Tuesday, August 25, 2015

अब उन्हें रामदेवरा में दलितों की धर्मशाला भी बर्दाश्त नहीं !


पहले उन्होंने रामदेव पीर को दलितों से छीना ,बाद में  उनकी विरासत पर काबिज़ हो कर मंदिर कब्ज़ा लिया और अब उन्हें रामदेवरा मंदिर के पास में दलितों की एक  धर्मशाला तक मंजूर नहीं है.यह हाल है सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक रूनीजा के रामदेव पीर मंदिर का ,जहाँ पर इन दिनों भव्य मेला सज रहा है .
राजस्थान के जैसलमेर जिले की पोकरण ब्लॉक के रामदेवरा ग्राम में स्थित बाबा रामदेव पीर का मंदिर राजस्थान ,हरियाणा ,पंजाब ,गुजरात ,मध्यप्रदेश ,दिल्ली तथा महाराष्ट्र के करोड़ों रामदेव भक्तों की आस्था का केंद्र है .राजस्थान ,गुजरात तथा मालवा के कईं दलित समुदाय रामदेव पीर को अपना आराध्य देवता मानते है .एक अनुमान के मुताबिक हर वर्ष लगभग 30 लाख लोग रामदेवरा पंहुचते है .करोड़ों रूपये का चढ़ावा आता है ,जिसे रामदेव पीर के वंशज होने का दावा करने वाले लोग आपस में मिल बाँट कर हज़म कर जाते है .
रामदेव पीर के बारे में यह कहानी प्रचारित की हुयी है कि वो विष्णु के चौबीसवें अवतार थे और रूनीजा के राजा अजमल सिंह तंवर के घर पर अवतरित हुए थे.इस तरह की कहानियों को भजनों के माध्यम से रामदेव पीर से लगभग तीन सौ बर्ष बाद पैदा हुए हरजी भाटी नामक लोककवि ने गा गा कर प्रचारित किया था .आज़ादी के बाद के वर्षों में एक स्थानीय बारेठ कवि ने ‘खम्मा खम्मा ‘ नामक गीत रचा ,जिसे तन्दूरे पर गाया जाता है ,जिसमें भी रामदेव पीर के अजमल तंवर के घर आकर पालने में सोने की चमत्कारिक कहानी बताई गयी है .इस तरह रामदेव पीर और उनके चौबीस चमत्कार जिन्हें पर्चे कहा जाता है ,बड़े लोकप्रिय हो गए .लोगों ने चमत्कार की कहानियों पर उसी तरह यकीन कर लिया ,जिस तरह रामदेव पीर का तंवर वंश में जन्म लेने की कहानी पर किया था  ,जबकि सच्चाई इसके ठीक विपरीत रही है ,जिसे कभी भी बाहर नहीं आने दिया गया .
क्या यह संभव है कि कोई भी इन्सान या लोकदेवता या कथित अवतार बिना स्त्री पुरुष संसर्ग से पैदा हो सके ? नहीं ना ? फिर रामदेव कैसे सीधे ही खुद ही चल कर बिना जन्म लिए ही अजमल तंवर के बेटे वीरमदेव के साथ पालने में आ कर सो गए ? यह पूरी कहानी ही बनावटी लगती है . तंवर वंश के लोग यह बता सकते है कि उनके भाटों की पौथी में रामदेव जी का जन्म वर्णित क्यों नहीं है ? अगर नहीं तो फिर रामदेव पीर अजमल जी के पुत्र कैसे हुए ? या अगर वे माता मैना देवी के पुत्र थे तब यह सवाल उठेगा कि मैनादेवी ने एक के तुरंत बाद दूसरी संतान को कैसे जन्म दे दिया ? आस्थावान लोग रामदेवजी को अलौकिक और अवतारी पुरुष मानेंगे ,उनकी आँखों पर भक्ति का अँधा चश्मा चढ़ा हुआ है ,उनसे कुछ भी कहना व्यर्थ है ,मगर समझदार लोग तो सोच सकते है कि आखिर रामदेव पीर की पैदाइश का रहस्य क्या है ?
इस रहस्य से सबसे पहले पर्दा जोधपुर के उत्तम आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी रामप्रकाशाचार्य जी महाराज ने उठाया ,उन्होंने ‘रामदेव गप्प पुराण तथा ढोल में पोल ‘ नामक किताब लिख कर कईं सवाल खड़े किये ,जिनके खिलाफ तंवर लोग अदालत में भी गए .मगर वहां उनकी दाल नहीं गली .इसके पश्चात प्रसिद्ध दलित लेखिका डॉ. कुसुम मेघवाल की एक पुस्तक आई –मेघवाल बाबा रामदेव . वर्ष 2006 में मेरा एक शोध ग्रन्थ –‘ रामदेव पीर :एक पुनर्विचार ‘ भी प्रकाशित हुआ ,सबमे एक बात तो समान थी कि रामदेव पीर का जन्म बाड़मेर जिले के उन्डू काश्मीर गाँव में सायर जयपाल के घर माता मगनदे की कौंख से हुआ था .सायर जयपाल दलित समुदाय की मेघवाल जाति के व्यक्ति थे और अजमल सिंह तंवर नामक जागीरदार के घोड़े चराते थे तथा उनके आध्यात्मिक शिष्य भी थे . ‘ अवतारवाद के शिकार लोक क्रान्तिकारी महामानव बाबा रामसापीर ‘ नामक अपनी कृति में इतिहासकार रामचंद्र कडेला मेघवंशी ने बाबा रामदेव के जन्म रहस्य को इस तरह उद्घाटित किया है –
‘सायर सुत ,मगनी रा जाया ,ज्यारी महिमा भारी
भेंट कियो सुत अजमलजी ने ,सायर ने बलिहारी .
मेघरिखां संग तंवर वंश रा , भाग जागिया भारी
दुनिया जाने रामदेवजी ने ,अजमल घर अवतारी.’
यह तथ्य अब देश भर की जानकारी में आ चुका है कि बाबा रामदेव एक दलित मेघवाल सायर जयपाल के घर जन्में थे ,जिन्हें अजमल सिंह तंवर के शिष्यत्व में आध्यात्मिक शिक्षा दीक्षा के लिए सौंपा गया था ,वे डाली बाई के सगे भाई थे ,उन्होंने सूफी निजारी पंथ की दीक्षा ले ली थी और वे पीर कहलाये . उन्होंने छुआछूत की जमकर मुखालफत की तथा ब्राह्मणवाद और मूर्तिपूजा जैसे पाखंडों के खिलाफ उन्होंने अलख जगाई ,वे नाथ पंथी योगी थे तथा उन्होंने इस्माईली निजारी पंथ को स्वीकार लिया था ,जो कि उस वक़्त सत धर्म कहा जाता था .उन्होंने अपनी आध्यात्मिक सत्संगों में महिलाओं को भी प्रवेश करने की इज़ाज़त दी थी. औरतें उनके पंथ में बराबर के दर्जे पर मानी जाती थी ,जिससे जातिवादी तत्व बेहद खफा रहते थे ,रामदेव पीर उस वक़्त के एक विद्रोही दलित संत थे ,वर्णवादी लोग उनके बहुत विरुद्ध हो गए थे .वे बाबा रामदेव के महा धर्म सतपंथ को कान्चलिया पंथ बता कर निंदा किया करते थे.वे उन्हें विधर्मी भी कहते थे ,क्योंकि रामदेवजी के साथ बड़ी संख्या में मुस्लिम शिष्य भी थे ,इन सब चीज़ों से खफा पुरोहित वर्ग ने षड्यंत्र करके मात्र 33 वें वर्ष की उम्र में ही रामदेवजी तथा उनकी बहन डाली बाई को जीवित ही समाधी लेने को मजबूर कर दिया .बाद में उनके बारे में तरह तरह के चमत्कार की कहानियां गढ़ कर उनके नाम पर कमाई शुरू कर दी गयी ,ताकि अधिकाधिक लोग रामदेवरा आये और चढ़ावा चढ़ाये.इसके बाद रामदेव में लोगों की आस्था बढ़ती गयी  ,पहलेतो रामदेव पीर सिर्फ दलितों एवं गरीब मुसलमानों के ही देवता थे ,पर धीरे धीरे अन्य लोग भी उनमे आस्था रखने लगे .अब तो उनके यहाँ पैदल चल कर आने वालों में ज्यादातर गैरदलित ही दिखाई पड़ते है .
खैर, यह तो हुयी रामदेवजी के बारे में थोड़ी सी जानकारी ,विस्तृत जानकारी तो उपरोक्त पुस्तकों में दर्ज है ,जिन्हें पढ़ने से विस्तार से जानकारी मिल सकती है ,पर अब बात करते है रामदेव पीर के मंदिर के पश्चिम में रामसरोवर की पाल पर स्थित ‘ श्री रामदेव मेघवाल समाज विकास संस्था रामदेवरा की धर्मशाला’ की ,जिसकी मौजूदगी  रामदेवजी के कथित वर्तमान वंशजों को बर्दाश्त नहीं हो रही है .वे कई वर्षों से इस कोशिस में लगे हुए है कि रामदेवजी के मंदिर के इतने पास दलितों की एक धर्मशाला कैसे हो सकती है ? एकदम सटी हुई ,जिस पर लिखा हो- ‘श्रीरामदेव मेघवाल’ ! बरसों से इस धर्मशाला का प्रबंधन जीवन राम बांदर संभालते है .जो निर्भीक एवं सच्चे व्यक्तित्व के धनी दलित कार्यकर्ता  है .देश भर से दलित समुदाय से सहयोग जुटा कर उन्होंने इस धर्मशाला को विकसित किया है .मूलतः यह धर्मशाला रामदेवरा के ही मूलनिवासी मगन नाथ उर्फ़ मगन लाल वल्द मोहन दास के स्वामित्व में थी ,जिसका एक बापी पट्टा भी रामदेवरा ग्राम पंचायत के सरपंच एवं तत्कालीन गादीपति राव रिडमल सिंह की ओर से उन्हें दिया गया था .बाद में मगन लाल मेघवाल सन्यासी हो गए तथा अहमदाबाद में जा कर रहने लग गए ,उम्र अधिक हो जाने से 1993 में उन्होंने इस धर्मशाला के प्रबंधन का कार्य जीवन राम के बड़े भाई कानाराम बांदर [मेघवाल ] को सौंप दिया ,वर्ष 2007 में यह धर्मशाला मेघवाल समाज की पंजीकृत संस्था के जरिये संचालित की जाने लगी .बिलकुल मंदिर से लगी हुयी इस धर्मशाला में देश भर से आने वाले लोग ठहरते है तथा यह रामदेवरा में दलित जागृति की अनेकानेक गतिविधियों की केंद्रबिंदु भी है ,जिसके चलते यह स्थान सदा से ही प्रशासन और तन्वरों के निशाने पर रहा है .
इसके बाद चालू हुआ साजिशों का दौर ,शिकायत डर शिकायतें ,धमकियाँ और धर्मशाला तथा प्याऊ को नेस्तनाबूद कर देने के प्रयास ,जो कि अब तक भी जारी है .संभागीय आयुक्त के दौरे के दौरान भी यह शिकायत की गयी ,उन्होंने बिना कोई पक्ष सुने कह दिया कि यह अतिक्रमण है ,इसे हटा दिया जाये .जबकि नायब तहसीलदार पोकरण इस मामले कोपहले ही सुन चुके है और निर्णय दे चुके है कि यह अतिक्रमण नहीं है ,कानूनन और दस्तावेजन यह प्याऊ और धर्मशाला पूर्णत जायज है ,फिर भी दलित समुदाय की इस धर्मशाला को तोड़ने तथा इसे बंद करने के लिए जबरदस्त दबाव बनाया जा रहा है .हालाँकि जीवन राम बांदर एवं अन्य दलित कार्यकर्ता इसे बचाने के लिए संघर्षरत है ,मगर उन्हें हम सब लोगों का सहयोग चाहिए .
आज यह चिंतनीय प्रश्न है कि रामदेव पीर जो कि दलित समुदाय में जन्में थे ,उन पर तथा उनकी सम्पूर्ण विरासत पर गैरदलितों ने कब्ज़ा कर लिया है ,मंदिर का पूरा चढ़ावा गैरदलित तंवरों को जाता है ,स्थानीय दलितों के हाथ कुछ भी नहीं लगता है ,जबकि इस सब पर पहला तथा असली हक़ दलितों का है .यह सब तो चलता ही रहा है मगर अब तो हद ही हो गयी है उनकों दलितों की एक प्याऊ और धर्मशाला का मंदिर के पास मौजूद होना तक अखर रहा है और वे इसे तोड़ने पर तुले है .देश भर से आने वाले दलित विशेषकर मेघवाल अपने खून पसीने की गाढ़ी कमाई इन दलित विरोधियों को सौंप कर आते है ,क्या यह जायज है ? इस बार रामदेवरा जाने वाले हर दलित को यह संकल्प लेना चाहिये कि उसके द्वारा एक धेला भी रामदेव पीर के इन फर्जी वंशजों को नहीं दिया जाये .इतना ही नहीं बल्कि रामदेवरा मंदिर का प्रबंधन जाति विशेष के लोगों के हाथ में नहीं रह कर राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के हाथों में जाये ,ताकि वह  यात्रियों की सुविधा के लिए कोई व्यवस्थाएं कर सके  ,मित्रों क्या यह उचित है कि हमारे पूर्वज रामसापीर और हमारी पसीने की कमाई पर हमारे विरोधी मजे मारे और हम चुपचाप देखते रहें ,मुझसे तो यह नहीं होगा ,क्या आपसे होगा ? अगर नहीं तो इस मसले पर राष्ट्रव्यापी बहस खड़ी कीजिये ,अभी तो धर्मशाला और प्याऊ को बचाना है फिर रामदेवजी की सम्पूर्ण विरासत पर वापस अपना हक़ पाना है ,इसके लिए लम्बी लड़ाई के लिए तैयार रहिये .
-    भंवर मेघवंशी
{लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं  मानवाधिकार कार्यकर्त्ता है }


Sunday, August 16, 2015

To Be And Not To Be

To Be and Not to Be
Let a million Ambedkars bloom, so that the spaces in our hearts become meeting places
As a Brahmin born middle class woman from no particular leaning trying to understand caste for the last 15 years or so – yes, I was, like all Brahmin born middle class – shamefully impervious to this horrific system before that – I now stand more puzzled than ever.
Over these years, I have tried publicly denying my caste, religion, inter dined, inter mingled, closely befriended and stayed with people from different castes and wily nily, them with me.  And guess what: this un-brahminising (not all consciously) did not make me seem any less of a brahmin, it did not make me seem any less privileged in the eyes of society, and nor did it take away from any one’s dalit identity.
Being anti-caste, Brahmin-born and stating both of these publicly is a strange place to be in. We are a small but growing lot. We are out-casted from both sides. That those who support or want the caste hierarchies preserved do this, is of no botheration. We could show them our middle finger or, if we want to be more mature, try and make them see how wrong they are. This is a battle that we heartily take on. But more painfully, on the other hand (see I’m already dividing) is the suspicion from the very people whose dignity that ‘upper caste’ people like me, are trying to stand up for. There are unsaid limits on how much, or in what way a non-dalit can engage with caste. Crossing this line evokes sharp reactions and personal attacks. After all the strides made, there seems to be more room for antagonistic extreme postures; less for middle ground. The general message is: “if you are concerned about caste, you do your own cooking and let us do ours.” But then, when do we sit together and eat? If the crime of caste itself is that it is territorial, should the struggle to eliminate it succumb and build territories into itself?
The Brahmins will not let dalits be (oppression). Dalits will not let brahmins be (empowerment). But Brahmins who do not want to be Brahmins, and Dalits who do not want to be Dalits, where do they be?
I happened to be born in a Hindu Brahmin family. This was no choice, nor fault of mine, just as it was not of any dalit to be born in a dalit home. Now that our births have taken place, what can we do? Are we going to remind each other of this till we die and pass it on to the next generation?
Why don’t we both see that from now on, our struggles are indeed common? That to oppose caste based oppression and support equality and dignity of all human kind, I too want to and necessarily need to shed my caste? That a right-thinking (not politically but socially) upper-caste born person who is not just fashionably anti-caste, has much pain and anguish and wants the same equal and free society as a dalit would? That there is no more ‘us’ and ‘them’ in our minds and if you can accept that, how can we merge our fundamental values which are the same and turn it into an unstoppable force, a strength? Why has Ambedkar become yours and not mine, when he is ours?
The rape of a woman in Delhi can send a nation into tizzy. The rape of a dalit woman becomes a dalit-only issue. Why have we come to this? In our zeal to assert identities (we are all responsible here) – haven’t we fortified the very walls we want to pull down?
The Bhagana dalits turned to Islam. But who took this decision – their men or women? So is rejecting religion the only way? A woman who is oppressed cannot take a way out by “becoming a man” or “becoming Buddhist” or “becoming nothing”.  She stays there and fights to be respected for just what she is, a woman.
Dalits are looking for a way out. But they are also looking for a way in. And up. They want no more oppression as dalits, but more opportunities as those who now have them. They want no more pain but more power, as those who now hold them. The brahmins and ‘upper castes’ of today who can acknowledge this, are ready to offer one big deep sincere apology for the past and welcome them with open arms. The rest, is politics. To succumb to it is to lose an insight we have collectively gained, and our collective numbers. It is a terrible loss, a retrogression.
What we need is a conviction of love. All organized religions profess it, but they have also come to profess other things. The thing about love is it doesn’t need a religion, or isms. Only individual practice.
We can fight in our corners the same adversary in different ways but somewhere, the forces need confluence to remind us of our collective strength. We need a meeting place.
Arundhati Roy said in an interview (Outlook March 10, 2014)– “we need Ambedkar, now, urgently.” Indeed we do. Not one but millions. What we need urgently is to let him freely take seed in each of our hearts – dalit hearts, brahmin hearts, and what-have-you-hearts – and eventually erase those identities, so when we leave this world, our children won’t be talking any more as you-dalit and me-brahmin, but would have moved a step closer to a society we only write about, as of now. ‘Ambedkarism’, which stands so close to the dalit identity today will then hopefully take on a much larger connotation which will not need anyone’s endorsement anymore, as we would have made it integral to each one of us, no matter which caste we were born in.

Sowmya Sivakumar
(the writer resides in Tamil Nadu and can be reached at sowmya_sivakumar@yahoo.com)

Wednesday, August 12, 2015

 The dalits from Bhagana
They kept asking for justice, they got Islam

For almost 4 months they were boycotted by their village people, they were robbed of their livelihood and there was no end to their mental agony. They were not allowed access to public water sources nor allowed to use public loos, even the lone upper-caste doctor in their village refused to give them any medical care. They were not even allowed to dump the dung of animals they reared nor were they allowed any land to bury their deceased cattle. The newly married grooms and brides amongt them were not allowed to ride horses during the marriage processions. When it became unbearable the 70 Dalit families from Bhagana along with their cattle decided to leave their homes on the 21st of May, 2012. They went to the district headquarters in Hisar to seek help, they tried to draw the attention of administrative officers there by staging protests, they pleaded for help from our civil society, our police, the state chief minister and right upto our country's president. In Delhi, they sent their prayers and appeals to almost all political honchos but to no avail. To make their voices heard they even gathered for protests at Delhi's Jantar-Mantar (a regular venue for public protests in Delhi) and remained agitating from April 16, 2014 until very recently. All their cries for help remained unheard. They decided to give up on their homes, their village, their district and ultimately even their religion and only now upon their giving up on shitty Hinduism have they been given a bit of attention but there has still been no discourse provided in mitigating their concerns. Nobody within the administrative and media ranks has bothered to address the circumstances which lead these Dalit families from Bhagana to take such a drastic step! 

The village of Bhagana is a mere 17km distance from the District HQ of Hisar. The village comprises of 59% Jats, 8% other upper-castes including Brahmins, the merchant classes and Punjabis as well as 9% other backward castes along with 24% Dalits. From the year 2000 onwards the Dalits started coming together and established an 'Ambedkar Welfare Committee' in their village, they started demanding equal rights and better living standards. They sought land ownership on the stretches which were not owned by anyone, access to common facilities in the village. The actual conflict began in 2012 when they sought to rename a public square in a neighbourhood with majority dalit homes in the name of Dr. B. R. Ambedkar and wanted to instal Ambedkar's statue. This was not to be approved by other privileged castes in Bhagana. The upper-castes had started to vehemently oppose welfare housing schemes meant for the Dalits just outside the village boundaries. The use of common facilities by Dalits in the village was increasingly bothering the upper-castes. In the wake of such developments it was becoming extremely difficult for a Dalit individual to tread normal life in the village. The village was turning into a living hell for any self-righteous Dalit person. When these Dalits kept to seeking an end to their growing ostracisation and wereagitating outside district HQ, State assembly as well as at Jantar-Mantar in Delhi, four minor dalit girls from Bhagana were abducted and gang-raped. The police investigations remained inconclusive and it further added to the agonies of Bhagana Dalits. After repeated assurances from former chief-minsters and the current hindu right-wing BJP's assurances for justice failed to yield, the agitating Dalit families sent an open letter to all the MPs who were to assemble for the monsoon session of parliament in Delhi that they would disown Hinduism and on 8th August 2015 in a rally at Jantar Mantar 100 Dalit families got converted to ISLAM. This has raised many eye-brows amongst the left, right and the center politicos. The ultra-right forces have termed this conversion as blackmail and has declared by taking the village council in confidence that the Dalits wont be allowed into Bhagana unless they come back into the fold of Shitty Hinduism. In the aftermath of these conversions the state under right-wing BJP ordered the police during the night of 10th August to evict the agitating Dalits outside the District HQs. Similarly the police came down heavily on the Dalit protestors at Delhi's Jantar Mantar by lathi-charging them all. The brute force of police action has injured 11 agitating Dalits. The recent turn of events has completely left the agitating Dalits in a bind. They are nowhere to go. 

Dalit  Activist Abdul Razzak Ambedkar who spearheaded the conversions is of an opinion that the agitation will only gather more momentum and the Dalits wont fear anyone and would go back to their own homes in Bhagana as its the right enshrined by the constitution penned by Dr. B. R. Ambedkar. He states that he and his Dalit brothers and sisters from Bhagana are fully aware that the conversions to Islam is bound to aggravate the issue and would be turned into a communal flashpoint but the Bhagana Dalits who converted to Islam would battle the arising tensions while continuing to follow ISLAM. Now physically injured Abdul and his allies from Bhagana are fully aware that their scheduled caste status would no longer remain after converting into ISLAM but he and his allies have far greater faith in the muslim brethren for much co-operation & dignity.

Those Bhagana Dalits who have bothered to convert into Islam have remained valiant in the midst of growing adversaries. Abdul has pledged that he will die as a muslim only and wishes that if his ancestors had sought refuge in Islam he and his dalit brethren would have enjoyed much dignity. His and allies have decided to fully adopt and adapt themselves as per the strictures of ISLAM and theres no going back. If shitty Hinduism has never cared for their plight then its best to disown it. Hope our decision pokes a major blow to the cause of creating India a Hindu state by the year 2020 under the very nose of a bloody Hindu Right-Wing Prime-minister. The author of this article covering the story of Bhagana Dalits had clearly sensed months ago that many amongst them were to disown Hinduism and most likely were to convert to ISLAM!

The reporter is of an opinion that he personally sees no wrong that Bhagana Dalits sought to convert into ISLAM as the Indian Constitution gives them the right to seek any religion but he sees no merit that conversions are to solve any of their hardships as it is always upto the diktats of the religious elites to take up a particular humanitarian cause. If the religions of the world were any sensitive to their followers the world would have been a far better place. Organised religions have always remained in the custody of the elites. Dalit Activist S. R. Darapuri, is of an opinion that Dalits have no choice but to agitate and no conversions are to benefit them. Them seeking Islam, Christianity or Sikhism would not guarantee them any dignity as casteism is very much being followed in these religions within the context of Indian sub-continent. Only Buddhism offers no such duplicity. Also, does any of these conversions actually help the cause of Dalit upliftment or it further exposes them to communal hatred? And also does a average muslim considers himself/ herself secure in the world which is becoming increasingly islamophobic? And in the midst of rising intolerance towards Islam would Islam ever come to the rescue of these men and women? Who will ultimately rescue these Dalits..the legacy of Dr. B. R. Ambedkar carried forward in India's constitution or the misunderstood Koranic and Sharia Laws? What about their tenacity in installing the Ambedkar's statue in the public square at Bhagana? Will the Muslim community give them the dignity they seek or use them as human shields against any communal flare-up in times to come? If the later happens it would only mean double jeopardy! Theres no doubt that the Dalits of Bhagana had to settle with Islam as against true justice and the constitution did guarantee them the right to seek their choice of religion however this has only aggravated their situation. The author highlights that in today's context the organised religions of the world needs more followers to assert their relevance but it's definitely not necessary for anyone in India to seek any whatsoever religious identity to remain relevant in fact they should evolve to disown religions all together and never let any religion abuse them. Disowning religious dogmas and strictures can go a long way in attaining freedom from the shackles of caste in India. India needs a religion-free democracy embedded in values such as equality, humanity, freedom and brotherhood for people to truly and fully live their lives. 

(Author Bhanwar Meghwanshi is from the Indian state of Rajasthan and writes independently on issues pertaining to human rights). It has been translated by Mandar Effeminate.


Monday, August 10, 2015

भगाना के दलित

                                  
                            इंसाफ माँगा था, इस्लाम मिला !
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लगभग 4 माह तक उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया ,आर्थिक नाकेबंदी हुयी ,तरह तरह की मानसिक प्रताड़नाएँ दी गयी | गाँव में सार्वजनिक नल से पानी भरना मना था ,शौच के लिए शामलात जमीन का उपयोग नहीं किया जा सकता था ,एक मात्र गैर दलित डॉक्टर ने उनका इलाज करना बंद कर दिया ,जानवरों का गोबर डालना अथवा मरे जानवरों को दफ़नाने के लिए गाँव की भूमि का उपयोग तक वे नहीं कर सकते थे | उनका दूल्हा या दुल्हन घोड़े पर बैठ जाये ,यह तो संभव ही नहीं था| जब साँस लेना भी दूभर होने लगा तो अंततः भगाना गाँव के 70 दलित परिवारों ने 21 मई 2012 को अपने जानवरों समेत गाँव छोड़ देना ही उचित समझा| वे न्याय की प्रत्याशा में जिला मुख्यालय हिसार स्थित मिनी सचिवालय के पास आ जमें ,जहाँ पर उन्होंने विरोध स्वरुप धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया| भगाना के दलितों ने ग्राम पंचायत के सरपंच से लेकर देश के महामहिम राष्ट्रपति महोदय तक हर जगह न्याय की गुहार लगायी ,वे तहसीलदार के पास गए ,उपखंड अधिकारी को अपनी पीड़ा से अवगत कराया ,जिले के पुलिस अधीक्षक तथा जिला कलेक्टर को अर्जियां दी| तत्कालीन और वर्तमान मुख्यमंत्री से कई कई बार मिले| विभिन्न आयोगों ,संस्थाओं एवं संगठनों के दरवाजों को खटखटाते रहे ,दिल्ली में हर पार्टी के अलाकमानों के दरवाजों पर दस्तक दी मगर कहीं से इंसाफ की कोई उम्मीद नहीं जगी| उन्होंने अपने संघर्ष को व्यापक बनाने के लिए हिसार से उठकर दिल्ली जंतर मंतर पर अपना डेरा जमाया तथा 16 अप्रैल 2014 से अब तक दिल्ली में बैठ कर पुरे देश को अपनी व्यथा कथा कहते रहे ,मगर समाज और राज के इस नक्कारखाने में भगाना के इन दलितों  की आवाज़ को कभी नहीं सुना गया| हर स्तर पर ,हर दिन वे लड़ते रहे ,पहले उन्होंने घर छोड़ा ,फिर गाँव छोड़ा ,जिला और प्रदेश छोड़ा और अंततः थक हार कर धर्म को भी छोड़ गए ,तब कहीं जाकर थोड़ी बहुत हलचल हुयी है लेकिन अब भी उनकी समस्या के समाधान की बात नहीं हो रही है| अब विमर्श के विषय बदल रहे है ,कोई यह नहीं जानना चाहता है कि आखिर भगाना के दलितों को इतना बड़ा कदम उठाने के लिए किन परिस्तिथियों  ने मजबूर किया ?
भगाना हरियाणा के हिसार जिला मुख्यालय से मात्र 17 किमी दूर का एक पारम्परिक गाँव है| जिसमे 59 % जाट ,8 % सामान्य सवर्ण {ब्राह्मण ,बनिया ,पंजाबी } 9 % अन्य पिछड़ी जातियां { चिम्बी ,तेली ,कुम्हार ,लौहार व गोस्वामी }तथा 24 % दलित { चमार ,खटिक ,डोमा ,वाल्मीकि एवं बैगा } निवास करते है| वर्ष 2000 में यहाँ पर अम्बेडकर वेलफेयर समिति बनी ,दलित संगठित होने लगे| उन्हें गाँव में अपने साथ होने वाले अन्याय साफ नज़र आने लगे ,वे अपने नागरिक अधिकारों को प्राप्त करने के प्रयास में एकजुट होने लगे ,जिससे यथास्थितिवादी ताकतें असहज होने लगी| दलितों ने अपने लिए आवासीय भूमि के पट्टे मांगे तथा गाँव की शामलाती जमीन पर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग उठाई| संघर्ष की वास्तविक शुरुआत वर्ष 2012 में तब हुयी जबकि दलितों ने गाँव में स्थित चमार चौक का नाम अम्बेडकर चौक करने तथा वहां पर अम्बेडकर की प्रतिमा लगाने की मांग शुरू की| दरअसल यह चौक दलित परिवारों की आबादी के पास स्थित है ,जहाँ पर कई दलितों के घरों के दरवाजे खुलते है ,मगर गाँव के दबंगों को यह गवारा ना था कि इस चौक पर दलितों का कब्ज़ा हो| इतना ही नहीं बल्कि गाँव में दलितों को आवासीय भूखंड देने के लिए बनायीं गयी महात्मा गाँधी बस्ती विकास योजना के तहत प्लॉट्स का पंजीकरण और आवंटन भी उन्हें स्वीकार नहीं था| गाँव की शामलाती जमीन पर दलितों की आवाजाही भी उन्हें बर्दाश्त नहीं थी.कुल मिलाकर भगाना स्वाभिमानी दलितों के लिए नरक बन चुका था ,ऐसे में दलितों के लिए गाँव छोड़कर चले जाने तथा इंसाफ के लिए आवाज़ उठाने के अलावा  कोई चारा ही नहीं था| इस तरह यह लडाई चलती रही| विगत तीन वर्षों से यह जंग बहुत सघन और मज़बूत हो गयी ,पहले हिसार के मिनी सचिवालय के बाहर और अंततः जंतर मंतर पर यह संघर्ष जारी रहा| 2014 से जंतर मंतर को ठिकाना बना कर लड़ रहे इन दलितों को कोई न्याय नहीं मिल पाया ,ऊपर से चार दलित नाबालिग लड़कियों का भगाना गाँव में अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म का मामला और हो गया ,जिसमे भी पुलिस की भूमिका संतोषजनक नहीं रह पाई ,इससे भी आक्रोश बढ़ता गया| हरियाणा की पिछली सरकार ने संघर्षरत दलितों से न्याय के कई वादे किये मगर वे सत्ता से बाहर हो गए ,भाजपा की सरकार के मुख्यमंत्री खट्टर से भी भगाना के पीड़ित चार बार मिलकर आये ,मगर कोई कार्यवाही नहीं हुयी ,लम्बे संघर्ष के कारण दलित संगठनों के रहनुमाओं ने भी कन्नी काट ली ,जब कोई भी साथी नहीं रहा ,तब भगाना के दलितों को कोई ना कोई तो कदम उठाना ही था ,इसलिए उन्होंने संसद के सत्र के दौरान एक रैली का आह्वान करता हुआ पर्चा सबको भेजा ,यह रैली 8 अगस्त 2015 को आयोजित की गयी थी ,इसी दौरान करीब 100 परिवारों ने जंतर मंतर पर ही कलमा और नमाज पढ़कर इस्लाम कुबूल करने का ऐलान कर दिया ,जिससे देश भर में हडकंप मचा हुआ है| भगाना में इसकी प्रतिक्रिया में गाँव में सर्वजाति महापंचायत हुयी है जिसमे हिन्दू महासभा ,विश्व हिन्दू परिषद् तथा बजरंग दल के नेता भी शामिल हुए ,उन्होंने खुलेआम यह फैसला किया है कि –“ धर्म परिवर्तन करने वाले लोग फिर से हिन्दू बनकर आयें ,वरना उन्हें गाँव में नहीं घुसने देंगे| “ विहिप के अन्तर्राष्ट्रीय महामंत्री डॉ सुरेन्द्र जैन का कहना है कि – “ यह धर्मांतरण पूरी तरह से ब्लेकमेलिंग है ,इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जायेगा| “  हिन्दू महासभा के धर्मपाल सिवाच का संकल्प है कि –“ भगाना के दलितों की हर हाल में हिन्दू धर्म में वापसी कराएँगे|” जो दलित मजहब बदल कर गाँव लौटे है उन्हें हिंदूवादी नेताओं ने समझाने के नाम पर धमकाने की कोशिश भी की है वहीँ दूसरी और देश और प्रदेश की हिंदूवादी सरकारों ने सत्ता का कहर भी ढाना  प्रारम्भ कर दिया है | धर्मांतरण के तुरंत बाद ही शुक्रवार की रात को हिसार के मिनी सचिवालय के बाहर विगत तीन वर्षों से धरना दे रहे दलितों को हरियाणा पुलिस ने जबरन हटा दिया और टेंट फाड़ दिए है| दिल्ली जंतर मंतर पर भी 10 अगस्त की रात को पुलिस ने धरनार्थियों पर धावा बोल दिया ,विरोध करने पर लाठी चार्ज किया गया ,जिससे 11 लोग घायल हो गए है.यहाँ से भी इन लोगों को खदेड़ने का पूरा प्रयास किया गया है| अब स्थिति यह है इस्लाम अपना चुके लोगों का गाँव में बहिष्कार किया जा चुका है,हालाँकि यह भी सच है कि इनका पहले से ही ग्रामीणों ने सामाजिक बहिष्कार किया हुआ था| हिसार से उन्हें भगाया जा चुका है और जंतर मंतर से भी वो खदेड़े गए है ,ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि भगाना के इतने लम्बे आन्दोलन का आखिर भविष्य क्या होगा ? क्या यह आगे भी चल पायेगा या यही ख़त्म हो जायेगा ? यह सवाल मैंने आन्दोलन से बहुत नज़दीक से जुड़े हुए तथा धर्मान्तरण कार्यक्रम के मुख्य योजनाकार अब्दुल रज्जाक अम्बेडकर से पूंछा ,उनका कहना है कि – “ जालिमों के खिलाफ यह लड़ाई जारी रहेगी| जंतर मंतर पर धरना जारी है और आईंदा भी जारी रहेगा ,जहाँ तक गाँव की सर्वखाप पंचायत के फैसले की तो हम उससे नहीं डरते ,हम लोग जल्दी ही भगाना जायेंगे ,यह हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार है “ | रज्जाक अम्बेडकर का कहना है कि –‘ हमें मालूम था कि इस धर्मांतरण के बाद हमारी मुश्किलात बढ़ेगी ,क्योंकि साम्प्रदायिक संगठन इसे हिन्दू मुस्लिम का मुद्दा बना रहे है ,पर जिन दलितों ने इस्लाम कुबूल कर लिया है ,वो इस्लाम में रह कर ही इंसाफ की लडाई लड़ेंगे|’ 9 अगस्त की  रात में हुए हमले में पुलिस के निर्दयी लाठीवार में रज्जाक को भी गंभीर चौटें पंहुची है ,मगर उनका हौंसला बरक़रार है ,वे बताते है कि –‘ धर्मान्तरित दलित जानते है कि अब उनका अनुसूचित जाति का स्टेट्स नहीं बचेगा ,मगर उन्हें यह भी उम्मीद है मुस्लिम बिरादरी उनके सहयोग में आगे आएगी|’
जिन दलितों ने धर्म बदला है ,उनका मनोबल चारों तरफ से हो रहे प्रहारों के बावजूद भी कमजोर नहीं लगता है| नव धर्मान्तरित सतीश काजला जो कि अब अब्दुल कलाम अम्बेडकर है ,कहते है कि-‘ हम हर हाल में अब मुसलमान ही रहेंगे , जो कदम हमने उठाया ,वह अगर हमारे पूर्वज उठा लेते तो आज ये दिन हमको नहीं देखने पड़ते|’ इसी तरह पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले भगाना निवासी धर्मान्तरित वीरेन्द्र सिंह बागोरिया का कहना है कि –‘हम पूरी तरह से इस्लाम अपना चुके है और अब किसी भी भय ,दबाव या प्रलोभन में वापस हिन्दू नहीं बनेंगे|’ अन्य दलित व अति पिछड़े जिन्होंने इस्लाम कबूला है ,वो भी अपने फैसले पर फ़िलहाल तो मजबूती से टिके हुए है .भाजपा ,संघ ,विहिप ,बजरंग दल तथा हिन्दू महासभा अपना पूरा जोर लगा रही है कि धर्मान्तरित लोग अपने मूल धर्म में लौट आये ,मगर भगाना के पीड़ित दलितों ने अपना सन्देश स्पष्ट कर दिया है कि अगर हिन्दुओं को दलितों की परवाह नहीं है तो दलितों को भी हिन्दुओं की रत्ती भर भी परवाह नहीं है| एक ऐसे वक़्त में जबकि एक दक्षिणपंथी हिन्दू शासक दिल्ली की सल्लतनत पर काबिज़ है ,ऐसे में उसकी नाक के नीचे खुलेआम ,चेतावनी देकर ,पर्चे बाँट कर ,ऐलानिया तौर पर पीड़ित दलित इस्लाम कुबूल कर रहे है तो यह वर्ष 2020 में बनने वाले कथित हिन्दू राष्ट्र के मार्ग में गति अवरोधक बन सकता है| भगाना के दलितों ने लम्बे समय तक सोच कर यह निर्णय लिया है ,एक माह पहले जब मैं उनके धरने में गया तब मुझे इसका अहसास होने लगा था कि उनका रुख मजहब बदलने की तरफ है और वे शायद इस्लाम का दामन थामेंगे|   
  एक लोकतान्त्रिक देश में कोई भी नागरिक किसी भी धर्म को स्वीकारे या अस्वीकार करे ,यह उनकी व्यक्तिगत इच्छा है और कानूनन इसमें कुछ भी गलत नहीं है ,इसलिए भगाना के दलितों द्वारा किये गए इस्लाम को कुबूलने के निर्णय से मुझे कोई आपति नहीं है ,मैं उनके निर्णय का आदर करता हूँ ,हालाँकि मेरी व्यक्तिगत मान्यता यह है कि धर्मान्तरण किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता है क्योंकि यह खुद ही एक समस्या है| संगठित धर्म के आडम्बर और पाखंड तथा उसकी घटिया राजनीती सदैव ही  धर्म का सक्षम तबका तय करता है ,भारत के जितने भी धर्म है ,उन सबमें जातियां पाई जाती है तथा कम ज्यादा जातिगत भेदभाव भी मौजूद रहता है ,इस्लाम भी इससे अछुता नहीं है.जैसा कि दलित चिन्तक एस आर दारापुरी का कहना  है कि-“ धर्मपरिवर्तन दलित उत्पीडन का हल नहीं है ,दलितों को संघर्ष का रास्ता अपनाना चाहिए ,हाँ अगर धर्म बदलना ही है तो बौद्ध धर्म अपनाना चाहिए जिसके सिद्धांत और व्यव्हार में अंतर नहीं है जबकि भारतीय इस्लाम ,इसाई और सिख धर्म में यह अंतर पाया जाता है | ” वाकई यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या हिन्दू धर्म का त्याग करके किसी और धर्म को अपना लेने मात्र से कोई व्यक्ति जातिगत घृणा से मुक्त हो जाता है या धार्मिक नफरत का भी शिकार होने लगता है| जैसा कि भगाना के धर्मान्तरित दलितों के साथ होने लगा है कि धर्म बदलते ही उनके प्रति राज्य और समुदाय दोनों का व्यवहार अत्यंत क्रूर हो गया है| फिर यह भी देखना होगा कि क्या आज मुसलमान खुद भी स्वयं को सुरक्षित महसूस करते है ,जिस तरीके से बहुसंख्यक भीड़ के हमले उन पर बढ़ रहे है ,गुजरात ,मुज्जफरनगर ,अटाली जैसे हमले इसके उदहारण है ,ऐसे में भले ही दलित उनका दामन थाम रहे है ,मगर उनका दमन थमेगा ,इसकी सम्भावना बहुत क्षीण नजर आती है .
अंतिम बात यह है कि अब भगाना  के दलितों की आस्था बाबा साहेब के संविधान के प्रति उतनी प्रगाढ़ रह पायेगी या वो अपनी समस्याओं के हल कुरान और शरिया तथा अपने बिरदाराने मुसलमान में ढूंढेगे ? क्या लडाई के मुद्दे और तरीके बदल जायेंगे ,क्या अब भी भगाना के दलित मुस्लिम अपने गाँव के चमार चौक पर अम्बेडकर की प्रतिमा लगाने हेतु संघर्ष करेंगे या यह उनके लिए बुतपरस्ती की बात हो जाएगी ,सवाल यह भी है कि क्या भारतीय मुसलमान भगाना के नव मुस्लिमों को अपने मज़हब में बराबरी का दर्जा देंगे या उनको वहां भी पसमांदा के साथ बैठ कर मसावात की जंग को जारी रखना होगा ? अगर ऐसा हुआ तो फिर यह  खाई से निकलकर कुएं में गिरने वाली बात ही होगी| भगाना के दलितों को इंसाफ मिले यह मेरी भी सदैव चाहत रही है ,मगर उन्हें इंसाफ के बजाय इस्लाम मिला है ,जो कि उनका अपना चुनाव है ,हम उनके धर्म बदलने के संवैधानिक अधिकार के पक्ष में खड़े है ,कोई भी ताकत उनके साथ जोर जबरदस्ती नहीं कर पायें और जो भी उनका चयन है ,वे अपनी चयनित आस्था का अनुपालन करे,यह सुनिश्चित करना अब भारतीय राष्ट्र राज्य की जिम्मेदारी है ,मगर अब भी मुझे दलित समस्याओं का हल धर्म बदलने में नहीं दिखाई पड़ता है| आज दलितों को एक धर्म छोड़कर दुसरे धर्म में जाने की जरुरत नहीं है ,उन्हें किसी भी धर्म को स्वीकारने के बजाय सारे धर्मों को नकारना होगा ,तभी मुक्ति संभव है ,संभवतः सब धर्मों को दलितों की जरुरत है ,मगर मेरा मानना है कि दलितों को किसी भी धर्म की जरुरत नहीं है .धर्म रहित एक लोकतंत्र जरुर चाहिए ,जहाँ पर  समता ,स्वतंत्रता और भाईचारा से परिपूर्ण जीवन जीने का हक सुनिश्चित हो|
-    भंवर मेघवंशी

{ लेखक राजस्थान में मानव अधिकार के मुद्दों पर कार्यरत स्वतंत्र पत्रकार है }

Thursday, May 21, 2015

एक और खैरलांजी

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राजस्थान का नागौर जिला दलितों की कब्रगाह बनता जा रहा है .
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राजस्थान की राजधानी जयपुर से तक़रीबन ढाई सौ किलोमीटर दूर स्थित अन्य पिछड़े वर्ग की एक दबंग जाट जाति की बहुलता वाला नागौर  जिला इन दिनों दलित उत्पीडन की निरंतर घट रही शर्मनाक घटनाओं की वजह से कुख्यात हो रहा है .विगत एक साल के भीतर यहाँ पर दलितों के साथ जिस तरह का जुल्म हुआ है और आज भी जारी है ,उसे देखा जाये तो दिल दहल जाता है ,यकीन ही नहीं आता है कि हम आजाद भारत के किसी एक हिस्से की बात कर रहे है .ऐसी ऐसी निर्मम और क्रूर वारदातें कि जिनके सामने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों द्वारा की जाने वाली घटनाएँ भी छोटी पड़ने लगती है .क्या किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र में ऐसी घटनाएँ संभव है ? वैसे तो असम्भव है ,लेकिन यह संभव हो रही है ,यहाँ के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचें की नाकामी की वजह से ...

दलित उत्पीडन का गढ़ बन गया है नागौर
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नागौर जिले के बसवानी गाँव में पिछले महीने ही एक दलित परिवार के झौपड़े में दबंग जाटों ने आग लगा दी ,जिससे एक बुजुर्ग दलित महिला वहीँ जल कर राख हो गयी और दो अन्य लोग बुरी तरह से जल गए ,जिन्हें जोधपुर के सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया ,इसी जिले के लंगोड़ गाँव में एक दलित को जिंदा दफनाने का मामला सामने आया है.मुंडासर में एक दलित औरत को घसीट कर ट्रेक्टर के गर्म सायलेंसर से दागा गया और हिरडोदा गाँव में एक दलित दुल्हे को घोड़ी पर से नीचे पटक कर जान से मरने की कोशिश की गयी .राजस्थान का यह जाटलेंड जिस तरह की अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहा है ,उसके समक्ष तो खाप पंचायतों के तुगलकी फ़रमान भी कहीं नहीं टिकते है ,ऐसा लगता है कि इस इलाके में कानून का राज नहीं ,बल्कि जाट नामक किसी कबीले का कबीलाई कानून चलता है,जिसमे भीड़ का हुकुम ही न्याय है और आवारा भीड़ द्वारा किये गए कृत्य ही विधान है .

डांगावास : दलित हत्याओं की प्रयोगशाला
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नागौर जिले की तहसील मेड़ता सिटी का निकटवर्ती गाँव है डांगावास ,जहाँ पर 150 दलित परिवार निवास करते है और यहाँ 1600 परिवार जाट समुदाय के है ,तहसील मुख्यालय से मात्र 2 किलोमीटर दुरी पर स्थित है डांगावास ,..जी हाँ ,यह वही डांगावास गाँव है ,जहाँ पिछले एक साल में  चार दलित हत्याकांड हो चुके है ,जिसमे सबसे भयानक हाल ही में हुआ है. एक साल पहले यहाँ के दबंग जाटों ने मोहन लाल मेघवाल के निर्दोष बेटे की जान ले ली थी ,मामला गाँव में ही ख़त्म कर दिया गया ,उसके बाद 6 माह पहले मदन पुत्र गबरू मेघवाल के पाँव तोड़ दिये गए ,4 माह पहले सम्पत मेघवाल को जान से ख़त्म कर दिया गया ,इन सभी घटनाओं को आपसी समझाईश अथवा डरा धमका कर रफा दफा कर दिया गया .पुलिस ने भी कोई कार्यवाही नहीं की .
स्थानीय दलितों का कहना है कि बसवानी में दलित महिला को जिंदा जलाने के आरोपी पकडे नहीं गए और शेष जगहों की गंभीर घटनाओं में भी कोई कार्यवाही इसलिए नहीं हुयी क्योंकि सभी घटनाओं के मुख्य आरोपी प्रभावशाली जाट समुदाय के लोग है .यहाँ पर थानेदार भी उनके है ,तहसीलदार भी उनके ही और राजनेता भी उन्हीं की कौम के है ,फिर किसकी बिसात जो वे जाटों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाये ? इस तरह मिलीभगत से बर्षों से दमन का यह चक्र जारी है ,कोई आवाज़ नहीं उठा सकता है ,अगर भूले भटके प्रतिरोध की आवाज़ उठ भी जाती है तो उसे खामोश कर दिया जाता है .

जमीन के बदले जान लेने का प्रचलन
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एक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि राजस्थान काश्तकारी कानून की धारा 42 (बी ) के होते हुए भी जिले में दलितों की हजारों बीघा जमीन पर दबंग जाट समुदाय के भूमाफियाओं ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है.यह कब्जे फर्जी गिरवी करारों,झूठे बेचाननामों और धौंस पट्टी के चलते किये गए है ,जब भी कोई दलित अपने भूमि अधिकार की मांग करता है ,तो दबंगों की दबंगई पूरी नंगई के साथ शुरू हो जाती है.ऐसा ही एक जमीन का मसला दलित अत्याचारों के लिए बदनाम डांगावास गाँव में विगत 30 वर्षों से कोर्ट में जेरे ट्रायल था ,हुआ यह कि बस्ता राम नामक मेघवाल दलित की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन कभी मात्र 1500 रूपये में इस शर्त पर गिरवी रखी गयी कि चिमना राम जाट उसमे से फसल लेगा और मूल रकम का ब्याज़ नहीं लिया जायेगा ,बाद में जब भी दलित बस्ता राम सक्षम होगा तो वह अपनी जमीन गिरवी से छुडवा लेगा .बस्ताराम जब इस स्थिति में आया कि वह मूल रकम दे कर अपनी जमीन छुडवा सकें ,तब तक चिमना राम जाट तथा उसके पुत्रों ओमाराम और काना राम के मन में लालच आ गया,जमीन कीमती हो गयी ,उन्होंने जमीन हड़पने की सोच ली और दलितों को जमीन लौटने से मना कर दिया .पहले दलितों ने याचना की ,फिर प्रेम से गाँव के सामने अपना दुखड़ा रखा ,मगर जिद्दी जाट परिवार नहीं माना ,मजबूरन दलित बस्ता राम को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी .करीब तीस साल पहले मामला मेड़ता कोर्ट में पंहुचा ,बस्ताराम तो न्याय मिलने से पहले ही गुजर गया ,बाद में उसके दत्तक पुत्र रतनाराम ने जमीन की यह जंग जारी रखी और अपने पक्ष में फैसला प्राप्त कर लिया .वर्ष 2006 में उक्त भूमि का नामान्तरकरण रतना राम के नाम पर दर्ज हो गया तथा हाल ही में में कोर्ट का फैसला भी दलित खातेदार रतना राम के पक्ष में आ गया .इसके बाद रतना राम अपनी जमीन पर एक पक्का मकान और एक कच्चा झौपडा बना कर परिवार सहित रहने लग गया ,लेकिन इसी बीच 21 अप्रैल 2015 को चिमनाराम जाट के पुत्र कानाराम तथा ओमाराम ने इस जमीन पर जबरदस्ती तालाब खोदना शुरू कर दिया और खेजड़ी के वृक्ष काट लिये.रत्ना राम ने इस पर आपत्ति दर्ज करवाई तो जाट परिवार के लोगों ने ना केवल उसे जातिगत रूप से अपमानित किया बल्कि उसे तथा उसके परिवार को जान से मार देने कि धमकी भी दी गयी .मजबूरन दलित रतना राम मेड़ता थाने पंहुचा और जाटों के खिलाफ रिपोर्ट दे कर कार्यवाही की मांग की.मगर थानेदार जी चूँकि जाट समुदाय से ताल्लुक रखते है सो उन्होंने रतनाराम की शिकयत पर कोई कार्यवाही नहीं की ,दोनों पक्षों के मध्य कुछ ना कुछ चलता रहा .

निर्मम नरसंहार ,अमानवीयता ,पशुता ,दरिंदगी !
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12 मई को जाटों ने एक पंचायत डांगावास में बुलाने का निश्चय किया ,मगर रतना राम और उसके भाई पांचाराम के गाँव में नहीं होने के कारण यह स्थगित कर दी गयी ,बाद में 14 मई को फिर से जाट पंचायत बैठी ,इस बार आर पार का फैसला करना ही पंचायत का उद्देश्य था ,अंततः एकतरफा फ़रमान जारी हुआ  कि दलितों को किसी भी कीमत पर उस जमीन से खदेड़ना है  ,चाहे जान देनी पड़े या लेनी पड़े ,दूसरी तरफ पंचायत होने की सुचना पा कर दलित अपने को बुलाये जाने का इंतजार करते हुये अपने खेत पर स्थित मकान पर ही मौजूद रहे ,अचानक उन्होंने देखा कि सैंकड़ों की तादाद में जाट लोग हाथों में लाठियां ,लौहे के सरिये और बंदूके लिये वहां आ धमके है और मुट्ठी भर दलितों को चारों तरफ से घेर कर मारने लगे ,उन्होंने साथ लाये ट्रेक्टरों से मकान तोडना भी चालू कर दिया .

दलितों ने गोली चलायी ही नहीं
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लाठियों और सरियों से जब दलितों को मारा जा रहा था ,इसी दौरान किसी ने रतनाराम मेघवाल के बेटे मुन्नाराम को निशाना बना कर  फ़ायर कर दिया ,लेकिन उसी वक्त किसी और ने मुन्ना राम के सिर के पीछे की और लोहे के सरिये से भी वार कर दिया ,जिससे मुन्नाराम  गिर पड़ा और गोली रामपाल गोस्वामी को जा कर लग गयी ,जो कि जाटों की भीड़ के साथ ही आया हुआ था .गोस्वामी की बेवजह हत्या के बाद जाट और भी उग्र हो गये ,उन्होंने मानवता की सारी हदें पार करते हए वहां मौजूद दलितों का निर्मम नरसंहार करना शुरू कर दिया.

ट्रेक्टरों से कुचला ,लिंग नोचा ,ऑंखें फोड़ दी ,गुप्तांगों में लकड़ियाँ डाल दी
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ट्रेक्टर जो कि खेतों में चलते है और फसलों को बोने के काम आते है ,वे निरीह ,निहत्थे दलितों पर चलने लगे ,पूरी बेरहमी से जाट समुदाय की यह भीड़ दलितों को कुचल रही थी ,तीन दलितों को ट्रेक्टरों से कुचल कुचल कर वहीँ मार डाला गया .इन बेमौत मारे गए दलितों में श्रमिक नेता पोकर राम भी था ,जो उस दिन अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए अपने भाई गणपत मेघवाल के साथ वहां आया हुआ था .जालिमों ने पोकरराम के साथ बहुत बुरा सलूक किया ,उस पर ट्रेक्टर चढाने के बाद उसका लिंग नोंच लिया गया तथा आँखों में जलती लकड़ियाँ डाल कर ऑंखें फोड़ दी गयी .महिलाओं के साथ ज्यादती की गयी और उनके गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गयी .तीन लोग मारे गए ,14 लोगों के हाथ पांव तोड़ दिये गए ,एक ट्रेक्टर ट्रोली तथा चार मोटर साईकलें जला कर राख कर दी गयी ,एक पक्का मकान जमींदोज कर दिया गया और कच्चे झौपड़े को आग के हवाले कर दिया गया .जो भी समान वहां था ,जालिम उसे लूट ले गए .इस तरह तकरीबन एक घंटा मौत के तांडव चलता रहा ,लेकिन मात्र 4 किलोमीटर दूरी पर मौजूद पुलिस सब कुछ घटित हो जाने के बाद पंहुची और घायलों को अस्पताल पंहुचाने के लिए एम्बुलेंस बुलवाई  ,जिसे भी रोकने की कोशिश जाटों की उग्र भीड़ ने की ,इतना ही नहीं बल्कि जब गंभीर घायलों को मेड़ता के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां भी पुलिस तथा प्रशासन की मौजूदगी में ही धावा बोलकर बचे हुए दलितों को भी खत्म करने की कोशिश की गयी .
यह अचानक नहीं हुआ ,सब कुछ पूर्वनियोजित था
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ऐसी दरिंदगी जो कि वास्तव में एक पूर्वनियोजित नरसंहार ही था ,इसे नागौर की पुलिस और प्रशासन जमीन के विवाद में दो पक्षों की ख़ूनी जंग करार दे कर दलित अत्याचार की इतनी गंभीर और लौमहर्षक  वारदात को कमतर करने की कोशिश कर रही है .पुलिस ने दलितों की और से अर्जुन राम के बयान के आधार पर एक कमजोर सी एफआईआर दर्ज की है ,जिसमे पोकरराम के साथ की गयी इतनी अमानवीय क्रूरता का कोई ज़िक्र तक नहीं है और ना ही महिलाओं के साथ हुयी भयावह यौन हिंसा के बारे में एक भी शब्द लिखा गया है. सब कुछ पूर्वनियोजित था ,भीड़ को इकट्टा करने से लेकर रामपाल गोस्वामी को गोली मारने तक की पूरी पटकथा पहले से ही तैयार थी ,ताकि उसकी आड़ में दलितों का समूल नाश किया जा सके . कुछ हद तक वो यह करने में कामयाब भी रहे ,उन्होंने बोलने वाले और संघर्ष कर सकने वाले समझदार घर के मुखिया दलितों को मौके पर ही मार डाला . बाकी बचे हुए तमाम दलित स्त्री पुरुषों के हाथ और पांव तोड़ दिये जो ज़िन्दगी भर अपाहिज़ की भांति जीने को अभिशप्त रहेंगे ,दलित महिलाओं ने जो सहा वह तो बर्दाश्त के बाहर है तथा उसकी बात करना ही पीड़ाजनक है ,इनमे से कुछ अपने शेष जीवन में सामान्य दाम्पत्य जीवन जीने के काबिल भी नहीं रही ,इससे भी भयानक साज़िश यह है कि अगर ये लोग किसी तरह जिंदा बच कर हिम्मत करके वापस डांगावास लौट भी गये तो रामपाल गोस्वामी की हत्या का मुकदमा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है ,यानि कि बाकी बचा जीवन जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा ,अब आप ही सोचिये ये दलित कभी वापस उस जमीन पर जा पाएंगे .क्या इनको जीते जी कभी न्याय हासिल हो पायेगा ? आज के हालात में तो यह असंभव नज़र आता है .

इस शर्मनाक कृत्य पर शर्मिंदा नहीं है जालिम
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कुछ दलित एवं मानव अधिकार जन संगठन इस नरसंहार के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है ,मगर उनकी आवाज़ कितनी सुनी जाएगी यह एक प्रश्न है .सूबे की भाजपा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है ,कोई  भी ज़िम्मेदार सरकार का नुमाइंदा घटना के चौथे दिन तक ना तो डांगावास पंहुचा था और ना ही घायलों की कुशलक्षेम जानने आया .अब जबकि मामले ने तूल पकड़ लिया है तब सरकार की नींद खुली है ,फिर भी मात्र पांच किलोमीटर दूर रहने वाला स्थानीय भाजपा विधायक सुखराम कल तक अपने ही समुदाय के लोगों के दुःख को जानने नहीं पंहुचा .नागौर जिले में एक जाति का जातीय आतंकवाद इस कदर हावी है कि कोई भी उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता है .दूसरी और जाट समुदाय के छात्र नेता ,कथित समाजसेवक और छुटभैये नेता इस हत्याकाण्ड के लिए एक दुसरे को सोशल मीडिया पर बधाईयाँ दे रहे है तथा कह रहे है कि आरक्षण तथा अजा जजा कानून की वजह से सिर पर चढ़ गए इन दलितों को औकात बतानी जरुरी थी ,वीर तेज़पुत्रों ने दलित पुरुषों को कुचल कुचल कर मारा तथा उनके आँखों में जलती लकड़ियाँ घुसेडी और उनकी नीच औरतों को रगड़ रगड़ कर मारा तथा ऐसी हालत की कि वे भविष्य में कोई और दलित पैदा ही नहीं कर सकें .इन अपमानजनक टिप्पणियों के बारे में मेड़ता थाने में दलित समुदाय की तरफ से एफ आई आर भी दर्ज करवाई गयी है ,जिस पर कार्यवाही का इंतजार है.

सीबीआई जाँच ही सच सामने ला सकती है .
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अगर डांगावास नरसंहार की निष्पक्ष जाँच करवानी है तो इस पूरे मामले को सी बी आई को सौपना होगा ,क्योंकि अभी तक तो जाँच अधिकारी भी जाट लगा कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि वह कितनी संवेदनहीन है ,आखिर जिन  अधिकारियों के सामने जाटों ने यह तांडव किया और उसकी इसमें मूक सहमति रही ,जिसने दलितों की कमजोर एफ आई आर दर्ज की और दलितों को फ़साने के लिए जवाबी मामला दर्ज किया तथा पोस्टमार्टम से लेकर मेडिकल रिपोर्ट्स तक सब मैनेज किया  ,उन्हीं लोगों के हाथ में जाँच दे कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया कि उनकी नज़र में भी दलितों की औकात कितनी है .

ख़ामोशी भयानक है .
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इतना सब कुछ होने के बाद भी दलित ख़ामोश है ,यह आश्चर्यजनक बात है .कहीं कोई भी हलचल नहीं है ,मेघसेनाएं ,दलित पैंथर्स ,दलित सेनाएं ,मेघवाल महासभाएं सब कौनसे दड़बे में छुपी हुयी है ? अगर इस नरसंहार पर भी दलित संगठन नहीं बोले तब तो कल हर बस्ती में डांगावास होगा ,हर घर आग के हवाले होगा ,हर दलित कुचला जायेगा और हर दलित स्त्री यौन हिंसा की शिकार होगी ,हर गाँव बथानी टोला होगा ,कुम्हेर होगा ,लक्ष्मणपुर बाथे और भगाना होगा .इस कांड की भयावहता और वहशीपन देख कर पूंछने का मन करता है कि क्या यह एक और खैरलांजी नहीं है ? अगर हाँ तो हमारी मरी हुयी चेतना कब पुनर्जीवित होगी या हम मुर्दा कौमों की भांति रहेंगे अथवा जिंदा लाशें बन कर धरती का बोझ बने रहेंगे .अगर हम दर्द से भरी इस दुनिया को बदल देना चाहते है तो हमें सडकों पर उतरना होगा और तब तक चिल्लाना होगा जब तक कि डांगावास के अपराधियों को सजा नहीं मिल जाये और एक एक पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाये ,उस दिन के इंतजार में हमें रोज़ रोज़ लड़ना है ,कदम कदम पर लड़ना है और हर दिन मरना है ,ताकि हमारी भावी पीढियां आराम से ,सम्मान और स्वाभिमान से जी सके .

-    भंवर मेघवंशी

(लेखक राजस्थान में दलित ,आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के प्रश्नों पर संघर्षरत है ) 

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राजस्थान का नागौर जिला दलितों की कब्रगाह बनता जा रहा है .
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राजस्थान की राजधानी जयपुर से तक़रीबन ढाई सौ किलोमीटर दूर स्थित अन्य पिछड़े वर्ग की एक दबंग जाट जाति की बहुलता वाला नागौर  जिला इन दिनों दलित उत्पीडन की निरंतर घट रही शर्मनाक घटनाओं की वजह से कुख्यात हो रहा है .विगत एक साल के भीतर यहाँ पर दलितों के साथ जिस तरह का जुल्म हुआ है और आज भी जारी है ,उसे देखा जाये तो दिल दहल जाता है ,यकीन ही नहीं आता है कि हम आजाद भारत के किसी एक हिस्से की बात कर रहे है .ऐसी ऐसी निर्मम और क्रूर वारदातें कि जिनके सामने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों द्वारा की जाने वाली घटनाएँ भी छोटी पड़ने लगती है .क्या किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र में ऐसी घटनाएँ संभव है ? वैसे तो असम्भव है ,लेकिन यह संभव हो रही है ,यहाँ के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचें की नाकामी की वजह से ...

दलित उत्पीडन का गढ़ बन गया है नागौर
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नागौर जिले के बसवानी गाँव में पिछले महीने ही एक दलित परिवार के झौपड़े में दबंग जाटों ने आग लगा दी ,जिससे एक बुजुर्ग दलित महिला वहीँ जल कर राख हो गयी और दो अन्य लोग बुरी तरह से जल गए ,जिन्हें जोधपुर के सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया ,इसी जिले के लंगोड़ गाँव में एक दलित को जिंदा दफनाने का मामला सामने आया है.मुंडासर में एक दलित औरत को घसीट कर ट्रेक्टर के गर्म सायलेंसर से दागा गया और हिरडोदा गाँव में एक दलित दुल्हे को घोड़ी पर से नीचे पटक कर जान से मरने की कोशिश की गयी .राजस्थान का यह जाटलेंड जिस तरह की अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहा है ,उसके समक्ष तो खाप पंचायतों के तुगलकी फ़रमान भी कहीं नहीं टिकते है ,ऐसा लगता है कि इस इलाके में कानून का राज नहीं ,बल्कि जाट नामक किसी कबीले का कबीलाई कानून चलता है,जिसमे भीड़ का हुकुम ही न्याय है और आवारा भीड़ द्वारा किये गए कृत्य ही विधान है .

डांगावास : दलित हत्याओं की प्रयोगशाला
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नागौर जिले की तहसील मेड़ता सिटी का निकटवर्ती गाँव है डांगावास ,जहाँ पर 150 दलित परिवार निवास करते है और यहाँ 1600 परिवार जाट समुदाय के है ,तहसील मुख्यालय से मात्र 2 किलोमीटर दुरी पर स्थित है डांगावास ,..जी हाँ ,यह वही डांगावास गाँव है ,जहाँ पिछले एक साल में  चार दलित हत्याकांड हो चुके है ,जिसमे सबसे भयानक हाल ही में हुआ है. एक साल पहले यहाँ के दबंग जाटों ने मोहन लाल मेघवाल के निर्दोष बेटे की जान ले ली थी ,मामला गाँव में ही ख़त्म कर दिया गया ,उसके बाद 6 माह पहले मदन पुत्र गबरू मेघवाल के पाँव तोड़ दिये गए ,4 माह पहले सम्पत मेघवाल को जान से ख़त्म कर दिया गया ,इन सभी घटनाओं को आपसी समझाईश अथवा डरा धमका कर रफा दफा कर दिया गया .पुलिस ने भी कोई कार्यवाही नहीं की .
स्थानीय दलितों का कहना है कि बसवानी में दलित महिला को जिंदा जलाने के आरोपी पकडे नहीं गए और शेष जगहों की गंभीर घटनाओं में भी कोई कार्यवाही इसलिए नहीं हुयी क्योंकि सभी घटनाओं के मुख्य आरोपी प्रभावशाली जाट समुदाय के लोग है .यहाँ पर थानेदार भी उनके है ,तहसीलदार भी उनके ही और राजनेता भी उन्हीं की कौम के है ,फिर किसकी बिसात जो वे जाटों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाये ? इस तरह मिलीभगत से बर्षों से दमन का यह चक्र जारी है ,कोई आवाज़ नहीं उठा सकता है ,अगर भूले भटके प्रतिरोध की आवाज़ उठ भी जाती है तो उसे खामोश कर दिया जाता है .
जमीन के बदले जान लेने का प्रचलन
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एक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि राजस्थान काश्तकारी कानून की धारा 42 (बी ) के होते हुए भी जिले में दलितों की हजारों बीघा जमीन पर दबंग जाट समुदाय के भूमाफियाओं ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है.यह कब्जे फर्जी गिरवी करारों,झूठे बेचाननामों और धौंस पट्टी के चलते किये गए है ,जब भी कोई दलित अपने भूमि अधिकार की मांग करता है ,तो दबंगों की दबंगई पूरी नंगई के साथ शुरू हो जाती है.ऐसा ही एक जमीन का मसला दलित अत्याचारों के लिए बदनाम डांगावास गाँव में विगत 30 वर्षों से कोर्ट में जेरे ट्रायल था ,हुआ यह कि बस्ता राम नामक मेघवाल दलित की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन कभी मात्र 1500 रूपये में इस शर्त पर गिरवी रखी गयी कि चिमना राम जाट उसमे से फसल लेगा और मूल रकम का ब्याज़ नहीं लिया जायेगा ,बाद में जब भी दलित बस्ता राम सक्षम होगा तो वह अपनी जमीन गिरवी से छुडवा लेगा .बस्ताराम जब इस स्थिति में आया कि वह मूल रकम दे कर अपनी जमीन छुडवा सकें ,तब तक चिमना राम जाट तथा उसके पुत्रों ओमाराम और काना राम के मन में लालच आ गया,जमीन कीमती हो गयी ,उन्होंने जमीन हड़पने की सोच ली और दलितों को जमीन लौटने से मना कर दिया .पहले दलितों ने याचना की ,फिर प्रेम से गाँव के सामने अपना दुखड़ा रखा ,मगर जिद्दी जाट परिवार नहीं माना ,मजबूरन दलित बस्ता राम को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी .करीब तीस साल पहले मामला मेड़ता कोर्ट में पंहुचा ,बस्ताराम तो न्याय मिलने से पहले ही गुजर गया ,बाद में उसके दत्तक पुत्र रतनाराम ने जमीन की यह जंग जारी रखी और अपने पक्ष में फैसला प्राप्त कर लिया .वर्ष 2006 में उक्त भूमि का नामान्तरकरण रतना राम के नाम पर दर्ज हो गया तथा हाल ही में में कोर्ट का फैसला भी दलित खातेदार रतना राम के पक्ष में आ गया .इसके बाद रतना राम अपनी जमीन पर एक पक्का मकान और एक कच्चा झौपडा बना कर परिवार सहित रहने लग गया ,लेकिन इसी बीच 21 अप्रैल 2015 को चिमनाराम जाट के पुत्र कानाराम तथा ओमाराम ने इस जमीन पर जबरदस्ती तालाब खोदना शुरू कर दिया और खेजड़ी के वृक्ष काट लिये.रत्ना राम ने इस पर आपत्ति दर्ज करवाई तो जाट परिवार के लोगों ने ना केवल उसे जातिगत रूप से अपमानित किया बल्कि उसे तथा उसके परिवार को जान से मार देने कि धमकी भी दी गयी .मजबूरन दलित रतना राम मेड़ता थाने पंहुचा और जाटों के खिलाफ रिपोर्ट दे कर कार्यवाही की मांग की.मगर थानेदार जी चूँकि जाट समुदाय से ताल्लुक रखते है सो उन्होंने रतनाराम की शिकयत पर कोई कार्यवाही नहीं की ,दोनों पक्षों के मध्य कुछ ना कुछ चलता रहा .
निर्मम नरसंहार ,अमानवीयता ,पशुता ,दरिंदगी !
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12 मई को जाटों ने एक पंचायत डांगावास में बुलाने का निश्चय किया ,मगर रतना राम और उसके भाई पांचाराम के गाँव में नहीं होने के कारण यह स्थगित कर दी गयी ,बाद में 14 मई को फिर से जाट पंचायत बैठी ,इस बार आर पार का फैसला करना ही पंचायत का उद्देश्य था ,अंततः एकतरफा फ़रमान जारी हुआ  कि दलितों को किसी भी कीमत पर उस जमीन से खदेड़ना है  ,चाहे जान देनी पड़े या लेनी पड़े ,दूसरी तरफ पंचायत होने की सुचना पा कर दलित अपने को बुलाये जाने का इंतजार करते हुये अपने खेत पर स्थित मकान पर ही मौजूद रहे ,अचानक उन्होंने देखा कि सैंकड़ों की तादाद में जाट लोग हाथों में लाठियां ,लौहे के सरिये और बंदूके लिये वहां आ धमके है और मुट्ठी भर दलितों को चारों तरफ से घेर कर मारने लगे ,उन्होंने साथ लाये ट्रेक्टरों से मकान तोडना भी चालू कर दिया .
दलितों ने गोली चलायी ही नहीं
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लाठियों और सरियों से जब दलितों को मारा जा रहा था ,इसी दौरान किसी ने रतनाराम मेघवाल के बेटे मुन्नाराम को निशाना बना कर  फ़ायर कर दिया ,लेकिन उसी वक्त किसी और ने मुन्ना राम के सिर के पीछे की और लोहे के सरिये से भी वार कर दिया ,जिससे मुन्नाराम  गिर पड़ा और गोली रामपाल गोस्वामी को जा कर लग गयी ,जो कि जाटों की भीड़ के साथ ही आया हुआ था .गोस्वामी की बेवजह हत्या के बाद जाट और भी उग्र हो गये ,उन्होंने मानवता की सारी हदें पार करते हए वहां मौजूद दलितों का निर्मम नरसंहार करना शुरू कर दिया.
ट्रेक्टरों से कुचला ,लिंग नोचा ,ऑंखें फोड़ दी ,गुप्तांगों में लकड़ियाँ डाल दी
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ट्रेक्टर जो कि खेतों में चलते है और फसलों को बोने के काम आते है ,वे निरीह ,निहत्थे दलितों पर चलने लगे ,पूरी बेरहमी से जाट समुदाय की यह भीड़ दलितों को कुचल रही थी ,तीन दलितों को ट्रेक्टरों से कुचल कुचल कर वहीँ मार डाला गया .इन बेमौत मारे गए दलितों में श्रमिक नेता पोकर राम भी था ,जो उस दिन अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए अपने भाई गणपत मेघवाल के साथ वहां आया हुआ था .जालिमों ने पोकरराम के साथ बहुत बुरा सलूक किया ,उस पर ट्रेक्टर चढाने के बाद उसका लिंग नोंच लिया गया तथा आँखों में जलती लकड़ियाँ डाल कर ऑंखें फोड़ दी गयी .महिलाओं के साथ ज्यादती की गयी और उनके गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गयी .तीन लोग मारे गए ,14 लोगों के हाथ पांव तोड़ दिये गए ,एक ट्रेक्टर ट्रोली तथा चार मोटर साईकलें जला कर राख कर दी गयी ,एक पक्का मकान जमींदोज कर दिया गया और कच्चे झौपड़े को आग के हवाले कर दिया गया .जो भी समान वहां था ,जालिम उसे लूट ले गए .इस तरह तकरीबन एक घंटा मौत के तांडव चलता रहा ,लेकिन मात्र 4 किलोमीटर दूरी पर मौजूद पुलिस सब कुछ घटित हो जाने के बाद पंहुची और घायलों को अस्पताल पंहुचाने के लिए एम्बुलेंस बुलवाई  ,जिसे भी रोकने की कोशिश जाटों की उग्र भीड़ ने की ,इतना ही नहीं बल्कि जब गंभीर घायलों को मेड़ता के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां भी पुलिस तथा प्रशासन की मौजूदगी में ही धावा बोलकर बचे हुए दलितों को भी खत्म करने की कोशिश की गयी .
यह अचानक नहीं हुआ ,सब कुछ पूर्वनियोजित था
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ऐसी दरिंदगी जो कि वास्तव में एक पूर्वनियोजित नरसंहार ही था ,इसे नागौर की पुलिस और प्रशासन जमीन के विवाद में दो पक्षों की ख़ूनी जंग करार दे कर दलित अत्याचार की इतनी गंभीर और लौमहर्षक  वारदात को कमतर करने की कोशिश कर रही है .पुलिस ने दलितों की और से अर्जुन राम के बयान के आधार पर एक कमजोर सी एफआईआर दर्ज की है ,जिसमे पोकरराम के साथ की गयी इतनी अमानवीय क्रूरता का कोई ज़िक्र तक नहीं है और ना ही महिलाओं के साथ हुयी भयावह यौन हिंसा के बारे में एक भी शब्द लिखा गया है. सब कुछ पूर्वनियोजित था ,भीड़ को इकट्टा करने से लेकर रामपाल गोस्वामी को गोली मारने तक की पूरी पटकथा पहले से ही तैयार थी ,ताकि उसकी आड़ में दलितों का समूल नाश किया जा सके . कुछ हद तक वो यह करने में कामयाब भी रहे ,उन्होंने बोलने वाले और संघर्ष कर सकने वाले समझदार घर के मुखिया दलितों को मौके पर ही मार डाला . बाकी बचे हुए तमाम दलित स्त्री पुरुषों के हाथ और पांव तोड़ दिये जो ज़िन्दगी भर अपाहिज़ की भांति जीने को अभिशप्त रहेंगे ,दलित महिलाओं ने जो सहा वह तो बर्दाश्त के बाहर है तथा उसकी बात करना ही पीड़ाजनक है ,इनमे से कुछ अपने शेष जीवन में सामान्य दाम्पत्य जीवन जीने के काबिल भी नहीं रही ,इससे भी भयानक साज़िश यह है कि अगर ये लोग किसी तरह जिंदा बच कर हिम्मत करके वापस डांगावास लौट भी गये तो रामपाल गोस्वामी की हत्या का मुकदमा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है ,यानि कि बाकी बचा जीवन जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा ,अब आप ही सोचिये ये दलित कभी वापस उस जमीन पर जा पाएंगे .क्या इनको जीते जी कभी न्याय हासिल हो पायेगा ? आज के हालात में तो यह असंभव नज़र आता है .
इस शर्मनाक कृत्य पर शर्मिंदा नहीं है जालिम
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कुछ दलित एवं मानव अधिकार जन संगठन इस नरसंहार के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है ,मगर उनकी आवाज़ कितनी सुनी जाएगी यह एक प्रश्न है .सूबे की भाजपा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है ,कोई  भी ज़िम्मेदार सरकार का नुमाइंदा घटना के चौथे दिन तक ना तो डांगावास पंहुचा था और ना ही घायलों की कुशलक्षेम जानने आया .अब जबकि मामले ने तूल पकड़ लिया है तब सरकार की नींद खुली है ,फिर भी मात्र पांच किलोमीटर दूर रहने वाला स्थानीय भाजपा विधायक सुखराम आज तक अपने ही समुदाय के लोगों के दुःख को जानने नहीं पंहुचा .नागौर जिले में एक जाति का जातीय आतंकवाद इस कदर हावी है कि कोई भी उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता है .दूसरी और जाट समुदाय के छात्र नेता ,कथित समाजसेवक और छुटभैये नेता इस हत्याकाण्ड के लिए एक दुसरे को सोशल मीडिया पर बधाईयाँ दे रहे है तथा कह रहे है कि आरक्षण तथा अजा जजा कानून की वजह से सिर पर चढ़ गए इन दलितों को औकात बतानी जरुरी थी ,वीर तेज़पुत्रों ने दलित पुरुषों को कुचल कुचल कर मारा तथा उनके आँखों में जलती लकड़ियाँ घुसेडी और उनकी नीच औरतों को रगड़ रगड़ कर मारा तथा ऐसी हालत की कि वे भविष्य में कोई और दलित पैदा ही नहीं कर सकें .इन अपमानजनक टिप्पणियों के बारे में मेड़ता थाने में दलित समुदाय की तरफ से एफ आई आर भी दर्ज करवाई गयी है ,जिस पर कार्यवाही का इंतजार है.
सीबीआई जाँच ही सच सामने ला सकती है .
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अगर डांगावास नरसंहार की निष्पक्ष जाँच करवानी है तो इस पूरे मामले को सी बी आई को सौपना होगा ,क्योंकि अभी तक तो जाँच अधिकारी भी जाट लगा कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि वह कितनी संवेदनहीन है ,आखिर जिन  अधिकारियों के सामने जाटों ने यह तांडव किया और उसकी इसमें मूक सहमति रही ,जिसने दलितों की कमजोर एफ आई आर दर्ज की और दलितों को फ़साने के लिए जवाबी मामला दर्ज किया तथा पोस्टमार्टम से लेकर मेडिकल रिपोर्ट्स तक सब मैनेज किया  ,उन्हीं लोगों के हाथ में जाँच दे कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया कि उनकी नज़र में भी दलितों की औकात कितनी है .
ख़ामोशी भयानक है .
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इतना सब कुछ होने के बाद भी दलित ख़ामोश है ,यह आश्चर्यजनक बात है .कहीं कोई भी हलचल नहीं है ,मेघसेनाएं ,दलित पैंथर्स ,दलित सेनाएं ,मेघवाल महासभाएं सब कौनसे दड़बे में छुपी हुयी है ? अगर इस नरसंहार पर भी दलित संगठन नहीं बोले तब तो कल हर बस्ती में डांगावास होगा ,हर घर आग के हवाले होगा ,हर दलित कुचला जायेगा और हर दलित स्त्री यौन हिंसा की शिकार होगी ,हर गाँव बथानी टोला होगा ,कुम्हेर होगा ,लक्ष्मणपुर बाथे और भगाना होगा .इस कांड की भयावहता और वहशीपन देख कर पूंछने का मन करता है कि क्या यह एक और खैरलांजी नहीं है ? अगर हाँ तो हमारी मरी हुयी चेतना कब पुनर्जीवित होगी या हम मुर्दा कौमों की भांति रहेंगे अथवा जिंदा लाशें बन कर धरती का बोझ बने रहेंगे .अगर हम दर्द से भरी इस दुनिया को बदल देना चाहते है तो हमें सडकों पर उतरना होगा और तब तक चिल्लाना होगा जब तक कि डांगावास के अपराधियों को सजा नहीं मिल जाये और एक एक पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाये ,उस दिन के इंतजार में हमें रोज़ रोज़ लड़ना है ,कदम कदम पर लड़ना है और हर दिन मरना है ,ताकि हमारी भावी पीढियां आराम से ,सम्मान और स्वाभिमान से जी सके .
-    भंवर मेघवंशी
(लेखक राजस्थान में दलित ,आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के प्रश्नों पर संघर्षरत है )