Thursday, November 26, 2015

आमिर ने क्या गलत कह दिया

जरुरत है असहिष्णुता पर एक राष्ट्रीय बहस की !
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सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध लोकप्रिय कलाकार आमिर खान ने उनकी पत्नी किरण द्वारा जाहिर किये गए डर को साझा करके देश में बन रहे एक खास तरह के माहौल पर चल रही बहस को तीखा कर दिया है .हालाँकि आमिर ने बहुत ही जिम्मेदारीपूर्ण बयान दिया है .उन्होंने इसके जरिये चुने हुए जनप्रतिनिधियों से जवाबदेही मांगी है तथा उन्हें याद दिलाया है कि उनके कथन से लोगों में कानून के प्रति आस्था जगनी चाहिए ,ना कि डर .आमिर ने स्पष्ट रूप से अवार्ड वापस कर रहे लोगों का ना केवल समर्थन किया है बल्कि यह भी कहा है कि वे देश में चल रहे हर अहिंसक विरोध के पक्ष में है ,क्योंकि विरोध करना हमारा अधिकार है .
शाहरुख़ खान की तरह ही आमिर खान को भी इसकी जमकर प्रतिक्रियाएं झेलनी पड़ रही है .अनुपम खेर तथा परेश रावल जैसे साथी कलाकारों से लेकर साधारण भारतीय नागरिकों तक आमिर के पक्ष और विपक्ष में लोग बोल रहे है .हर बार की तरह इस बार भी एक कलाकार की व्यथा ,डर और असंतोष चर्चा का विषय नहीं है ,उनका मुसलमान होना और इस बेबाकी से बोलना सहन नहीं किया जा रहा है .
लगभग इन्हीं दिनों जयपुर में हो रहे एक आर्ट सम्मिट में गाय का केनवास चित्र बनाकर उसे बलून के सहारे हवा में उड़ाने वाले कलाकार को राजस्थान पुलिस ने उत्पीडित किया , एक अन्य कलाकार को बालों से पकड़ कर पुलिस थाने तक ले गयी और अंततः वह गाय का चित्र आर्ट सम्मिट से हटा दिया गया .राज्य शासन ने त्वरित कार्यवाही करते हुए थानाधिकारी व दोषी पुलिसकर्मियों को निलम्बित कर दिया और मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर खेद जताया .घाव पर मरहम लगाने के लिए मुख्यमंत्री ने कला समारोह का दौरा भी किया और कलाकारों के बीच वक़्त गुजर कर राज्य पुलिस द्वारा दिखाई गयी असहिष्णुता के प्रभाव को कम करने कि भी कोशिस की है .पर कलाकर्मियों के चेहरों पर एक अज्ञात भय साफ देखा जा सकता है .
आखिर हो क्या रहा है ? अलग विचार प्रस्तुत करनेवाली किताबें लुगदी में बदली जा रही है .पेटिंग्स तोड़ी जा रही है .हर चीज़ को ,हर रचना को धर्म और आस्था की कसौटी पर कसा जा रहा है .लोग डर रहे है .अजीब सा भयभीत करनेवाला माहौल फिजाओं में तारी है ,लेकिन दावा यह किया जा रहा है कि हम विश्व के सबसे सहिष्णु राष्ट्र है .
शायद यह सवाल करने का यह सही वक़्त है कि क्या वाकई देश में असहिष्णुता और अराजकता का माहौल बन गया है, जिसमे भीड़ के हाथों में सब कुछ सौंप दिया गया है या सिर्फ यह एक प्रायोजित राजनीतिक बहस है. ,क्या इस देश के  अधिकांश बुद्धिजीवी किसी के मोहरे बने हुये है या वास्तव में ऐसा माहौल बन चुका है .गंभीर प्रश्न यही है कि अगर इस विषय पर दलाई लामा और भारत के उपराष्ट्रपति एवं राष्ट्रपति तक को बोलना पड़ रहा है तो अवार्ड वापसी को सिर्फ विपक्षी पार्टी का षड्यंत्र कह कर उपेक्षित करना सही नहीं होगा .देश में ही नहीं बल्कि अब तो सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता का विमर्श  अंतराष्ट्रीय पटल पर पंहुच गया है.इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि इस  विषय पर एक खुली राष्ट्रीय बहस की जाये .
यह सही है कि देश में सहन करने की शक्ति निरंतर क्षीण होती जा रही है .जिस देश ने कभी चार्वाक ,बुद्ध ,कबीर जैसे प्रखर आलोचकों को स्वीकार किया था ,वह अब दाभोलकर ,कलबुर्गी और पानसरे जैसे तर्कवादियों और पाखंड विरोधियों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है ,उनकी हत्याएं कर दी गई है .टीपू सुल्तान की जयंती मनाने को लेकर हिंसा होती है ,जिसमें लोग मारे जाते है .गाँधी का देश होने का दावा करने वाले मुल्क में उनके हत्यारे गोडसे का बलिदान दिवस मनाया जाता है .खाने पीने की आदतों को लेकर लोग मार दिये जाते है .हालात यहाँ तक जा पहुंचे है कि अब इंसान से ज्यादा पवित्र जानवर होने लगे है और असहमति की हर आवाज़ को देशभक्ति की तुला पर तोला जाने लगा है .अगर आप सत्ता के विरुद्ध बोलते है तो आपको देशद्रोही माना जायेगा .ऐसे में लगातार घट रही सहिष्णुता पर सवाल उठाया जाना लाज़िमी ही है .
जब हर मतभेद को प्रतिपक्ष की साज़िश मान लिया जाये और कुछ लोग और संस्थाएं स्वयं को राष्ट्र मानने लगे तब जरुरी है कि विचारवान लोग अपने बौद्धिक दडबों से बाहर आ कर अपने सामाजिक सरोकारों और प्रतिबद्ताओं को प्रकट करें .संभवतः यही काम किया साहित्यकार उदय प्रकाश ने ,उन्होंने अपने एक फेसबुक पोस्ट के ज़रिये 4 सितम्बर को असहिष्णुता की बहस खडी करते हुए अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया तथा कहा कि यह समाज और सत्ता प्रतिष्ठान में व्याप्त ख़ामोशी को तोड़ने की एक कोशिस है .इसके बाद पुरस्कार वापसी एक तरीका बन गई सत्ता की ख़ामोशी को इंगित करने का .कई नामचीन साहित्यकारों ,फिल्मकारों और वैज्ञानिकों ने अवार्ड्स लौटा दिये और देश में बढ़ रही असहिष्णुता पर तीखी टिप्पणियाँ की .इससे देश में एक विमर्श बना .शायद इस प्रकार से पुरस्कार वापसी का उद्देश्य भी यही रहा होगा कि किसी ना किसी तरीके से सत्ताधारी वर्ग इस विषय की गंभीरता का अहसास करे और एक राष्ट्रव्यापी बहस इस पर हो .देश के बुद्धिजीवी वर्ग का यह प्रयोग सफल रहा ,क्योंकि यह बहस सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही ,इस पर विश्व के कई अन्य देशों में भी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की गयी ,भारतीय मूल के ब्रिटिश शिल्पकार अनीश कपूर ने इसे भारत में हिन्दू तालिबान का उभार करार दिया ,जिस पर काफी हंगामा भी मचा .भारत में भी कई विचारशील लोगों ने बढती हुई असहिष्णुता के प्रति सरकार द्वारा बरती जा रही सहिष्णुता को फासीवाद बताया गया और इसे भारतीय संस्कृति के सहिष्णुता के सनातन मूल्यों की हत्या निरुपित किया गया .
कला ,साहित्य और विज्ञान से ताल्लुक रखनेवाले लोगों ने अपना काम किया ,लेकिन सरकार यहाँ पर चूक गई .उसने राजधर्म निभाने के बजाय अपने दरबारियों को आगे कर दिया .जो काम सरकार का था ,वह काम सत्ता से लाभान्वित अथवा सत्ता लाभों के प्रति आशान्वित एक तबके के भरोसे छोड़ देना सरकार की गंभीर भूल साबित हुयी .अगर देश का बुद्धिजीवी तबका नाराज है और वह विभिन्न कारणों से आहत महसूस कर रहा है तो प्रधानमंत्री कार्यालय को उनसे सीधा संवाद स्थापित करना चाहिये था ,मगर हुआ इसका उल्टा. जो मंत्री साहित्य के ककहरे से भी अपरिचित है ,वे बयानबाज़ी करने लगे ,उन्होंने पुरस्कार वापसी को राजनीती से प्रेरित बताना शुरू कर दिया .विदेश राज्यमंत्री वी के सिंह जो कि अपने विवादित बयानों के लिए जाने जा रहे है ,उन्होंने बेशर्मी की हद तक जा कर कह दिया कि कविता या लेख पढ़ने के बहाने विदेश में घूमने और दारू पीने पर पाबन्दी लगने से साहित्यकार बौखला गए है .अब तो उन्होंने यहाँ तक भी कह दिया है कि अवार्ड वापसी और सरकार विरोधी बयानबाज़ी के लिए देश के इन बुद्धिजीवियों को पैसा मिला है .मौजूदा सरकार के कईं अन्य ज़िम्मेदार लोगों की प्रतिक्रियाएं भी इतनी ही हल्की और बेहूदगी से भरी हुई थी ,उन्होंने इस पूरे विमर्श को राजनीतिक बहस बना दिया और इसे मुख्य विपक्षी दल की करतूत साबित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी .नतीजा यह हुआ कि लोग पूंछने लगे है कि क्या सत्ता को इतना गैरजिम्मेदाराना दम्भी रवैय्या रखना चाहिये ? संवेदनशील लोगों को घबराये हुए वामपंथी कह कर तिरस्कृत करने मात्र से क्या सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता की बहस ख़त्म हो जाएगी .
देश के बुद्धिजीवी तबके पर प्रतिपक्षी दलों से साठ गांठ करने के आरोपों को साबित करने के लिए सरकार देश को यह बता पाने में विफल रही है कि यह साज़िश किन किन लोगों ने कैसे रची और कब यह साहित्यकार वर्ग विपक्षियों से मिला ,जहाँ पर इस प्रकार का प्रचंड प्रतिरोध खड़ा करने पर सहमती हुई .सब कुछ पूर्वाग्रहों पर आधारित लगता है ,यह कहना कि इनमें से ज्यादातर साहित्यकार एवं कलाधर्मी पहले से ही प्रधानमन्त्री की मुखालफत करते रहे है ,इसलिए ऐसे घोषित विरोधियों के प्रलाप को तवज्जोह  नहीं दी जा सकती है .शासन इस तरह से नहीं चल सकता है .जो भी सत्ता में है उसे सबकी सुननी पड़ेगी .वह सिर्फ सुनाने में ही यकीन करने लगे और एकतरफा मन की बात सिर्फ रेडियो से आने लगे तो यह प्रवृति किसी भी प्रजातंत्र का स्वास्थ्य बिगाड़ सकती है .सत्ता को संवाद का रास्ता लेना ही चाहिए ,अगर वह कलमकारों से संवाद नहीं कर पा रही है तो बंदूक थामें लोगों से कैसे बातचीत करेगी .सत्ता को सुनना ही चाहिये और वक़्त जरुरत बोलना भी चाहिए .
अब भी समय है ,प्रधानमन्त्री सिर्फ अपने दरबारी बुद्धिजीवियों से मिलने के बजाय अपने घोषित विरोधी बुद्धिजीवीयों से दिल खोल कर मिले ,उनकी बात सुने ,उनकी भावनाओं की कद्र करे ताकि देश में एक भरोसे का माहौल कायम हो सके .प्रधानमन्त्री को उनके नाम पर सेनाएं और फेंसक्लब बनाकर उनके चित्र लगा कर ऑनलाइन गुंडागर्दी पर उतरे हुए लोगों पर भी लगाम लगानी चाहिये .लगाम तो उन्हें अपने बड़बोले फूहड़ किस्म के बयानबाज़ मंत्रिमंडलीय सहयोगियों पर भी लगानी चाहिए ताकि वे उलजलूल बयान दे कर अपने मानसिक दिवालियेपन को उजागर करने से बचे रह सके .
इस बहस ने सत्ता के अंहकारी चरित्र को तो उजागर किया ही है .साहित्यकार जमात के सामाजिक सरोकारों पर भी उँगलियाँ उठाई है. सवाल उठ रहे है कि क्या कला,संस्कृति और साहित्य की भी कोई प्रतिबद्ता है या नहीं या सिर्फ  बंद कमरों में लिखना ,प्रायोजित सेमिनारों में बौद्धिक जुगाली करना और पुरस्कार प्राप्ति की तिकड़मबाज़ी और साहित्यक खेमेबाजी ही उनके सामाजिक  सरोकार है ? आज बुद्धिजीवी जमात पर भी अपनी जवाबदेही साबित करने का दबाव बढ़ रहा है ,वे सिर्फ पुरस्कार लौटा कर ख़ामोश नहीं हो सकते है ,उन्हें सड़कों पर उतरने की संभावनाएं भी तलाशनी होगी .वे जन से कैसे जुड़ सकते है और जनता के मुद्दे कैसे उनके साहित्य या कला के ज़रिये आगे बढ़ सकते ,इस पर भी उन्हें सोचना होगा .
रही बात सत्ता प्रतिष्ठान की तो उसे  प्रतिरोध की आवाज़ों को प्रतिपक्ष की आवाजें बना कर उनमे साज़िश के सूत्र ढूंढने के बजाय सत्ता तंत्र को सहिष्णुता और असहिष्णुता पर एक खुली बहस करने का माद्दा दिखाना चाहिये .ताकि यह  स्वीकारा जा सकें कि हमारी संस्कृति ,समाज ,साहित्य , कला , धर्म तथा राजनीति में कई  तत्व समाहित है ,जो हमें असहिष्णु बनाते है .अगर सबरीमाला के पुजारी महिलाओं की माहवारी के दौरान उन्हें मंदिर में प्रवेश को वर्जित करनेवाला बयान देते है और वंचित तबको का का निरंतर उत्पीड़न व बहिष्करण जारी है तो दुनिया के सबसे सहिष्णु राष्ट्र राज्य या समाज होने का हमारा दावा सिर्फ पाखंड भर है .
-    भंवर मेघवंशी

{ स्वतंत्र पत्रकार }

Wednesday, November 25, 2015

वैसे ,आखिरी बार कब थे आप सहिष्णु

कब सहिष्णु थे आप ?
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कौन से युग ,किस सदी ,
किस कालखंड में ,सहिष्णु थे आप ?
देवासुर संग्राम के समय ?
जब अमृत खुद चखा
और विष छोड़ दिया
उनके लिए ,
जो ना थे तुमसे सहमत.
दैत्य ,दानव ,असुर ,किन्नर
यक्ष ,राक्षस
क्या क्या ना कहा उनको.
वध ,मर्दन ,संहार
क्या क्या ना किया उनका .
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 तब थे आप सहिष्णु ?
जब मर्यादा पुरुषोत्तम ने काट लिया था
शम्बूक का सिर .
ली थी पत्नी की चरित्र परीक्षा
और फिर भी छोड़ दी गई
गर्भवती सीता
अकेली वन प्रांतर में .
या तब ,जब
द्रोण ने दक्षिणा में कटवा दिया था
आदिवासी एकलव्य का अंगूठा .
जुएं में दांव पर लगा दी गयी थी
पांच पांच पतियों की पत्नि द्रोपदी
और टुकर टुकर देखते रहे पितामह .
...............
या तब थे आप सहिष्णु ?
जब ब्रह्मा ने बनाये थे वर्ण
 रच डाली थी ऊँच नीच भरी सृष्टि.
या तब ,जब विषमता के जनक ने
लिखी थी विषैली मनुस्मृति .
जिसने औरत को सिर्फ
भोगने की वस्तु बना दिया था .
शूद्रों से छीन लिए गए थे
तमाम अधिकार .
रह गए थे उनके पास
महज़ कर्तव्य .
सेवा करना ही
उनका जीवनोद्देश्य
बन गया था .
और अछूत
धकेल दिये गए थे
गाँव के दख्खन टोलों में .
लटका दी गई थी
गले में हंडिया और पीठ पर झाड़ू
निकल सकते थे वे सिर्फ भरी दुपहरी .
ताकि उनकी छाया भी ना पड़े तुम पर .
इन्सान को अछूत बनाकर
उसकी छाया तक से परहेज़ !
नहीं थी असहिष्णुता ?
.................
आखिर आप कब थे सहिष्णु ?
परशुराम के क्षत्रिय संहार के समय
बौद्धों के कत्लेआम के वक़्त
या महाभारत युद्ध के दौरान .
लंका में आग लगाते हुए  
या खांडव वन जलाते हुये .
कुछ याद पड़ता है
आखिरी बार कब थे आप सहिष्णु ?
..............................
अछूतों के पृथक निर्वाचन का
हक छीनते हुए ,
मुल्क के बंटवारे के समय
दंगों के दौरान ,
पंजाब ,गुजरात ,कश्मीर ,पूर्वोत्तर ,
बाबरी ,दादरी ,कुम्हेर ,जहानाबाद
डांगावास और झज्जर
कहाँ पर थे आप सहिष्णु ?
सोनी सोरी के गुप्तांगों में
 पत्थर ठूंसते हुए .
सलवा जुडूम ,ग्रीन हंट के नाम पर
आदिवासियों को मारते हुए .
लोगों की नदियाँ ,जंगल ,
खेत,खलिहान हडपते वक़्त .
आखिर कब थे आप सहिष्णु ?
दाभोलकर ,पानसरे ,कलबुर्गी के
क़त्ल के वक़्त .
प्रतिरोध के हर स्वर को
 पाकिस्तान भेजते वक़्त
फेसबुक ,ट्वीटर ,व्हाट्सएप
किस जगह पर थे आप सहिष्णु ?
......
प्राचीन युग में ,
गुलाम भारत में
आजाद मुल्क में
बीते कल और आज तक भी
कभी नहीं थे आप कतई सहिष्णु .
सहिष्णु हो ही नहीं सकते है आप
क्योंकि आपकी संस्कृति ,साहित्य ,कला
धर्म ,मंदिर ,रसोई ,खेत ,गाँव ,घर .
कहीं भी नहीं दिखाई पड़ती है सहिष्णुता
सच्चाई तो यह है कि आपके
 डीएनए में ही नहीं
सहिष्णुता युगों युगों से ......
-    भंवर मेघवंशी
( स्वतंत्र पत्रकार )

Tuesday, November 24, 2015

योनिज तो हम सभी है ...

योनिज तो हम सभी है..!
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योनि के जाये तो हम सभी है,
पवित्रता ,अपवित्रता ..
यह तो हम पुरूषों की
 अप्राकृतिक बकवास है |

 सच तो यही है कि
हम सभी पिता के  लिंग
और माहवारी से निवृत मां की योनि
के सुखद मिलन की
सौगात है |

मां के रक्त ,मांस ,मज्जा में
नवमासी विश्रांति के बाद
उसी योनि के रास्ते आये है हम
वही माहमारी के वक्त सा रक्त
जिससे लथपथ थे हम
जी हां ,
बिल्कुल वैसी ही गंधवाला रक्त
और उससे भीगी बिना कटी गर्भनाल
मां और हमारे बीच
उस समय यही बिखरी हुई थी.

दुनिया में गंध की  पहली अनुभूति
माहवारी के उसी खून की थी
फिर क्यों नफरत करें हम
अपनी मां ,पत्नि या बेटियों से
कि वे माहवारी में है ..
अचानक कैसे अपवित्र हो जाती है
औरतें ?
सबरीमाला और रणकपुर के मंदिरों में
निजामुद्दीन और काजी पिया की बारगाहों में !

क्यों बिठा दी जाती है
घर के एकांत अंधियारे कोनों में
माहवारी के दौरान..
योनि ने जना है हम सबको
योनिज है हम सभी
पवित्रता -अपवित्रता तो
महज शब्द है
औरत को अछूत बनाकर
अछूतों की भांति गुलाम बनाने के लिये..

मेरी मां नहीं बैठी थी कभी
माहवारी में एकांत कमरे में ,
वह उन दिनों में भी
खेत खोदती रही,
भेड़ चराती रही ,
खाना बनाती रही..
वैसे ही जैसे हर दिन बनाती थी.
ठीक उसी तरह मेरी पत्नी ने भी जिया
माहवारी में सामान्य जीवन
ऐसे ही जीती है हमारे गांव की
मेहनतकश हजारों लाखों
माएं ,पत्नियां और बेटियां
माहवारी ,पीरियड  ,रजस्वला होना
उन्हें नहीं बनाता है कभी अबला..

नहीं बैठती वे घर के घुप्प अंधेरे
उदास कोनों में..
नहीं स्वीकारती कभी भी
अछूत होना..
पवित्रता के पाखण्डी पैरोकारों को
यही जवाब है उनका..

सुना है कि माहवारी के उन दिनों में
सबरीमाला सहित सभी धर्म स्थलियां
आती है सलाम करने उनको ...


-भँवर मेघवंशी
( स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता )

Tuesday, November 10, 2015

मैं एक नकली अम्बेडकरवादी हूँ


                                 { आत्म-स्वीकारोक्ति }
                            मैं एक नकली अम्बेडकरवादी है !
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‘‘हिंदुत्व का छद्म चमचा, सवर्णों के तलुवे चाटने वाला तथा दलित बहुजन आंदोलन का गद्दार है, दलित विरोधी है तथा शेर की खाल में भेडि़या है।’’ आजकल सोशल मीडिया पर मैं इन्हीं अनंत विभूषणों से विभूषित हूं, क्योंकि मैंने सच को सच कहने का दुःसाहस कर दिया, एक जमीन की लड़ाई को प्रोपर्टी का संघर्ष कह दिया और दलित अत्याचार नहीं माना जिससे बाबा साहब के नाम पर दुकानें चला रहे दलितों के ठेकेदार खफा हो गए है तथा उन्होंने फतवा जारी कर दिया है कि-भँवर मेघवंशी एक नकली अंबेडकरवादी है।
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   यह अभियान इन दिनों दलित बहुजन आंदोलन के जिम्मेदार साथियों की जानिब से मेरी मुखालफत में भीलवाड़ा जिले में लांच किया गया है जो मुझे ‘दलित द्रोही’ सवर्ण हिंदुओं के तलवे चाटने वाला, गद्दार, दलितों के नाम पर दुकान चलाने वाला घोषित कर रहा है।
     पिछले दिनों के एक घटनाक्रम की वजह से मुझे ‘दलित विरोधी’ ही नहीं बल्कि ‘दलितों का घोर दुश्मन’ भी घोषित किया गया है, वह मेरे निवास अम्बेडकर भवन से 30 किलोमीटर दूर स्थित करेड़ा कस्बे में स्थित एक धर्मस्थल हरमंदिर की भूमि को लेकर हो रहा एक विवाद से जुड़ा हुआ है। हुआ यह कि करेड़ा में चारभुजानाथ व हरमंदिर की जमीनें जो कि 92 बीघा के करीब है, उन पर बरसों से खटीक, कलाल तथा वैश्य जाति के काश्तकार ‘खड़मदार’ के नाते खेती कर रहे थे तथा वे लगान मंदिर के पुजारी को जमा करवाते आ रहे थे, इनमें से कईयों को सामंतशाही के दौरान के राजा-महाराजाओं ने कुछ पट्टे आदि भी जारी कर रखे थे, मगर जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन के साथ ही इन सामंतों द्वारा जारी तमाम पट्टे शून्य हो गए तथा राजस्थान काश्तकारी अधिनियम के तहत तमाम भूमियों की मालिक राजस्थान सरकार हो गई, खातेदार मंदिर के पुजारी तथा खड़मदार के रूप में विभिन्न जातियों के लिए लोगों के नाम भी दर्ज कर दिये गए।
      बाद के घटनाक्रम में सन् 1991 में भैरोंसिंह शेखावत के मुख्यमंत्रित्व काल में राजस्थान सरकार ने पुजारियों द्वारा मंदिर माफी की जमीनों को खुर्दबुर्द किए जाने की व्यापक शिकायतों के मद्देनजर एक परिपत्र जारी कर मंदिर माफी की जमीनों को पुजारियों तथा खड़मदारों के बजाय मंदिर मूर्तियों के नाम दर्ज करने के आदेश जारी कर दिए, फलस्वरूप 1992 में करेड़ा में चारभुजानाथ तथा हरमंदिर की भूमियों पर बरसों से काबिज तमाम खड़मदारों  के नाम विलोपित किए जाकर उक्त भूमि का स्वामित्व मंदिर मूर्तियों को दे दिया गया तथा उनके बेचान पर, खुर्द बुर्द करने, रेहन रखने या बटाई अथवा खड़मदारी पर देने पर भी रोक लगा दी गई, इस तरह सभी खड़मदार काश्तकारों का मालिकाना हक स्वतः ही राजस्व रिकोर्ड में समाप्त हो गया।इस बारे में विगत 22 सालों से कोई हलचल नहीं हुई, विभिन्न जाति के पूर्व खड़मदार देवस्थान की जमीनों पर ही काबिज रहे और उक्त जमीन का उपयोग उपभोग करते रहे।
   हाल ही में चम्पाबाग तथा हनुमान बाग के महंत सरजूदास महाराज के महंताई समारोह के पश्चात् उन्होंने सभी जमीनों को कब्जे में लेने की कार्यवाही प्रारंभ की तथा काबिज काश्तकारों व ग्रामीणों के सहयोग से हरमंदिर की 15 बीघा जमीन को भी अतिक्रमण मुक्त करवा कर तारबंदी कर दी गई। इस पूरी कार्यवाही में करेड़ा के खटीक समाज तथा कलाल समाज व अन्य समुदाय के लोगों ने स्वैच्छा से अपने कब्जे खुद ही हटाए तथा सार्वजनिक रूप से यह उद्घोषणा भी की कि अगर महंत सरजूदास महाराज इस खाली करवाई गई जमीन पर सार्वजनिक हित के लिए चिकित्सालय बनाते है तो वे तन, मन, धन से पूरा सहयोग करेंगे।शुरू शुरू में तो सब कुछ सामान्य था पर अचानक स्थितियां बदलने लगी तथा स्वयं कब्जा हटाने वाले सामान्य तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के कुछ लोगों ने दलित जाति के काश्तकारों के कंधों पर बंदूक रखकर इस लड़ाई को ‘दलित उत्पीड़न’ का रंग देने की कोशिश शुरू कर दी।
    मैं इस घटनाक्रम से अपरिचित ही रहता अगर 20 सितंबर 2015 को ग्रामीणों व खटीक समुदाय के लोगों के मध्य प्रशासन की मौजूदगी में ‘हिंसक झड़प’ के समाचार सोशल मीडिया में नहीं देखता, करेड़ा के दलित व सवर्ण सभी समुदाय के लोग आपसी समन्वय से सभी चीजें कर रहे थे, तब तक मुझ जैसे ‘दलितों के नाम पर दुकान चलाने वाले’ व्यक्ति तक कोई समाचार ही नहीं आ रहे थे। आज जो दलित अत्याचार के बड़े-बड़े आरोप लगाकर पीडि़त बने घूम रहे है, वे महाशय भी अपनी जमीनें स्वैच्छा से खाली करके महंत सरजूदास महाराज के शिष्य बालकदास को नासिक के कुंभ में घुमा रहे थे, तब तक मुझसे किसी ने कोई सम्पर्क नहीं किया, सब अच्छा ही चल रहा था। सैंकड़ों लोगों के सामने उन्होंने स्वैच्छा से अपने कब्जे वाली मंदिर की जमीन खाली करने के स्टांप तक दिए, फिर अचानक ही उन्हें अहसास हुआ कि महंत हम पर अत्याचार कर रहे है और हमारी पैतृक जमीन हमसे छीन रहे है।
   एक और तथ्य ध्यान में लाने की बात है कि उक्त अतिक्रमण मुक्त करवाई गई जमीन के तीन बिस्वा हिस्से पर कुछ दलितों व कुछ अन्य समाजों के मकान व दुकानें बनी हुई है, जिन्हें खाली करवाने या तोड़ने के बारे में मंहत सरजूदास महाराज ने कभी कोई इच्छा नहीं दर्शाई, मगर इसी दौरान 20 सितम्बर की हिंसक झड़प हो गई। इससे पहले 10 कलाल तथा 27 खटीक काश्तकारों ने अपने कब्जे रही जमीन के सम्बन्ध में एसडीएम कोर्ट मांडल में एक वाद दायर करके कानूनी लड़ाई भी प्रारंभ कर दी जो अभी विचाराधीन है। मगर शायद कोर्ट के मार्फत उन्हें राहत मिलने की संभावना कम लगी तो इस मामले को अलग रंग देने तथा इसे ‘दलित उत्पीड़न’ बताकर राजनीतिक समर्थन जुटाने की कवायद शुरू कर दी। 20 सितम्बर को एक मूर्तिकार द्वारा खाली किए भूखण्ड पर कब्जा करने की कोशिश शुरू हुई, इसका प्रतिरोध महंत सरजूदास के दो साधुओं व दो ग्रामीणों द्वारा किया गया, प्रतिक्रिया में दलित स्त्रियों द्वारा किये गए पथराव में चार लोग घायल हो गए, जिससे मामला अत्यंत संगीन हो गया और विरोधस्वरूप लोग एकजुट होने लगे।
 इस हादसे के बाद उसी दिन करेड़ा थाने में 53 लोगों के विरुद्ध अजा जजा (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराने हेतु अर्जी दी गई जिसमें घटना का कवरेज करने गए तीन पत्रकारों, एक वकील तथा गांव के ऐसे लोग जो गाँव में उस दिन मौजूद ही नहीं थे, ऐसे दर्जनों लोगों के नाम भी शामिल कर दिए गए, यहां तक कि एक दलित जनप्रतिनिधि को भी इसमें आरोपी बनाया गया। इस प्रकार के मनगढ़ंत आरोपों ने आग में घी डालने का काम किया. पूरा गांव उबल पड़ा और आस-पास के गांवों से सवर्ण युवाओं के एकजुट होकर प्रतिक्रिया करने के समाचार मिलने लगे.
   दलितों के विरुद्ध हिंसा की संभावना बनते देखकर मैंने इस मामले में दखल करने का मानस बनाया और मैं घटना के एक दिन बाद 21 सितंबर को करेड़ा पहुंचा, विभिन्न लोगों से मिला तो मुझे पता चला कि करेड़ा के आम नागरिकों से लेकर प्रशासन तक में यह बात किसी सुनियोजित षड्यंत्र के तहत पहुंचाई गई कि ‘दलित उत्पीड़न’ का यह झूठा मामला बनवाने तथा दलित पक्ष को उकसाने में मैं प्रमुख भूमिका निभा रहा हूं तथा दलितों को भड़काने तथा गांव के निर्दोष लोगों को फंसाने के काम में अग्रणी भूमिका में हूं।मेरे लिए अपनी भूमिका का स्पष्टीकरण देना इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि इस मामले से आक्रोशित सवर्ण हिंदू जातियों की संभावित प्रतिक्रिया काफी खतरनाक रूप ले सकती थी और जहां पर धर्म, आस्था का सवाल हो तो भीड़ बिना सोचे विचारे उन्मादी होकर कुछ भी कर सकती है, मैंने तय किया कि मैं इस मामले में एक सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करूं ताकि दलितों पर किसी भी संभावित खतरे को टाला जा सके।
  मैंने करेड़ा के रेगर, खटीक, जीनगर, सालवी, सरगरा तथा वाल्मीकि जैसी दलित समुदाय की जातियों के मोतबीरों से मुलाकात की तथा उनसे फीडबैक लिया कि क्या उनके साथ महंत सरजूदास तथा ग्रामीणों की ओर से कोई भेदभाव किया जा रहा है? क्या वहां हो रहे धार्मिक आयोजन में किसी प्रकार की छुआछूत या उत्पीड़न अथवा रोकटोक की जा रही है? मुझे यह जानकर तसल्ली मिली कि हनुमान बाग स्थित हरमंदिर की जमीन पर चल रहे आयोजन इत्यादि में सभी जातियों के लोग अपनी सहभागिता निभा रहे है तथा महंत सरजूदास का रवैया दलितों के प्रति समानतापूर्ण व बंधुत्व का है। मुझे करेड़ा के दलित समाज तथा आस-पास के गांवों के दलित समाज के लोगों ने महंत सरजूदास महाराज की प्रशंसा के ही शब्द कहे तथा यह भी कहा कि इन संत की वजह से हम सब जाति समुदाय के लोग पहली बार एक साथ एक जाजम पर बैठ पाए है और गांव में सामाजिक समरसता व सौहार्द्र का माहौल बना है। जिसे अब कुछ वो लोग जिनका जमीन संबंधी स्वार्थ है, वे बिगाड़ना चाह रहे है और इसे जातिय संघर्ष में बदलने की कोशिश कर रहे है, जो कि अनुचित है।
 मैं महंत सरजूदास से मिलने उनके मचान पर पहुंचा तथा उन्हें अपनी इस चिंता से अवगत कराया कि कहीं आपके शिष्य, भक्त या समर्थक दलितों के प्रति किसी प्रकार की हिंसक प्रतिक्रिया नहीं कर दें .मैंने कहा कि जमीन के हक की लड़ाई अपनी जगह है मगर दलितों पर किसी प्रकार का अन्याय, अत्याचार नहीं होना चाहिए। महंतजी  ने इस बात का वचन दिया कि किसी भी व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं होने दिया जाएगा.साथ ही उन्होंने भी मुझसे भी यह सहयोग चाहा कि जिन ग्रामीणों के विरुद्ध एससी एसटी एक्ट में झूठा मुकदमा दर्ज करवाया गया है, उसकी भी निष्पक्ष जांच हो। कोई बेवजह नहीं फंसाया जाए। मैंने उन्हें तथा वहां मौजूद आक्रोशित हजारों ग्रामीणों जिसमें सैंकड़ों दलित भी मौजूद थे, के समक्ष माइक पर कहा कि-अजा जजा (अत्याचार निवारण) कानून का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा तथा जरूरत पड़ने पर जिले के आला अधिकारियों से मिलकर उन्हें भी झूठे फंसाने वाले मामलों में कार्यवाही नहीं करने का आग्रह किया जाएगा।
  यह करके मैं उस रात घर लौट गया, लोग भी शांत होकर अपने-अपने घरों को लौट गए, अगर मैं हल्की सी भी चूक करता या भड़काने वाली भाषा का इस्तेमाल करता तो वहां पर जातीय संघर्ष तय था, मगर वक्त की नजाकत को देखते हुए मैंने हिंसक टकराव को टालने की पूरी कोशिश की तथा क्या मैंने गलत काम किया ? मुझे दलितों की सुरक्षा के प्रति चिंतित नहीं होना चाहिए ? दूसरे दिन 22 सितम्बर 2015 को करेड़ा से तकरीबन 200 लोग जिसमें दलित समुदाय के भी 50-60 लोग शामिल थे, वे भीलवाड़ा जिला मुख्यालय पहुंचे तथा उन्होंने करेड़ा में चल रहे घटनाक्रम की निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच की मांग की, मैं भी अपने पूर्व वादे के मुताबिक उनके साथ प्रशासन व मीडिया से मिला तथा मैंने जिले के आला अधिकारीयों से आग्रह किया कि -‘यह जमीन के अधिकार का विवाद है, इसे दलित उत्पीड़न बताना एक दुखद कदम है , इससे क्षेत्र की शांति भंग हो सकती है और भाईचारा खत्म होने से होने वाले जातीय संघर्ष से सर्वाधिक नुकसान दलितों का होने की सम्भावना है ।’
  मैं जिला प्रशासन से मिल कर अपने घर लौट गया तथा करेड़ा का जनजीवन पटरी पर आने लगा, लोगों का गुस्सा भी शांत होने लगा, मेरी भूमिका किसी भी तरह से हिंसक टकराव से दलितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की थी, मैं अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए अपने लोगों को किसी भी प्रकार के  हिंसक संघर्ष में धकेलने के पक्ष में नही आज था .मुझे खुशी है कि मेरे साथ खड़े होने से सवर्ण हिंदुओं का गुस्सा काफी कुछ कम हुआ। मगर ‘दलितों के ठेकेदार’ इस  समन्वयन, सौहार्द्र, भाईचारे और मोहब्बत को कैसे बर्दाश्त कर सकते थे ? उन्होंने आनन-फानन में सोशल मीडिया पर क्रांतिकारी लेखन चालू कर दिया.
एक हिन्दू धर्म छोड़ चुके एक सज्जन ने मुझे लिखा कि- ‘‘मैं ‘ढोंगी महाराज’ के जरिए हिंदू धर्म को बढ़ावा दे रहा हूं तथा दलितों को ‘सीताराम सीताराम’ कहने के लिए मजबूर कर रहा हूं।’’ मैंने उनसे पूछा कि- आप ईमानदारी से बताएं कि क्या मैं वाकई ऐसा कर रहा हूँ और क्या करेड़ा के दलितों पर कोई जातिगत अत्याचार हो रहा है अथवा यह महज जमीन सम्बन्धी विवाद है ? वे कोई तथ्यात्मक जवाब देने के बजाय मेरी निष्ठाओं पर सवाल उठाने लगे तथा कहने लगे कि मैं दलित समाज के खिलाफ हूं, सवर्णों के हाथों बिका हुआ हूं, हिंदुत्व को बढ़ावा दे रहा हूं। मैंने यथासंभव उनके प्रश्नों का जवाब दिया, मगर वे यह मन बना चुके थे कि मैं इस मसले से दलित विरोधी हो चुका हूं, उनका तो यहाँ तक कहना था कि अगर दलित गलत भी हो तब भी मुझे दलितों के ही पक्ष में बोलना चाहिए क्योंकि मेरा काम है दलितों की आवाज़ बुलंद करना ना कि सवर्णों के प्रति सहानुभूति रखना .उन्होंने कहा कि –“ दलित कभी भी गलत नहीं हो सकता है। अगर मैं इस मसले में उनके साथ नहीं खड़ा होता हूं तो वे दलित अधिकारों के लिए नेटवर्क चलाने वाले एनजीओ के साथ मिलकर मेरा राष्ट्रव्यापी पर्दाफाश कर देंगे तथा मुझे झूठा, फर्जी व नकली अंबेडकरवादी घोषित करवा कर मेरी दलित दुकान पर ताला लगवा देंगे।’’
  मैंने उनसे कहा कि वे जो भी उचित समझे, करने को स्वतंत्र है। मुझे जो भी उचित लगा वह मैंने किया है तथा आगे भी करूंगा। मेरे लिए दलित प्रश्न जीवन मरण का प्रश्न है, मैं आम गरीब दलित के हक में खड़ा हूं, ना कि करोड़ों रुपए की फण्डिंग लेकर दलितों के नाम पर कारोबार चलाने वालों अथवा ढाई किलो सोने की झंझीरों का गले व हाथों में लटका कर वैभव का भौंडा प्रदर्शन करने वाले अवास्तविक दलितों का पक्षधर ! मेरे सरोकार सदैव ही स्पष्ट थे और आज भी है। मैंने उन महाशय को कहा कि आपको लोगों को यह भी बताना चाहिए कि करेड़ा में मंदिर माफी की जमीन से सिर्फ दलित ही नहीं हटाए गए है बल्कि अन्य जाति समुदाय के लोग भी हटे है,सब लोग स्वैच्छा से हटे है, यह किसी प्रकार की जोर-जबरदस्ती या अन्याय -अत्याचार का मामला कतई नहीं था, आज की तारीख में जमीन का स्वामित्व व कब्जा हरमंदिर के पास है तथा एक कानूनी लड़ाई के जरिए जीत कर इसको वापस पाया जा सकता है। मेरा उन्हें सुझाव था कि किसी भी प्रकार का सड़क का संघर्ष इन दलितों को कुछ भी राहत नहीं देगा . हा यह नाटकबाजी कुछ सामाजिक कारोबारियों का प्रोजेक्ट पूरा कर सकती है तो कुछ मृतप्रायः विफल राजनेताओं को राजनीतिक संजीवनी भी दे सकती है मगर करेड़ा के दलितों को राहत नहीं दिला सकती है .मेरी इस तरह की बात उन्हें पसंद नहीं आई ,उन्होंने मुझे अम्बेडकरवाद से बाहर निकालने की कवायद प्रारम्भ कर दी .फेसबुक ,व्हाट्स एप ,ट्वीटर आदि सोशल मीडिया पर उन्माद फैलाया जाने  लगा था और देखते ही देखते मुझे ‘दलित विरोधी’ व ‘सवर्णों के तलुवे चाटने वाला’ घोषित करने की होड़ सी मच गई।
   मित्रों, मुझे इन आलोचनाओं और असहमति के स्वरों से कतई दुख नहीं है, मैं इनका स्वागत करता हूं, मैं किसी भी अविवेकी उन्मादी भीड़ का हिस्सा होने से इंकार करता हूं, मैंने कभी स्वयं को महान अंबेडकरवादी घोषित नहीं किया, मैं  बहुत अच्छी तरह से यह जानता हूं कि मैं अंबेडकर की बताई राह का पथिक मात्र हूं, मुझमें असली अंबेडकरवादी होने के गुण अभी मौजूद नहीं है, मैं बाबा साहब की 22 प्रतिज्ञाओं का पालन नहीं कर रहा हूं, मैं अंबेडकर का अध्येयता हूं, उनका प्रशंसक और समर्थक हूं, मगर मैं असली अंबेडकरवादी नहीं हूं। आज भी मैं सैंकड़ों ऐसे काम करता हूं जो एक सच्चे अंबेडकरवादी को नहीं करने चाहिए। मेरा पूरा परिवार हिंदू रीति-नीति से जीवन जीता है, कई प्रकार के देवी-देवताओं की तस्वीरें मेरे तथा मेरे रिश्तेदारों के घरों की शोभा बढ़ा रही है। प्रतिवर्ष मैं दर्जनों रामरसोड़ों के उद्घाटन व समापन में हिस्सा लेता हूं, अब तक हजारों सत्संगों में शिरकत कर चुका हूं, जिसमें अलखनामी, वेदान्ती, रामस्नेही तथा कबीरपंथी संतों की उपस्थिति रहती है। मैं सूफी संतों से प्यार करता हूं, अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती से लेकर दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया व करेड़ा के सैलानी सरकार तक के उर्सों में सक्रिय भागीदार रहा हूं, जैन मुनियों, रागियों, ग्रंथियों, भिक्खुओं, तिब्बती लामाओं, रेव्रेण्डस, पास्टर्स, फ़ादर ,ओझा, गुणी, भोपा, तांत्रिक, मांत्रिक, सिद्ध आदि ना जाने कौन-कौन लोग अब तक की जीवन यात्रा में मिल चुके है, सबसे मैंने कुछ ना कुछ सीखा ही है।मैं वैचारिक कट्टरपंथ का भी कभी आग्रही नहीं रहा, मार्क्सवाद, बुद्धिज्म, गांधी विचार, अम्बेडकर, फुले, पेरियार तथा कांशीराम, जेपी और राममनोहर लोहिया जैसे तमाम सारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक विचारों व देशनाओं को करीब से जानने-समझने की कोशिश करते रहा हूं।विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक संगठनों से मेरा लंबा जुड़ाव रहा है। पेशे से पत्रकार और आदत से एक्टिविस्ट हूं, जिंदगी को पूरे अल्हड़पन, मस्ती, आनंद तथा खुलेपन से जीने में यकीन करता हूं।विगत दो दशक से जो भी देखा, जाना, सोचा व समझा, उसके बारे में किसी की नाराजगी या खुशी की परवाह किए बगैर अपने विचार व्यक्त करते आया हूं, कभी भीड़ की परवाह नहीं की, लोकप्रियता, गालियों व गोलियों की तरफ ध्यान नहीं दिया, मानवतावाद, समतावाद, प्रगतिशीलता के साम्यवादी व मुक्तिकामी मूल्यों का गुणगाहक रहा हूं।
   रही बात मुझ पर ढोंगी बाबाओं, हिंदुत्व को बढ़ावा देने के आरोपों की तथा दलितों के विरुद्ध काम करने के की तो इन बातों का जवाब वक्त देगा, लोग देंगे और दस्तावेज देंगे। मुझे इस बारे में बहुत कुछ नहीं कहना है, यह सही है कि मैं आज भी दलित हिंदुओं की एक बड़ी आबादी के मध्य कार्यरत हूं, मेरा विश्वास धर्म परिवर्तन के जरिए सामाजिक बदलाव में नहीं है, क्यूंकि मुझे किसी भी धर्म में मुक्ति का रास्ता नहीं दिखता। मैं मंदिर प्रवेश, यज्ञों में भागीदारी, बेवाण निकालने जैसे तरीकों में दलितों की आजादी के प्रयत्नों की विफलता से वाकिफ हूं, मैं  जमीन के झगड़ों की व्यक्तिगत लडाई और दलितों के स्वाभिमान, हको हकूक की रक्षा के सामूहिक जनआंदोलन के मध्य के फर्क को बहुत अच्छी तरह समझ सकता हूं। मैंने कभी भी 24 कैरेट शुद्ध अंबेडकरवादी होने का दावा नहीं किया .कई बार मुझे लगता है कि मेरे विचार भले ही अंबेडकरवादी हो मगर व्यवहार में तो मैं सिर्फ एक नकली अंबेडकरवादी हूं, आज भी मैं बाबा रामदेव के मंदिरों में जाता हूं, सूफी संगीत सुनता हूं, कबीर सत्संगों में तिलक लगवाता हूं, हिंदू पर्व-त्यौहारों को अपने परिवार के साथ मिलकर आराम और उल्लास से मनाता हूं, हाल ही में मेरी बहनों ने मेरी कलाई पर राखी का धागा बांधा था, दीवाली पर मेरे घर आंगन में दीप जलते है, गांव में मेरे घर के पास होलिका दहन होता है, गुरू पूर्णिमा के उत्सवों में मैं शिरकत करता हूँ .दलित समुदाय की विभिन्न  जाति समाज के मंदिरों पर आयोजित सभाओं में शामिल होता रहता हूं, अपने मुस्लिम दोस्तों को ईद की मुबारकबाद देता हूं तो ईसाईयों को  हैप्पी एक्समस कहता हूं, बुद्ध जयंती, महावीर जयंती, नानक, कबीर, रैदास की जयंती पर बधाई व शुभकामना के संदेश भेजता हूं, कुलमिलाकर मैं वह सब करता हूं जो एक आम सक्रिय सेकुलर उदारवादी भारतीय नागरिक करता है, इसलिए भी मैं  संभवतः असली अंबेडकरवादी होने का दावा करने में सक्षम नहीं हूं, आगे भी मेरा चरित्र कमोबेश यही रहने वाला है, इसलिए मैं भीलवाड़ा व राजस्थान के कुछ असली अम्बेडकरवादियों से क्षमा प्रार्थी हूं कि मैं उनके जैसा शुद्ध व परम पवित्र टंच अंबेडकराईट नहीं बन पाया हूं।
 रही बात मुझ पर हिंदुत्व को बढ़ावा देने और सवर्ण हिंदुओं के तलवे चाटने का आरोप लगाने के लिए बुलाई गई समाज विशेष की मीटिंग की तो इस मीटिंग के विरोधाभासी चरित्र पर भी ध्यान देना जरुरी है ,जैसे कि मुझे सवर्ण हिन्दुओं का चमचा बताने के लिए आयोजित यह मीटिंग ही एक प्रसिद्ध हिंदू धर्म स्थल जगदीश मंदिर पर बुलाई गई, जहाँ सारे दलित क्रांतिवीर ‘जगदीश भगवान’ के मंदिर में इकट्ठा हुए, तस्वीरें देखने पर पता चलता है कि उनके सिर पर ‘ऊँ’ लिखा हुआ था, ईर्द-गिर्द ‘जय जगदीश’, ‘जय विश्वकर्मा’ तथा ‘जयश्रीराम’ लिखा साफ दिखता है, इनके नेता सार्वजनिक रूप से बण्डी-बनियान धारण करते है तथा गरीब दलितों का रोना रोने के लिए ढाई किलो सोने की जंजीरें गले में लटका कर आवारा पूंजी का भौंडा प्रदर्शन करते है। अवैध शराब, अवैध गैस, अवैध ठेके, अवैध भूमि माफिया के काम करने वाले, ब्लैकमेलिंग के जरिए पैसा ऐंठने वाले, आरटीआई का दुरुपयोग करने वाले, विदेशी पूंजी लेकर भारतीय समाज में दरारों को और चौड़ा करने वाले साम्राज्यवाद के ट्रोजन होर्सी एनजीओ वादी और चूक चुके राजनीतिक दलों के विफल राजनेता तक शामिल है। ऐसे लोग इनके रहनुमा है जो अपनी पत्नी को उत्पीडि़त करने के आरोपी रहे है अथवा अपने ही स्टाफ की महिलाओं के यौन उत्पीड़न के घृणित भागीदार रहे है, इनके कुकृत्यों की काफी फेहरिस्त लंबी है, मगर फिर भी ये सभी सच्चे अंबेडकरवादी है, दलितों के देवता है, गरीबों के रहनुमा है, इन्हें इसी काम के लिए देश-विदेश से पैसा मिल रहा है, ये धार्मिक व जातीय घृणा के सौदागर अब सड़कों पर ज्ञापन, धरना, प्रदर्शन, सत्याग्रह तथा महापड़ाव डालने की घोषणा कर चुके है, इस क्षेत्र में बसने वाले लाखों दलितों की शांति, सुरक्षा व भाईचारे को पलीता लगाकर इन्हें अपनी-अपनी राजनीति, कारोबार अथवा प्रोजेक्ट चमकाने है, इन्हें अंबेडकर तथा दलित अधिकारों का टेंडर मिल चुका है, ये ठेकेदार है, इनके हाथ में दलितों का भविष्य है, इनमें लाख ऐब हो सकते है, ये गलत मुद्दे तथा अधूरी जानकारियों के जरिए देशभर के दलित बहुजन आंदोलन को गुमराह कर सकते है, क्योंकि ये स्वघोषित महान अंबेडकरवादी है, हालांकि इनमें से प्रत्येक को मैं व्यक्तिगत रूप से विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिरों में मूर्तियों के समक्ष साष्टांग दण्डवत करते देखते रहा हूं, इनके घरों की दीवारों पर उसी हिंदू धर्म के देवी-देवताओं की तस्वीरों व पोस्टरों की लाइनें लगी हुई है, जिनको ये पानी पी-पी कर कोस रहे है। मेरी बला से ये ढोंगी छद्म दलित नेता स्वयं को दलितों का स्वयंभू नेता घोषित करते रहे, अपने एनजीओ के प्रोजेक्ट चलाते रहे, अपने-अपने लैटरपेड चमकाते रहे, रात-दिन मुझे गालियां निकालते रहे.इससे मेरी सेहत ना अच्छी होती है और ना ही खराब होती है, ना ही मुझे कोई फर्क पड़ता है।
  मैं सदैव सच्चे, वास्तविक मुद्दों में पीडि़तों के साथ था, हूं और रहूंगा, मुझे ना वोट चाहिए, ना चंदा चाहिए और ना ही किसी प्रकार की दुकान या प्रोजेक्ट मुझे चलाना है, मैं अपनी जिंदगी अपनी शर्तों व अपनी आजादी के साथ जीता हूं, मुझे दलित नेता कहलाने का भी कोई शौक नहीं है, मुझे किसी प्रकार की नेतागिरी नहीं करनी है, जिसे करनी है वो करे, मैं मानवता, शांति, सहिष्णुता, भाईचारे, समानता तथा स्वतंत्रता जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों का पक्षधर हूं और रहूंगा, मुझे असली अंबेडकरवादी होने का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। नफरत फैलाने, अशांति पैदा करने तथा एक-दूसरे को लड़ाने की ओछी हरकतों को मैं सामाजिक चेतना कहना गवारा नहीं करता, मुझे विदेश और देश में बैठे किन्हीं आकाओं को अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं पेश करनी है, मेरी मर्जी होगी और मैं उचित समझूंगा उन मुद्दों में मैं भाग लूंगा,वर्ना नहीं . सब अपना काम करें तो अच्छा होगा, मेरी कोशिश है कि करेड़ा के दलितों को उनके हक बिना किसी जातीय संघर्ष के हासिल हो, इलाके का भाईचारा बरकरार रहे, जिसकी जो श्रद्धा है, उसके वो भजन करे, जो नास्तिक है, वे अपना काम करे। सबकी आजादी बनी रहे, लड़ाई-झगड़े नहीं हो, सब कुछ प्रेम और शांति से निपटे ताकि करेड़ा के सभी निवासी आगे भी मिल-जुल कर एक साथ रहे। ..और हाँ अगर मुझे दलित विरोधी, सवर्ण समर्थक, गद्दार, वर्गद्रोही कहने से अगर किसी का भला होता हो, किसी की रोजी-रोटी चलती हो तो मुझे ये गालियां भी आभूषण लगेगी। मेरी गुजारिश है कि मेरे खिलाफ गाली देने का अखण्ड कीर्तन कुछ और बर्ष जारी रखा जाए। मैं आभारी रहूंगा।
- भंवर मेघवंशी
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है,संपर्क - bhanwarmeghwanshi@gmail.com )