाप्त करने की कोशिशें कर रही हैं। जनसंगठनों ने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए प्रभावी लोकपाल कानून, व्हिसलब्लोअर कानून, शिकायत निवारण अधिनियम एवं न्यायिक जवाबदेही जैसे जनहित से जुड़े कानूनों को संसद में लटकाए रखने के मामले में भी केन्द्र सरकार की आलोचना करते हुए चिंता प्रकट की कि सरकार पूरी प्राकृतिक संपदा को जनता के हाथों से छीन कर कंपनियों को दे रही है। साथ ही जनता की बुनियादी सुविधाओं का हल मशीनों एवं तकनीक में खोज रही है तथा बिना कानून बनाए ही आधार जैसी परियोजना लोगों पर थोप कर सरकार नागरिकों की नीजता एवं जन समूहों की निगरानी व्यवस्था पर हमला कर रही है।
बैठक में निर्णय लिया कि इन समस्त मामलों पर आंदोलन किया जाएगा तथा राज्य एवं केन्द्र के आगामी चुनावों में इन मुद्दों को चुनावी मुद्दा बनाया जाएगा। साथ ही 2 फरवरी को नरेगा की सातवीं वर्षगांठ के अवसर पर नरेगा एवं सूचना के अधिकार के बेहाल पर एक खुला जन संवाद किया जाएगा। 4 से 8 मार्च को नई दिल्ली में 55 वर्ष की आयु के बुजुर्गों को पेंशन एवं नरेगा को बचाने के लिए एक राष्ट्रीय व्यापी आंदोलन होगा जिसमें राजस्थान से लगभग 5000 लोग जाएंगे। हर गांव में पेंशन परिषद बनाया जाएगा ताकि इस देश के 10 करोड़ बुजुर्ग लोग राजनैतिक दलों से अपनी हालत से सीधा सवाल पूछ सके। 23 से 24 मार्च को राजस्थान इलेक्शन वॅाच राष्ट्रीय इलेक्शन वॅाच (एडीआर) के साथ मिलकर चुनाव सुधार एवं चुनाव पर निगरानी का राष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित कर रहा है।
बैठक में मजदूर किसान शक्ति संगठन, जन चेतना संस्थान, आस्था संस्थान, विविधा, लोकतंत्र शाला, उरमूल ज्योति, समग्र सेवा संघ, मंथन, संकल्प, सृजन, सामाजिक न्याय समिति, सूचना का अधिकार मंच, समाज कार्य एवं अनुसंधान केन्द्र से जुड़े लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए।

Tuesday, January 8, 2013

सारा देश काम शास्त्र का पुनर्पाठ कर रहा है !



संघ के भागवतजी, विवाह को सौदा बता रहे है, कैलाश विजयवर्गीय तमाम सीताओं को लक्ष्मण रेखा की याद दिला रहे है, आसाराम बापू बलात्कार से बचने के आध्यात्मिक नुस्खे बता रहे है, राज ठाकरे बिहारियों को रेपिस्ट बता रहे है, कांग्रेस की जिला कोर्डिनेशन कमेटी के असमिया नेता औरतों के हाथ की मार खा रहे है, राजस्थान कांग्रेस के दो विधायक दलित स्त्री भंवरी देवी के यौनशोषण व हत्या के मामले में जेल में सड़ रहे है, अभिषेक मनु सिंघवी के सेक्स विडियो बाजार में अभी तक उपलब्ध है, हरियाणा का काण्डा हो अथवा हरियाणवी दलित स्त्रियों के रेपिस्ट तथाकथित ऊंची बिरादरी के लोग, कहीं औरत सताई जा रही है तो कहीं यौनशोषित, फिर भी उन्हीं को मर्यादित रहने की सलाहें, पूरे कपड़े पहनने की नसीहतें, कथित बापू, बाबा, धर्म पुरूष सामूहिक रूप से गंदी और बेहूदी टिप्पणीयां कर रहे है, ऐसा लगता है कि यह देश कामशास्त्र का पुर्नपाठ कर रहा है। ब्रह्मचर्य की बातें, संयम की सीखें देने वाला पाखण्डी समाज, भोग की पराकाष्ठा पर पहुंच गया है, नारी को कथित रूप से पूजने वाला हमारा निकृष्ट समाज नारी को या तो देह ही मान रहा है अथवा देवी लेकिन उसे इंसान के रूप में इज्जत, गरिमा और सुरक्षा देने का सहज मानवीय अधिकार देने तक से परहेज करता है, बेहतर हो कि भारतीय पुरूष नारी के मामलों पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने से बचे तथा अपनी अपनी विकृतियों का ईलाज करवायें वर्ना उनका पुरूषत्व तो खतरे में ही है। 

Monday, January 7, 2013

चुनावी राजनीति ही एक मात्र रास्ता नहीं


जन संसद 2012
  • अरुणा रॅाय व भंवर मेघवंशी
भारत में जनता के आन्दोलनों की राजनीतिक पद्धति का लम्बा इतिहास रहा है, लोक सरोकारों के लिये प्रतिबद्ध व्यवस्था विरोधी संघर्षों के आलोक में देखा जाये तो आजादी का आन्दोलन स्वयं ही में एक जन आन्दोलन था, महात्मा गांधी ने आजादी के पश्चात भी सत्ता की राजनीति का हिस्सा बनने की अपेक्षा जनहितकारी आन्दोलन का ही हिस्सा बने रहना स्वीकार किया था, उन्होंने तो तत्कालीन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भी राजनीतिक दल का बाना त्याग कर एक सामाजिक सेवा का जन आन्दोलन बनने तक की सलाह दी थी, हालांकि उसे माना नहीं गया, बिनोबा का भूदान आन्दोलन हो अथवा लोक स्वातंत्रय की रक्षा के लिये लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाया गया आपातकाल विरोधी आन्दोलन जन आन्दोलनों के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुये, नब्बे के दशक के दौरान भारत में जन आन्दोलनों ने पुनः अपनी ऐतिहासिक भूमिकाओं को निभाना शुरू किया तथा इसके बाद से मुख्यधारा राजनीति ओर राजनीतिक विमर्श को जनता के संघर्षों, अभियानों, जन संगठनों व जन आन्दोलनों के मुद्दों ने मथना प्रारम्भ किया, जो आज तक बदस्तूर जारी है।

लोकतंत्र को लोगों के हित के लिये चलाने के लिये समय-समय पर देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों ने अपनी आवाजे उठाई, आर्थिक उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और निजीकरण के लिये भारतीय अर्थव्यवस्था को खोले जाने के बाद धीरे-धीरे ’राज्य’ ने अपनी ’कल्याणकारी’ भूमिका को सीमित कर दिया, जिससे कई उत्पीडि़त व सदियों से वंचित समुदाय पूरी तरह हाषिये पर पहुंच गये, मुख्यधारा राजनीति से लोगों के मुद्दे और जनता की आवाजें गायब होती गई, एक तरफ वैश्विक पूंजी ने कथित समृद्धि की चकाचौंध पैदा की तो दूसरी तरफ आम भारतीयों में दीनता व दारूणता। दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक व महिलाएं कथित विकास की मुख्यधारा की मार को सहन नहीं कर पाये, भूमण्डलीकरण जिसे अक्सर आर्थिक खुलापन कहा गया, उसने एक ही देश में दो देश निर्मित कर दिये, आज यह सर्वविदित तथ्य है कि हमारा देश स्पष्ट रूप से दो भागों में बंटा हआ है, एक निरन्तर समृद्ध होता इण्डिया है, दूसरा लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा भारत है, शायद भारत की यह नियति हो गई है कि वह इण्डिया के रहमोकरम पर जिन्दा रहे या विलुप्त हो जाये।
ऐसे ’भारत के लोग’ जिन्हें मजदूर, किसान, हमाल, मछुआरे, दलित, आदिवासी कुछ भी कह लीजिये, उनके हक में खड़े होने तथा उनकी पीड़ाओं को उजागर करने के काम में जन आन्दोलनों ने महत्ती भूमिका निभाई है। डॅां. बाबा आढव ने महाराष्ट्र में हमालों के लिये ’हमाल पंचायत’ बनाकर सराहनीय काम किया, वे अब बुजुर्गों के गरिमापूर्ण जीवन के लिये वृद्धावस्था में सब बुजुर्गों को पेंशन मिले, इस हेतु पेंशन परिषद के जरिये चल रहे आन्दोलन के केन्द्र में है, बड़े बांधों के विरूद्ध चले नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने विकास की पूरी बहस को नया मोड़ दिया तथा विस्थापन व पुनर्वास के मुद्दे को पूरी शिद्दत से उठाया, रजस्थान के ग्रामीण मजदूर किसानों ने ब्यावर के चांग गेट से सरकारी कागजों की फोटोकॅापी लेने की मांग उठाई, जो अन्ततः लम्बे संघर्ष के बाद आज सूचना का जन अधिकार का कानून बन पाया है, देश भर के सैकड़ों जन समूहों ने ’काम का अधिकार’ पाने के लिये लम्बा आन्दोलन चलाया, फलतः महात्मा गांधी नरेगा जैसा कानून पास हुआ और आज वह ग्रामीण भारत की जीवन रेखा बना हुआ है।
पंचायती राज उपबंध अधिनियम हो अथवा परम्परागत वन निवासियों को भूमि देने का वन अधिकार मान्यता अधिनियम, शिक्षा का अधिकार कानून हो अथवा अन्य कई सारे जनहितकारी कानून, ये सभी जन आन्दोलनेां के निरन्तर संघर्षो की बदौलत ही संभव हो पाये है।
आज भी जन आन्दोलन देश के राजनीतिक विमर्श को अपने कई मुद्दों के जरिये मथे हुये हैं, खाद्य सुरक्षा बिल, लक्षित साम्प्रदायिक हिंसा कानून, शिकायत निवारण कानून, व्हिसल ब्लोअर बिल, बीज अधिनियम इत्यादि बहुत से अधिनियम अभी भी देश की औपचारिक संसद में पारित होने की प्रतीक्षा में अटके हुये हैं, संसद कभी भ्रष्टाचार के एक मुद्दे पर तो कभी एफडीआई पर गतिरोध का शिकार हो रही है, जिस संसद को जनता के हित में कानून बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी, वह हंगामों के चलते चल नहीं पा रही है और जनता ठगी सी महसूस कर रही है। यह भी देखा गया कि जब संसद को वैश्विक पूंजी के हित में कानून बनाने होते है तो कुछ ही मिनटों में बड़े फैसले कर लिये जाते हैं, पक्ष-विपक्ष आदि एक ही भाषा में बोलने लगते है मगर जैसे ही हाशिये पर धकेल दिये गये तबकों की भागीदारी का सवाल उठता है तो मुद्दों में पेंच फंसा दिया जाता है, देश की आधृी आबादी के लिये राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित कराने के लिये लाये गये 33 प्रतिषत भागीदारी वाले महिला आरक्षण बिल का अटका रह जाना, इसी दुर्भाग्य की ओर इशारा करता है।
खैर, जन आन्दोलनों को मुख्यधारा राजनीति की अन्तरआत्मा कहा जा सकता है क्योंकि जन आन्दोलनों ने न केवल राजनीति को लोक सरोकारी मुद्दों के लिये प्रतिबद्ध किया है बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने में भी अहम भूमिका अदा की है, ओडी़शा मंे पोस्को का संघर्ष हो अथवा महाराष्ट्र में जैतापुर आन्दोलन या वर्तमान में तमिलनाडु मे चल रहा कुडनकुलम का जन संघर्ष, लोगों के पक्ष में जन आन्दोलन ही खड़े दिखाई पड़ते हैं, सरकारें अपने ही नागरिकों के दमन पर उतारू हो गई है, दुर्गम नक्सल इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं पंहुचाने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता डॅा. विनायक सेन को नक्सलवादी बताकर जेल में रखा गया, सीमा आजाद को उम्र कैद की सजा सुनाई गई, डॅा. सुनीलम को मुलताई आन्दोलन के जरिये किसानों की बात उठाने की सजा आजीवन कारावास के रूप में मिली है और झारखण्ड की जेल में आदिवासी अधिकारों की संघर्षशील नेत्री दयामणी बारला सलाखों के भीतर कैद है, राजस्थान के अन्यायपूर्ण उत्खनन के विरोधी कार्यकर्ता कैलाश मीणा अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिये भागते फिर रहे है तो कबीर कला मंच की शीतल साठे अपने तमाम सारे कलाकार साथियों के साथ भूमिगत जीवन जीने को मजबूर है, फेसबुक पर एक टिप्पणी मात्र से दो लड़कियां गिरफ्तार कर ली जाती है, तो कुडनकुलम के हजारों नागरिकों पर देशद्रोही होने का मामला चलाया जाता है, ऐसे में हमारे लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की निरन्तर सीमित होती जा रही पहचान को बचाने के लिये आज देश में जन अन्दोलन ही एक मात्र उम्मीद की किरणें बने हुये हैं, वे गरीबों के हर संघर्ष में साथ खडे है, वे इरोम शर्मिला के आमरण अनषन से लेकर डॅा. सुनीलम और दयामणी बारला तक, खाद्य सुरक्षा एवं लोकपाल से लेकर महिला आरक्षण बिल पारित कराने तक, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक तथा महिला जैसे वंचित व उत्पीडि़त तबकों के सबसे मुखर पैरोकार बने हुये हैं। जन आन्दोलनों ने यह साबित कर दिया है कि उनका संघर्ष चुनावी राजनीति से बुहत ज्यादा महत्वपूर्ण है तथा वहीं मुख्यधारा राजनीति के चरित्र को पुनः लोकोन्मुखी बनाने की दिशा में कामयाब होगा।
दिल्ली में देशभर के 53 जन संघर्षों, अभियानों व आन्दोलनों द्वारा 26 से 30 नवम्बर तक जंतर मंतर पर की गई ’जनसंसद’ को भी जनआन्दोलनों को उसी लोक राजनीति का फलित माना जा सकता है, इस जन संसद का उद्घोष लोकतंत्र की पुर्नप्राप्ति था, जैसा कि विदित है कि 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने आजाद भारत का संविधान स्वीकारा था, उसी ऐतिहासिक मौके पर 63 वर्ष बाद 26 नवम्बर 2012 को संविधान को केन्द्र में रखकर यह जन संसद की गई तथा पूछा गया कि नागरिको को दी गई संवैधानिक गारण्टी का क्या हुआ, हमारे मौलिक अधिकार हमें मिल पाये या नहीं ? हमने क्यों नीति निर्देशक तत्वों की देश की नीतियां बनाने में अवहेलना कर दी ? इतना ही नहीं बल्कि इस जन संसद ने पूंजी के हित में काम कर रहे नेताओं, जन विरोधी नीतियों और सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाये।
यह भी साबित किया कि देश के नागरिक सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष को तैयार है, जन आन्दोलनों की जन संसद तक की यात्रा हमारे लोकतंत्र को राह पर लाने की ही कवायद है, असल में यह असली जनतंत्र को कायम करने की दिषा में एक और समेकित प्रयास के रूप में देखी जा सकती है, देश भर के जन आन्दोलनों के 700 लोगों का पांच दिनों तक लगातार जंतर मंतर पर डटे रहना तथा देश की औपचारिक संसद को यह सन्देष देना कि आप भले ही शोरगुल मचाओ और संसद मत चलने दो मगर देश की साधारण जनता को लोकतंत्र व संविधान की चिन्ता है तथा वह संसदीय ढांचों को महत्वपूर्ण मानती है इसलिये इस जन संसद के जरिये उन मुद्दों को उठा रही है जिन्हें कायदे से तो चुने हुये प्रतिनिधियों को चुनी हुई संसद में उठाना चाहिये था, मगर जब औपचारिक संसदीय ढांचे विचलन व विभ्रम के शिकार हो जाते हैं तो इसी प्रकार की जन संसदीय जन प्रक्रियाएं उन्हें पुनः राह पर लाने का काम करती हैं तथा ऐसे वक्त में मात्र जनता के प्रतिनिधि नहीं बल्कि जनता स्वयं बोलने लगती है। यही भारत में जन आन्दोलनों की सार्थकता है कि इन्होने पुनः जनता को ही सशक्त किया है तथा जिस सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता की उम्मीद डॅा. अम्बेडकर ने संविधान लागू करते वक्त की थी, उसकी प्राप्ति के लिये फिर से कमर कसी है, इतना ही नहीं बल्कि जन संसद के दौरान देश भर के लगभग सभी नामचीन जन संघर्षकारियों का एक मंच पर आकर जन संसद के जरिये अपने मुद्दों को उठाना और एक सामूहिक ’जन घोषणा पत्र’ की उद्घोषणा करना भी महत्वपूर्ण रहा है।
जन संसद के जन घोषणा पत्र में उठाये गये मुद्दों ने वर्ष 2014 में होने जा रहे लोकसभा चुनाव के लिये राजनीतिक दलों को एजेण्डा प्रदान कर दिया है तथा यह ताल ठोंक दी है कि हम तय करेंगे कि किन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जायेगा ? 2014 चुनाव एक लक्ष्य है, जन संसद को उसकी उल्टी गिनती भी माना गया, यह केवल एक आयोजन मात्र नहीं बल्कि ठोस कार्यक्रम भी है तथा हमारी चुनी हुई संसद को चेतावनी भी कि वह जनहित के जितने भी कानून वर्तमान सत्र व शेष बचे समय के दौरान लाये तथा पारित करे तथा हवाई व भावनात्मक तथा विभेदकारी मुद्दों पर नहीं जनता के बुनियादी मुद्दों को केन्द्र में रखकर चुनाव में उतरें। अन्यथा जनता उन्हें नकार देगी।
इस जन संसद के जरिये हमने अपने संविधान, उसमें प्रदत्त मौलिक अधिकार, नीति निर्देषक तत्वों को याद किया, संविधान की प्रस्तावना को दोहराया तथा लोकतंत्र की पुर्नप्राप्ति के लिये एक अनूठी शपथ भी ली, जिस तरह देश भर के जन आन्दोलनकारियों से लेकर देश भर के बुद्धिजीवी, मीडियाकर्मी, पूर्व जस्टिस, वकील, मजदूर, किसान, दलित, अदिवासी व महिला समूहों के प्रतिनिधियों ने जन संसद के जरिये दिल्ली में दस्तक दी है, वह देश की मुख्यधारा राजनीति को दिशा देने की जन आन्दोलनों की ऐतिहासिक प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाने का कार्य प्रतीत होता है तथा स्पष्ट भी करता है कि जनता और उसके द्वारा खड़े किये गये आन्दोलन देश के लोकतंत्र को पुनः पटरी पर लाने में सक्षम है, उसके लिये चुनावी राजनीति ही एक मात्र रास्ता नहीं है।

अम्बेडकरी मिशन के सच्चे सिपाही डॅा. एम.एल. परिहार


-: व्यक्तित्व : -

  • लेखक - भंवर मेघवंशी
एम. एल. परिहार
सामंती राजस्थान के अतिसांमती जिले पाली की देसूरी तहसील में एक छोटा-सा गांव है करणवा। जातिवाद और सामंतवाद का भयानक मिश्रण जहां पर दलित अक्सर अपनी पूरी जिन्दगी हाली (बंधुआ मजदूर) के रूप में गुजारने को अभिशप्त थे, मंदिर में जाने पर दलितों की पिटाई होती थी, गांव के कुंए से पानी नहीं भरने देते थे, राजपूतों के मौहल्ले से साईकिल पर बैठ कर जाना मना था, अच्छे कपड़े पहनने की इजाजत नहीं थी, दलित औरतें आभूषण नहीं धारण कर सकती थी, गांव की हथाई पर दलितों को नहीं चढ़ने दिया जाता था, ज्यादातर दलित सवर्ण जातिवादी हिन्दुओं के पशु चराते या उनके खेतों में काम करके जीवन जीने को मजबूर थे, ऐसे भयानक माहौल में 14 अगस्त 1960 के दिन गांव की दलित मेघवाल जाति में एम.एल. परिहार का जन्म हुआ। पिताजी खेतीहर मजदूर तथा मिस्त्री का काम करते थे, मां गृहिणी। पिता कबीर के भजन गाया करते थे। गांव में दलित समुदाय के बच्चों के लिए पढ़ने का कोई माहौल नहीं था, फिर भी एम.एल. परिहार को गांव की स्कूल में पढ़ने भेजा गया, जहां से उन्होंने चौथी कक्षा उर्तीण की, पांचवी कक्षा के लिए 10 किलोमीटर दूर ढालोप और छठी कक्षा के लिए 12 किलोमीटर दूर नाड़ोल पढ़ने जाना पड़ा, यातायात के कोई साधन तो थे नहीं, पैदल ही, बिना जूते के, नंगे पांव 12 किलोमीटर जाना और 12 किलोमीटर आना यानि कि हर दिन 24 किलोमीटर का सफर तय करके पढ़ने की कोशिश में लगे थे 12 वर्षीय किशोर एम.एल. परिहार, पढ़ने की अद्भूत लगन, उत्कट इच्छा और अदम्य अभीत्सा लिये . . .।
उन दिनों को याद करते हुए पशुपालन विभाग, जयपुर के संयुक्त निदेशक डॅा. एम. एल. परिहार कहते है – ‘‘हालांकि परिस्तिथियां बहुत विपरित थी, मगर उन दिनों एक अलग ही माहौल था, दलितों में पढ़ने की बहुत रूचि थी।’’ शायद इसी अध्ययन की रूचि ने परिहार के प्रारम्भिक अध्ययन की बहुत ही मजबूत नींव डाली, वे 7वीं से 12वीं कक्षा तक पढ़ने के लिए पाली जिले के ही रणकपुर सादड़ी कस्बे के समाज कल्याण विभाग के छात्रावास में रहे, छात्रावास का जीवन उनकी जिन्दगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ, हॅास्टल के वार्डन थे हरिराम मेघवाल, उनके कमरे में बाबा साहब अम्बेडकर की तस्वीर लगी हुई देखी पहली बार, उनसे ही जाना कि – ‘‘इस महापुरूष ने हम दलितों व गरीबों के लिये बहुत काम किया, इनका नाम डॅा. भीमराव अम्बेडकर है।’’ बाद में अम्बेडकर के बारे में पढ़ा, लाइब्रेरी से। बाहर से आने वाले अफसरों से मिले तो अम्बेडकरी साहित्य से परिचय हुआ, छोटी-छोटी अम्बेडकर जयंती मनने लगी। करणवा गांव में व्याप्त छुआछुत और राजपूतों के आंतक, मेघवाल जाति के लालची पंच पटेलों के अमानवीय फैसलों और धार्मिक अंधविश्वासों से निजात पाने में उन्हें अम्बेडकर के विचार बहुत क्रांतिकारी लगे, उन्होंने अधिकाधिक अम्बेडकरी मिशन का साहित्य पढ़ना आरम्भ किया और उनकी विचारधारा मजबूत होने लगी।
डॅा. परिहार बताते है कि – ‘‘उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र निवासी अजा/जजा वर्ग के अधिकारी कर्मचारी अम्बेडकरवादी साहित्य और विचारधारा के प्रचार-प्रसार में उन दिनों अग्रणी थे, उनके सम्पर्क में आने से मुझे काफी जानकारियां मिली, जब बाबा साहब को पढ़ा, हिन्दुत्व के कर्मकाण्ड और पाखण्ड को देखा तथा सवर्ण हिन्दुओं के अमानवीय व्यवहार को सहन किया तो सहज ही बुद्धिज्म की मानवता, समानता और नैतिकता की ओर आकर्षित हो गया। डॅा. एम. एल. परिहार ने बाबा साहब के साहित्य का अध्ययन करने के पश्चात धार्मिक, आर्थिक व सामाजिक शोषण से मुक्ति के लिए तथागत गौतम बुद्ध की राह पकड़ ली, आज वे एक सच्चे बौद्ध की भांति जीवन जीने का ईमानदारी से प्रयत्न करते है तथा लोगों को भी बुद्ध की देशना से अवगत कराते है।
खैर, रणकपुर सादड़ी के समाज कल्याण छात्रावास में अध्ययन के दौरान परिहार तथा उनके साथी दलित छात्र पढ़ने, खेलने, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने तथा छात्रावास के खेतों में काम करने में सदैव अग्रणी रहे, स्वयं के कमाये पैसों से पढ़ने का खर्चा निकालते थे, दौर ही भीषण था, अभावों से भरी जिन्दगी, न पहनने को जूते, न पर्याप्त वस्त्र, कभी कभी तो खाना भी पूरा नसीब नहीं होता। मगर अध्ययन की अतृप्त भूख ने पढ़ने से कभी विमुख नहीं होने दिया, संसाधनों के अभाव की चुनौतियों को पार करते हुए वे पाली के बांगड़ कॅालेज गये तथा बाद में बीकानेर के वेटेनरी कॅालेज में दाखिल हो गए, पांच साल में वहीं से डॅाक्टर व सर्जन की डिग्री ली तथा बाद यहीं से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद आई.सी.ए.आर की नेशनल फैलोशिप मिल गई तो पढ़ाई और रहने का खर्चा भी निकल आया, 29 वर्ष की उम्र तक पढ़ाई की, 7 वर्षों तक का बीकानेर प्रवास उनके लिए अविस्मरणीय रहा, इस दौरान पेम्पलेट छापकर सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक अंधविश्वासों के खिलाफ जमकर काम किया, जन समर्थन भी मिला और कभी-कभी समाज के रूढि़वादी तत्वों से भिड़ना भी पड़ा लेकिन धुन के पक्के परिहार लगे रहे, अनवरत, अनथक यात्री की भांति।
ये छोटे-छोटे समाज सुधार के पत्रक डॅा. परिहार की विचारधारा निर्माण की नींव के पत्थर बने, फिर उन्होंने अपने विचारों के वितान को विस्तृत करना आरम्भ कर दिया, सन् 1980 में उन्होंने राजस्थान पत्रिका और नवभारत टाइम्स के ‘लेटर टु एडीटर’ स्तम्भ हेतु पत्र लिखने शुरू किये, सम्पादकों ने जगह दी तो प्रोत्साहन मिला, हिम्मत बढ़ी और उन्होंने कलम को सामाजिक बदलाव का उपकरण बना लिया। विचारधारा तो बाबा साहब, कबीर और फुले बुद्ध को पढ़ने से मजबूत हो ही गई थी, इस दौरान सरिता मुक्ता प्रकाशन के रिप्रिन्ट भी उन्होंने पढ़े, इनमें लिखा भी, इसी दौरान बीकानेर में एस.सी. डावरे से भी मिलना हो गया, उनसे भी विचारधारा को आगे बढ़ाने में मदद मिली।
डॅा. परिहार मानते है कि ‘‘यू.पी. के जाटव समाज के लोगों ने उत्तर भारत में अम्बेडकरवादी विचारधारा को बहुत बढ़ाया, लोगों को गुलामी का अहसास कराया और उन्हें जागृत किया।’’ मैंनें जिज्ञासावश एक सवाल डॅा. परिहार से पूछ लिया कि – ‘‘आपके जमाने में तो शिक्षक बनने का जबरदस्त ट्रेण्ड था, आप पशु चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में कैसे चले गये ?’’ डॅा. परिहार मुस्कुराते हुए बोले – ‘‘हां, मैं भी शिक्षक ही बनना चाहता था, मगर उन दिनों सामाजिक कुरितियों को बनाए रखने में जिस प्रकार शिक्षक अपनी भूमिका निभाते थे, वे मौसर, गंगोज, मृत्युभोज, प्रसादी, जागरण जैसी कुरीतियों व पाखण्डो को बढ़ावा देते थे, इसलिये मुझे वितृष्णा हो गई। मैंने गंगोज, मौसर की बहुत खिलाफत की, मेरे पिताजी को इस कारण पंच पटेलों ने कई बार जाति से बहिष्कृत कर दिया, मगर मैं डटा रहा क्योंकि मैंने देखा जिस घर में मृत्युभोज होता, उसके बच्चे पढ़ाई छोड़कर या तो पाली की फैक्ट्रियों में चले जाते अथवा राजपूतों के खेतों में हाली (बंधुआ मजदूर) बन जाते थे। रही बात विज्ञान की तो मेरी प्रारम्भ से ही विज्ञान में रूचि थी, 9वीं कक्षा में मेरा एक जैन मित्र था हम दोनो ने बायलॅाजी ली, पढ़ाई में ठीक ठाक था, मैथ्स में कमजोर मगर विज्ञान में विशेष दक्षता अंक प्राप्त करता, पाली के बांगड़ कॅालेज से मैंने विज्ञान स्नातक की डिग्री ली। विज्ञान विषयक रूचि ने मुझे वैज्ञानिक सोच की तरफ आकर्षित किया और मैं पाखण्डों व अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ पाया।’’
लडाकू और संघर्षशील तो एम. एल. परिहार सदैव से ही रहे, सामाजिक सुधार के पत्रकों का प्रकाशन हो अथवा पाठक पीठ में धार्मिक अंधविश्वासों पर प्रहार, वे कभी पीछे नहीं रहे, धर्मान्धता, जातिवाद और सवर्ण हिन्दुओं के झूठे अभिमान को भी उन्होंने खूब ललकारा। नतीजतन कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने उन्हें धमकियां दी, ‘बोटी बोटी काट देंगे’ जैसे धमकी भरे पत्र भी मिले, धार्मिक ग्रंथों की विसंगतियों और देवी देवताओं के विरूद्ध बोलना सहज नहीं था। आर.एन.टी. मेडीकल कॅालेज  उदयपुर के एक छात्र इन्दु लल ने जब धर्म परिवर्तन कर लिया तो डॅा. परिहार ने उसका समर्थन करते हुए लिखा – ‘‘इन्दुलाल, पीछे मत हटना, हम तुम्हारे साथ है।’’ यह लेख नवभारत टाइम्स ने छापा, खलबली मच गई। नाथद्वारा के मंदिर में दलितों के प्रदेश के आन्दोलन के वक्त प्रो. के.एल. खवास, रतन कुमार सांभरिया और डॅा. एम.एल. परिहार की तिकड़ी ने खूब लिखा। आज भी डॅा. एम.एल. परिहार अध्ययन व लेखन का काम नियमित रूप से पूरा करते है, वे सैकड़ों पत्र पत्रिकाओं पढ़ते है तथा उनका प्रचार प्रसार भी करते है, लगभग हर दूसरे दिन उनका एक आर्टीकल प्रकाशित होता है। पशु चिकित्सा पर उनकी लिखी तकरीबन 20 पुस्तकें पूरे देश में हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है, उनके घर पर एक डॅाग क्लिनिक भी है, जहां वे कुत्तों की चिकित्सा करते है, अपनी ड्यूटी भी पूरी मुस्तैदी से निभाते है। हर हफ्ते दैनिक भास्कर में एज ए डॅाग स्पेशलिस्ट उनका एक कॅालम छपता है, सामाजिक बदलाव के हर प्रयास को उनका समर्थन मिलता है, अम्बेडकर, फुले, बुद्ध व कबीर की विचारसरणी की हर पत्र पत्रिका को वे आर्थिक व लेखकीय सहायता करते है और आम दलितों, गरीबों, मजदूरों व किसानों के आंदोलनों में भी शिरकत करते है। एक कुशल प्रशासक, दक्ष सर्जन, लोकप्रिय लेखक, सहृदय व्यक्ति और अम्बेडकर मिशन के सच्चे सिपाही के रूप में डॅा. एम.एल. परिहार सदैव सक्रिय नजर आते है। मैनें उनसे जानना चाहा कि आप इतनी सारी भूमिकाएं एक साथ कैसे निभा लेते है ? बेहद साधारण सा जवाब था उनका – ‘‘समय का प्रबंधन, बाबा साहब के पास भी हमारी तरह 24 ही घंटे थे, उन्होंने इतने ही समय में समाज को बहुत कुछ दे दिया, हम भी तो कुछ करें, समय का अपव्यय नहीं करें। ‘‘डॅा. परिहार पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड, क्रिकेट तथा टी.वी. आदि से समय बचाकर लेखन, अध्ययन व समाजकर्म के लिये निकालते है, कितने लोग है जो अपनी सुख सुविधा में, मनोरंजन के समय में कटौती करके सामाजिक बदलाव के लिए काम कर पाते है, बहुत ही कम, सब अपने अपने ‘कंफर्ट जोन’ में है, सबने अपनी सुविधाओं के दड़बे बना रखे है, अधिकांश तो ऐसे है, जिन पर अकबर नजीराबादी का एक शेर बिलकुल फिट बैठता है -
क्या करे अहबाब, कार-ए- नुमायां कर गये
पैदा हुये, बी.ए. किया, नौकरी मिली पैंशन पाई और मर गये !
इस मलाईखाऊ, नौकरीपेशा, सुविधाभोगी शहरी वर्ग की डाॅ. परिहार ने समय-समय पर खबर ली है तथा उन्हें अपने पिछड़ गए समाज बंधुओं के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास कराया है, इसीलिये पदौन्नति में आरक्षण के सवाल पर उन्होंने उच्च पदों पर बैठकर समाज से कट गए अफसरान को जमकर लताड़ा, यह उस वर्ग को चुभा भी, विरोध भी हुआ, डॅा. परिहार को वर्गद्रोही भी समझा गया, मगर वे अपने विचारों पर दृढ़ रहे, उन्होंने धैर्य रखा, आपा नहीं खोया, आज वे ही लोग, जिनके खिलाफ उन्होंने लिखा, मानने लगे है कि उन्हें आम दलित समाज के सुख दुख में भागीदार होना चाहिए। धीरे-धीरे ही सही मगर डॅा. एम.एल. परिहार दलित वर्ग के भीतर एक असहमति और आत्म आलोचना की आवाज के रूप में उभर कर सामने आये है और आज एक दलित आलोचक के रूप में उन्हें व्यापक सामाजिक मान्यता मिलने लगी है। डॅा. परिहार स्वयं स्वीकारते है कि सामाजिक कुरितियों, मूर्तिपूजा व धार्मिक पाखण्डों के खिलाफ लिखता हूं तो भले ही जो दलित इसमें आकंठ डूबे हुए है, वे भी अब कहने लगे है कि – ‘‘बात तो सही है हमें इससे उबरना चाहिए।’’ सही बात है, वातावरण बनेगा तो लोग इससे निकलेंगे, क्योंकि जिन पत्र पत्रिकाओं में डॅा. परिहार अपने तीखे, नुकीले आलोचनात्मक लेख लिखते है, उसका पाठक वर्ग उनके लेखों की मांग करता है। लेकिन उन्हें लगता है कि जिस भांति धार्मिक कट्टरवाद बढ़ रहा है, उससे चिन्तक, आलोचक व लेखक के लिये अभिव्यक्ति के रास्ते कम होते जा रहे है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरेदारी का बढ़ना निश्चय ही खतरनाक संकेत है।
अम्बेडकरवादी, बुद्ध और धार्मिक अंधविश्वासों के विरूद्ध वैज्ञानिकता व तर्कशील प्रकाशनों के प्रचार प्रसार में जुटे हुए डॅा. परिहार मानते है कि जब तक दलित समाज वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से जागृत नहीं होगा तब तक उसकी राजनीतिक जागृति का कोई मतलब नहीं है। जो लोग विचारधारा को फैलाने में बेहद मुश्किल परिस्थितियों में प्रकाशन करते है, उन्हें सहयोग देना डॅा. परिहार अपना फर्ज मानते है। फर्ज चाहे सामाजिक हो अथवा पारिवारिक सब दायित्वों को डॅा. परिहार ने बखूबी निभाया है, गांव में रहने वाले बुजुर्ग मां बाप की सेवा हो अथवा अपने भाईयों, भतीजों व भाणजों की पढ़ाई लिखाई, उन्होंने अपनी भूमिका और फर्ज की कभी अनदेखी नहीं की, वे जानते है कि सामाजिक बदलाव की शुरूआत खुद से और परिवार से ही होती है, तभी दूसरे लोग उसे स्वीकारते है, वरना तो करनी के बिना शब्द कोरे ही रहे जाते है। सम्प्रति डॅा. एम.एल. परिहार की पत्नि मंजु परिहार जयपुर में स्थित राजस्थान कॅालेज अॅाफ आर्ट्स में ड्रांइग एण्ड पेंटिंग की प्राध्यापिका है, बेटी आई.आई.टी. मुम्बई में अध्ययनरत है तथा वहीं बेटा नेशनल इन्स्टीट्यूट अॅाफ  डिजाइनिंग, अहमदाबाद में पढ़ रहा है। एक सुशिक्षित, सुसंस्कृत और मिशन व विचारधारा को समर्पित बौद्ध परिवार के मुखिया डॅा. एम.एल. परिहार फिलहाल पशुपालन निदेशालय जयपुर में संयुक्त निदेशक के तौर पर सरकारी सेवा में है। वे एक अच्छे वक्ता, रचनात्मक आलोचक, गहन अध्येयता, तर्कशील उपासक और मृदुभाषी सरलमना व्यक्ति है। बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व के धनी डॅा. एम.एल. परिहार दलित समाज के सुविधा व शक्ति सम्पन्न समृद्ध तबके को स्पष्ट चेतावनी देते है कि जो समाज बंधु पीछे रह गये है उन्हें जितना जल्दी हो सके साथ ले लो, वरना आम दलित एक दिन बगावत कर देगा।
निश्चित रूप से मैं डॅा. एम.एल. परिहार की इस चेतावनी से सहमति व्यक्त करता हूं कि जिन्होंने भी बाबा साहब अम्बेडकर के प्रयासों से मिले राजनीतिक व प्रशासनिक आरक्षण से सुविधाएं हासिल की है, वे उनका लाभ वंचित दलित तबके तक भी पहुंचावें ताकि एक समानतापूर्ण समाज बन सके, वैसे भी वंचित दलित समाज को सम्पन्न दलित समाज के समय, हुनर, बुद्धि और धन तथा सहयोग की सख्त जरूरत है। डॅा. परिहार केवल ऐसा सोचते ही नहीं है, वे ऐसा करते भी है, इसलिए उनका अधिकांश समय बाबा साहब के मिशन को आगे बढ़ाने में लगता है, वे सैकड़ों मिशनरी पत्र पत्रिकाओं को खरीदते है और उनका प्रचार करते है, ग्राहक बनाते है एवं उनके लिए लिखते है तथा कुछेक को तो सम्पादित भी करते है, वाकई, डॅा. परिहार की भांति हमारे समुदाय के हर सक्षम व्यक्ति हो जाए तो हम महज कुछ ही सालों में पूरे देश के दलित समाज को सक्षम बना पाने में सफल होंगे और इसके लिए डॅा. परिहार जैसे हजारों मिशनरियों व अम्बेडकर, फुले, बुद्ध व कबीर की विचारधारा के सच्चे सिपाहियों की हमें जरूरत है। डॅा. परिहार जैसे सच्चे मिशनरी कामरेड को जय भीम, जय जय भीम !

हाथों के बजाय खातों में देने की फ्लॅाप स्कीम


अरूणा रॅाय-भंवर मेघवंशी 
केंद्र सरकार द्वारा ‘गेम चेंजर’ और ‘जादू की छड़ी’ कहकर प्रचारित की जा रही नकद हस्तान्तरण योजना की राजस्थान में पहले ही दिन पोल खुल गई, ‘आपका पैसा-आपके हाथ’ जैसे लुभावने नारे बावजूद यह फ्लॅाप शो ही साबित होती दिख रही है। समाचारों के अनुसार राजस्थान के तीन जिलों में इसकी शुरूआत की गई है, अजमेर जिले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा संप्रग की मुखिया सोनिया गांधी ने आधार कार्ड योजना री-लांच की थी। योजना के पहले दिन के हालात इस प्रकार रहे, अजमेर में पहले दिन 22 हजार लाभार्थियों में से केवल 527 लोगों को लाभ, 2 लाख लोगों के आधार कार्ड बनने थे, बने सिर्फ 6 लाख के, उदयपुर जिले में 16 हजार 500 लाभार्थियों में से महज 800 लोगों के ही बैंकों में खाते खुल पाये है, ऐसा ही हाल बहुप्रचारित अलवर जिले का है 99 हजार 174 लोगों के आधार कार्ड बने है, जिनमें से 84 हजार के ही बैंक खाते खुल पाये है।
यह हालत तो तब है जबकि अलवर, अजमेर तथा उदयपुर जिलों का पूरा प्रशासन महीने भर से सिर्फ इसी कवायद में लगा हुआ है। बावजूद इसके भी जो उपलब्धि हासिल हुई है उसे खोदा पहाड़ और निकली चूहियां की उक्ति को चरितार्थ करने वाला ही कहा जा सकता है। हम मानते है कि किसी भी नई चीज के मूल्याकंन के मापदण्ड होते है कि उसके जरिये लोगों को नया क्या मिला ? क्या लक्षित फायदा और उद्देश्य पूरे हुये है तथा अगर उपरोक्त मापदण्ड पूरे नहीं हुये है तो क्या सरकार इन महत्वाकांक्षी योजनाओं की समीक्षा करेगी, क्या इन्हें रोक देगी और बहुत सारी जगहों की अपेक्षा एक दो जिलों में इसे पूरी तरह से लागू करके देखेगी। हालांकि सरकार ने पहले 53 जिलों में 36 स्कीमों में नकद हस्तांतरण की बात कही थी, लेकिन अब वह 20 जिलों में ही इसे कर रही है, इसमें भी कई योजनाएं तो ऐसी है जिनमें पहले से ही बैंक खातों में ही राशि दी जा रही थी, जैसे कि स्कॅालरशिप स्कीम्स् और जननी सुरक्षा योजना इत्यादि, जिनका पैसा पहले ही बैंकों के जरिये ही मिल रहा था, तब प्रश्न उठता है कि इस ‘गेम चेंजर कैश ट्रांसफर स्कीम’ ने आम लोगों को नया क्या फायदा दिया है ? शायद कुछ भी नहीं बल्कि फायदे के बजाय समस्याएं ज्यादा उठ खड़ी हुई है क्यांेकि नकद हस्तांतरण ब्राजील जैसे छोटे देश के लिये, जहां पर गरीबी रेखा के नीचे काफी कम प्रतिशत में लोग गुजर बसर करते है वहां पर सशर्त नकद हस्तांतरण के जरिये पूर्व में दिये जा रहे लाभों के अतिरिक्त लाभ दिये गये थे, मगर भारत में ऐसा नहीं है। सरकार केवल हाथों के बजाय खातों में पैसा भेजकर वाहवाही लूटना चाह रही है जो कि काफी हास्यास्पद और अव्यवहारिक कदम माना जा सकता है।
पहले दिन के परिणामों ने इस योजना के लागू होने में संदेह पैदा कर दिया है, साथ ही नकदी प्राप्त करने में आधार कार्ड की अनिवार्यता और बैंकों में खातों के खुलने में आ रही दिक्कतों के चलते लाभार्थी हतोत्साहित हो रहे है, संभवतः सरकार गरीबों को हत्सोत्साहित करके अनुदानों को खत्म करने की इच्छुक है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी सामूहिक महत्व की योजनाओं को ध्वस्त करना चाहती है।
अजमेर जिले की किशनगढ़ ब्लॅाक की ग्राम पंचायत तिलोनिया की सरपंच कमला देवी आधार कार्ड बनाने में आ रही परेशानियों से बेहद खफा है, वो स्वयं भी अपना कार्ड नहीं बनवा पाई क्योंकि उनके अंगुलियों के निशान तो आते है मगर अंगूठों के निशान नहीं आने से मशीन लेने से इंकार कर देती है। उनके मुताबिक उनकी पंचायत में कई बुजुर्ग तथा विधवा महिलाओं तथा मार्बल व्यवसाय में कार्यरत मजदूरों के फिंगरप्र्रिन्ट नहीं आने के कारण आधार कार्ड नहीं बन पा रहे है। आधार कार्ड नहीं तो बैंक में खाता नहीं खुलेगा और खाता नहीं तो कैश ट्रांसफर नहीं होगा, सरपंच कमला देवी पूछती है कि उन गरीब वृद्ध महिलाओं तथा गर्भवती महिलाओं का क्या होगा, जो आधार कार्ड से वंचित रह गई है ?
आर.के. पाटनी स्नातकोत्तर महाविद्यालय किशनगढ़ के विज्ञान वर्ग के द्वितीय वर्ष के छात्र अजय कुमार गुर्जर बताते है कि वे विशेष पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थी है तथा उनके 68 प्रतिशत अंक होने की वजह से वे देवनारायण छात्रवृत्ति योजना के पात्र है, उन्होंने आधार कार्ड हेतु भी आवेदन किया है तथा वहां से मिली पर्ची के आधार पर स्टेट बैंक आॅफ बीकानेर एण्ड जयपुर में खाता भी खुलवाया है, हालांकि खाता खुलवाना इस युवा के लिये बेहद तकलीफ देह अनुभव रहा, अव्वल तो बैंक ने फार्म ही देने से मना कर दिया कि यही बैंक थोड़े है, दूसरे में जाओं, फिर काफी अनुनय विनय के बाद फार्म मिल गया तो जमा करवाते वक्त लाइन बहुत लम्बी थी, बैंक में एक ही व्यक्ति चार-चार काम कर रहा था, अन्ततः खाता तो खुल गया मगर छात्रवृत्ति नहीं आई। तिलोनिया की सरपंच कमला देवी का भी कहना है कि बैंक वाले खाता खोलने में सहयोग नहीं करते है। वे बताती है कि आधार कार्ड बनाने आये युवाओं को कम्प्यूटर का पूरा ज्ञान ही नहीं है, वे ठेके पर लाये गये अप्रशिक्षित लोग है, अक्सर ग्रामीण क्षेत्र में कम्प्यूटर हेंग हो जाते है, एक दिन में बामुश्किल 30-40 लोगों के आधार कार्ड बन पाते है, शेष लोग कई-कई दिन चक्कर काटने के बाद अपना धैर्य खो बैठते है और स्थितियां मारपीट तक पहुंच जाती है। इस तरह इन योजनाओं का फायदा तो अभी तक कुछ नजर नहीं आ रहा है, परेशानियां जरूर सामने आ रही है।
समय आ गया है कि हम रूककर सोचें कि महानरेगा हो अथवा सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी योजनाओं में तो नकद हस्तान्तरण को लागू न ही करें बल्कि जिनमें इन्हें लागू किया गया है, उनमें भी इसे रोके। अगर आधार कार्ड बेहद जरूरी हो तो हम यह भी करे कि सारे आयकरदाताओं को आधार कार्ड से जोड़ें तथा अमीरी रेखा से उपर जीवन जी रहे लोगों की तमाम आय, सम्पत्ति और बैंक खातों को और भूमि, भवन, वाहन आदि के विवरण को भी आधार के साथ जोड़ दे, ताकि बेनामी सम्पत्तियों और कालेधन जैसी समस्याओं से निजात मिल सके। पर हम ऐसा करने के बजाय केवल गरीबों के पीछे पड़े है तथा उनको निरन्तर हाशिये पर धकेल रहे है।
हमें कैश ट्रांसफर जैसी योजनाओं तथा उनके क्रियान्वयन से भी इसलिये आपत्ति है क्योंकि वे शत प्रतिशत लाभार्थियों को कवर नहीं करती है तथा ये योजनाएं इसलिये भी सफल नहीं हो पाती है क्योंकि जिनका आधार कार्ड अथवा बैंक खाता नहीं होता है वे इससे वंचित रह जाते है, इस प्रकार आधार और कैश ट्रांसफर लाभार्थियों को जोड़ने के बजाय तोड़ने वाली योजनाएं साबित होती है। इससे भ्रष्टाचार रूकने का ढि़ंढ़ोरा भी पीटा जा रहा है लेकिन नरेगा के खातों में भुगतान की समस्याएं तथा बिजनेस कारस्पोडेंट की कार्य प्रणाली स्वयं में ही एक झंझट है फिर सारे व्यापार प्रतिनिधि निजी क्षेत्र से आये व्यक्ति होते है, इनकी कोई जवाबदेही नहीं होती है ऐसे में ये लोग बिचैलिये बनकर दलाली करने लगते है, ओडिशा के गंजाम जिले में तो एक बिजनेस कारस्पोडेंट नरेगा के करोड़ों रूपये लेकर ही भाग गया, वहीं आंध्रप्रदेश में सरपंचों ने अपने ही परिजनों को बिजनेस कारस्पोंडेंट बनाकर घपले और चोरियां करने के नये रास्ते खोल लिये है। अगर नरेगा में ऐसा हो रहा है तो क्या यह स्थिति अन्य योजनाओं में नकद हस्तांतरण में नहीं होगी ? इस पर भी विचार करना जरूरी है।
वैसे तो आधार कार्ड को हम नागरिकों की निजता के अधिकार में हस्तक्षेप मानते है तथा इसके लिये जुटाई जा रही जानकारियों के दुरूपयोग का भी भयंकर खतरा हमें महसूस होता है, यह भी पूछा जाना चाहिये कि सरकार क्यों हजारों करोड़ रूपये लगाकर नागरिकों की एक केंद्रीकृत पहचान के लिये कार्ड बनाने पर जुटी हुई है, सरकारें व्यक्ति या नागरिक को ‘इंसान’ के बजाय एक नम्बर अथवा एक ‘कार्ड’ बना देना चाहती है, कभी वह स्वास्थ्य कार्ड बनाती है, कभी वोटर कार्ड तो कभी आधार कार्ड, लेकिन आम लोगों की जिन्दगी बदलती ही नहीं है, वह जस की तस बनी रहती है। हमें कार्डों में नागरिकों की पहचान बनाने के बजाय उनकी बेहतरी के लिये व्यवहारिक योजनाओं को ईमानदारी से धरातल पर उतारना होगी।