Monday, November 9, 2015

गायें फिर से पशु हो जाना चाहती हैं !
======================
NOV 05 , 2015, भंवर मेघवंशी
आउटलुक
“गाय को पवित्र कब से माना गया और क्यों माना गया, यह व्यापक विवाद और विमर्श का विषय है। इस बात पर भी भयंकर मतभेद है कि प्राचीन सभ्यताएं गोमांस को स्वीकृति देती थीं और भारत के आदिकालीन निवासी अपने खान-पान में उसे शामिल करते थे। आर्य ग्रंथों में आई उन बातों को भी अब कोई नहीं सुनता है कि किसी जमाने में गौमेध यज्ञ भी हुआ करते थे। अब जब गाय को पवित्र मान कर उसे मां का दर्जा दे ही दिया गया है और उसे आस्था की वस्तु बनाकर आलोचना से परे रख दिया गया है तो उस पर बहस की कोई गुंजाईश रही ही कहां है। अब तो ‘वन्दे धेनुमातरम‘ और ‘जय गोमाता‘ कहो, गोकथा कराओ, गोदूध महोत्सव मनाओ, गोशाला चलाओ, गोमंदिर बनाओ, गोकुल धाम निर्मित करो और गोअनुसंधान एवं गोरक्षा के नाम पर तरह-तरह के संगठन और सेनाएं बनाकर जमकर हंगामा मचाओ। आज गाय के नाम पर सब कुछ जायज है क्योंकि गाय हमारी माता है, गाय की रक्षा करना हमारा धर्म है, यह पुण्य का काम है। ”
.........................................
भाजपा शासित प्रदेश राजस्थान में प्रतिदिन सौ गायों के मरने की ख़बरें आ रही हैं, सरकार द्वारा संचालित हिंगोनिया गौशाला की 9 हजार गायें चारे के अभाव में दम तोड़ रही है, सैंकड़ों गायें कुपोषित हैं और वहां भयंकर अव्यवस्था का आलम है। मिल रही जानकारियों के मुताबिक राज्य भर की हजारों गोशालाएं अनुदान के अभाव में इस अकाल के वक्त में मुश्किलों का सामना कर रही हैं। राज्य के गोशाला संचालक मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से बेहद खफा हैं। उन्हें लगता है कि जब से उनकी सरकार बनी है, राज्य का गोसेवा निदेशालय उपेक्षा का शिकार हो गया है। कुछ समय पहले राज्य की सबसे बड़ी पथमेड़ा गोशाला के संस्थापक स्वामी दत्तशरणानंद ने मुख्यमंत्री की गायों के प्रति निष्ठुरता से नाराजगी जाहिर की थी। गोसेवकों का कहना है कि भाजपा की वर्तमान सरकार से तो अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार ही अच्छी थी, जिन्होंने अपने कार्यकाल में गोसेवा निदेशालय बनाया और 300 करोड़ का अनुदान प्रदेश भर की गोशालाओं को दिया था।
एक ओर गायों के प्रति भाजपा सरकार का यह रवैया है और दूसरी ओर भाजपा तथा संघ से जुड़े संगठन गोरक्षा को बहुत बड़ा मुद्दा बनाए हुए हैं। गाय के नाम पर विज्ञापन दे कर वोट मांगे जा रहें है। गोमांस को लेकर विभिन्न राज्यों में अब तक पांच लोगों की हत्या हो चुकी है। इन हत्याओं की शुरुआत राजस्थान के नागौर जिले से मई में हुई थी, जहां पर दलितों के सामूहिक नरसंहार से ध्यान हटाने के लिए गोहत्या का मामला उठाया गया था और कई जगहों पर बंद का आह्वान किया गया था। इसी बंद के दौरान डीडवाना के गफूर मियां को उग्र भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला था। यह बिल्कुल उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की हत्या की तरह ही भीड़ का हमला था। अखलाक को भी उन्मत्त भीड़ ने गोमांस खाने के शक में मार डाला। इसी तरह जम्मू के एक ड्राइवर, मणिपुर के एक मदरसा टीचर और हिमाचल के एक मुस्लिम नौजवान को गोहत्या के शक के चलते अपनी जान गंवानी पड़ी। गोरक्षा के नाम पर इंसानों का मारा जाना निरंतर जारी है। वर्ष 2003 में हरियाणा के जिला झज्जर के दुलीना गांव के पांच दलितों को गाय हत्या के भ्रम में जिंदा जला दिया गया था। तब विश्व हिन्दू परिषद् के नेता गिरिराज किशोर ने इस दलित संहार को यह कह कर जायज ठहराया था कि उनके लिए दलितों की तुलना में गाय अधिक महत्वपूर्ण है। एक पूरी विचारधारा है जो यह मानती है कि इन्सान की अपेक्षा गाय अधिक पवित्र है। उसमें तैंतीस कोटि देवताओं का निवास है, उसकी हर चीज पवित्र है, उसका गोबर, उसका दूध, उसका मूत्र और मुंह से जुगाली के दौरान निकलने वाले झाग, सब कुछ पवित्र है, जबकि इन्सानों में ये खूबियां नहीं हैं। इसलिए इन्सान  भले ही मर जाए मगर गाय को बचाया जाना चाहिए। चाहे गाय को बचाने के लिए किसी भी इन्सान की जान ही क्यों ना लेनी पड़े, ले ली जाए, पर गाय को बचाया जाए।
ऐसे माहौल में अगर किसी ने अपनी चेतना का इस्तेमाल किया, कोई सवाल खड़े किए, प्राचीन ग्रंथों को उधृत किया या गोमांस भक्षण के पक्ष में बोलने का कृत्य किया तो उसका सिर कलम किया जा सकता है, जैसा कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरामैय्या के बीफ खाने के बयान पर भाजपा नेता चेंबस्प्पा द्वारा दिया गया फतवा कहता है और देश भर में हो रही हत्याएं साबित कर रही हैं। संदेश साफ है कि जिंदा बचना है तो गाय के खिलाफ कुछ मत बोलो।
पिछले दिनों मुझे अपने शहर के कुछ मुस्लिम युवाओं ने कहा कि अब हम घर से निकलते है तो यह दुआ करते हैं कि हमारी गाड़ी से किसी गाय का एक्सीडेंट ना हो जाए, भले ही इन्सान को चोट आ जाए, हम बच सकते हैं, मगर गाय को लगी चोट हमारी जान ले सकती है।
हाल ही में राजस्थान के भीलवाड़ा शहर की व्यस्ततम सड़क पर एक गाय मरी हुई पाई गई। खबर लगते ही सैंकड़ों की तादाद में गोभक्त इकट्ठा हो गए और रास्ता जाम कर दिया गया। जाम खुलवाने के लिए पुलिस को दो बार लाठीचार्ज करना पड़ा। अंततः मरी गाय का पोस्टमार्टम किया गया,  जिसमें पता चला कि गाय भूख से मर गई थी। वह कई दिनों से भूखी थी। कैसी विडम्बना है कि यह सुनकर सारे गोभक्त चुपचाप वहां से खिसक लिए। सबको पता है कि आज अधिकांश शहरों की सडकों पर गायें आवारा घूमती हैं। उन्हें कोई चारा पानी देने वाला तक नहीं है, अलबत्ता जिन दुकानों के काउंटर पर गोसेवा की दान-पेटियां रखी रहती हैं और उस पर एक सुंदर सी स्वस्थ गाय की छोटी सी मूर्ति लगी रहती है, अपना ही फोटो देख कर कोई गाय गलती से भी अपने इस भक्त के पास चली जाए तो भक्त का डंडा गोमाता की पीठ लाल कर देता है।
गाय के नाम पर रात दिन चिल्लपों मचाने वालों को गाय की चिंता नहीं है, उन्हें गाय के नाम पर राजनीति करनी है, गाय पालनी नहीं है। घुमन्तु समुदायों के बीच कार्यरत युवा सामाजिक कार्यकर्ता पारस बंजारा कहते हैं कि गाय के नाम पर हंगामा करनेवाले लोगों के घरों में जा कर देखा जाए तो वहां कुत्ते मिलेंगे, वे कुत्ते पालते हैं, गायें नहीं। पर जब बात आती है तो घुमन्तु लोगों पर गो-तस्करी के आरोप लगाए जाते हैं। राजनीतिक कार्यकर्ता लोकेश शर्मा का कहना है कि बीफ बीफ चिल्लाने वाले अब कहां हैं। मरी हुई गायों पर तो देश भर में हल्ला मचाते हैं, मगर यहां जयपुर में जिंदा गायें भूख से मर रही हैं, तब उनकी परवाह किसी भी गोभक्त को क्यों नहीं है?
वाकई देखा जाए तो आज सबसे ज्यादा दुर्दशा देशी गाय की है। जब से गोसंरक्षण का कानून बना है, तब से उसकी कोई पूछ नहीं बची है। आज किसी भी पशु मेले में गाय का कोई खरीददार नहीं मिलता। यहं तक कि पशु व्यापारी अब बैलों की खरीद फरोख्त से भी बचते हैं, भले ही वे कृषि प्रयोजन के लिए बैल या गाय खरीदते हैं पर उन पर गो तस्करी व गोहत्या के आरोप लगाए जाते हैं। इसलिए उन्होंने गोवंश को खरीदना अब छोड़ ही दिया है। इस तरह गाय हमारी पशु श्रृंखला का सबसे अवांछित प्राणी बन गई है।
राजस्थान ही नहीं बल्कि उत्तर भारत के कई राज्यों के लाखों गांवों में गायें इधर-उधर मारी-मारी फिरती हैं। किसी भी गांव में जाने पर वहां दो-तीन सौ सूनी गायें घूमती मिल जाएंगी, जिसके चलते आज किसान खेती नहीं कर पा रहा है। अब गांव का किसान देशी गाय से भी उतना ही दुखी है, जितना वह फसल चौपट करने वाली नील गाय से दुखी रहा है। उसके लिए गाय वरदान नहीं अभिशाप बनती जा रही है। ये वही किसान है जो गाय की पूजा तो नहीं करता है मगर खूब देखभाल करता था और जिसके लिए गाय सिर्फ पशु नहीं बल्कि उसके परिवार का एक सदस्य हुआ करती थी, जो उसकी अर्थव्यवस्था का आधार थी। आज गाय उसकी आर्थिक रूप से कमर तोड़ने का साधन बन रही है। गाय के बछड़ों को तीन वर्ष का होने तक पालना किसी भी कृषक के बूते की बात नहीं रही है। हो यह रहा है कि किसान रात के अंधेरे में दूध ना देने वाली गायों और उद्दंड बछड़ों को शहर में छोड़ आते हैं, जहां पर यह गोवंश व्यापारी की लाठियों से पिटते हैं तो कभी वाहनों की चपेट में आ कर काल कवलित होते हैं।
इन शहरी आवारा गायों से टकराने वाले वाहन चालकों का दर्द तो कोई जानता भी नहीं है, जिनके वाहन इन पशुओं से टकराते हैं उनके चालक अपनी हड्डी पसलियां तुड़वा बैठते हैं। गाय का इतना अनादर हजारों साल की मानव सभ्यता में आज जैसा पहले कभी नहीं हुआ। आज हालात इतने विकट हैं कि जो किसान गाय पालता है, वह उससे पिंड छुड़ाना चाहता है और जो लोग गाय पालते नहीं बल्कि पूजते हैं, वे गाय के आधार पर सम्पूर्ण राजनीति, समाज और देश को चलाना चाहते हैं। गाय अब शुद्ध राजनीतिक विमर्श है। वह वोट लेने के काम के लिए इस्तेमाल की जा रही है। बहुत पहले प्रसिद्द व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने एक गोभक्त से भेंट नामक आलेख लिखा था, जिसमें वह कहते हैं कि विश्व के तमाम देशों में गाय दूध देने के काम आती है मगर भारत दुनिया का एकमात्र देश है जिसमे वह दूध देने के नहीं बल्कि दंगा कराने के काम आती है।
बात कडवी जरुर है पर सत्य के बहुत पास है। आज गाय को धार्मिक आस्था का मुद्दा बना कर राजनीति की जा रही है। इस बात को आरएसएस के  पूर्व प्रचारक और पूर्व भाजपा के नेता के एन गोविंदाचार्य भी स्वीकारते हैं। वे 9 नवंबर से गोरक्षा के लिए राष्ट्रव्यापी आन्दोलन शुरू करने जा रहे थे, जिसे उन्होंने स्थगित करते हुए कहा है कि ‘मैं गाय के मुद्दे के राजनीतिकरण से आहत हूं, गौरक्षा एक धार्मिक मुद्दा नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से इसे धार्मिक मुद्दा बनाया जा रहा है।‘ उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि गाय की हत्या के लिए  हिन्दू ही जिम्मेदार हैं क्योंकि गाय बुचड़खाने तक तभी पहुंचती है, जब किसान उसे बेचता है। इस प्रक्रिया में 80 % तो हिन्दू ही शामिल हैं। फिर हम मुसलमानों पर इलज़ाम क्यों लगा रहे है, जो गौ व्यापार की इस बेहद लंबी प्रक्रिया के आखिर में थोड़े से हैं।
सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष स्वामी आर्यवेश ने भी दादरी जैसी घटनाओं को दुखद बताते हुए गाय के नाम पर की जा रही राजनीति से असहमति जताई है। उनका कहना है कि गोमांस की अफवाहें फैलाकर किसी कि हत्या करना गौसंरक्षण नहीं है। विगत दिनों उदयपुर में सत्यार्थ प्रकाश महोत्सव में बोलते हुए उन्होंने यहां तक कह दिया कि बकरा, मुर्गा, मछली और तीतर-बटेर खा कर गोसंरक्षण की बात करने वाले सबसे बड़े पाखंडी हैं।
कई किसान नेता भी अब बोलने लगे हैं। उनका कहना है कि गोरक्षा का शिगूफा व्यापारियों का है, वे गोशालाओं के जरिये गायों पर राजनीति कर रहे हैं और किसानों की आर्थिक रूप से कमर तोड़ रहे हैं। यह व्यापारी तबका गाय के नाम पर बड़ा व्यापारिक साम्राज्य खड़ा कर रहा है। आज गोमूत्र अर्क से लेकर उसका गोबर तक बेचा जा रहा है। स्थिति यह है कि गोबर के उपले अब 40 रुपये प्रति उपले की दर पर ऑनलाइन बिक रहे हैं। किसान के पास एक अदद गाय थी, वह भी बाजार ने उससे छीन ली है। गाय को आज जी भर कर इस्तेमाल किया जा रहा है, राजनीति और मार्केट दोनों में ही।
अब सबसे बड़ा सवाल संघ परिवार और सत्तारूढ़ भाजपा की मंशा पर उठ रहा है। लोग कहने लगे हैं कि न तो संघ कार्यालयों में गाय पाली जाती है और न ही भाजपा कार्यालयों में। यहां तक कि संघ भाजपा के नामचीन नेताओं के घरों में गाय का नामोनिशान तक नहीं है। वे सिर्फ गाय के चित्र घरों में लगाते हैं। उनके दफ्तरों की चमचमाती टेबलों पर गोरक्षा के कैलेंडर जरूर दिखाई पड़ते हैं। और फिर जब-जब भी चुनाव का मौसम आता है उनके लिए गाय वोट देने वाली दुधारू गाय बन जाती है। जब भी लोग अपने हक अधिकार मांगने लगते हैं, सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने लगते हैं, गोहत्या के विरुद्ध आन्दोलन तेज हो जाता है। सच तो यह है कि बेचारी गाय खुद यह समझ पाने में असफल है कि यह मेरे नाम पर हो क्या रहा है? मुझे चारा-पानी देने के बजाय लोग मेरी पूजा क्यों कर रहे हैं और मुझे मां कहने वाले लोग मुझे डंडे से क्यों मार रहे हैं?
गायों की देश वासियों से अपील है कि वो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें, उन्हें उनकी इस इंसानियत की कोई जरूरत नहीं है और न ही उन्हें देवता बनना है। उन्हें अपना पूर्ववत पशुवत होना ही प्रिय है। उन्हें इन्सा‍नों से कोई लेना देना नहीं है, वे फिर से पशु हो जाना चाहती हैं।
( भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार हैं)
आऊटलुक से साभार

Saturday, November 7, 2015

डॉन को देश और दलितों का आदर्श मत बनाइये


...................................................................................
“ अपराध का रंग हरा है तो वह आतंकवाद और अगर गैरुआ है तो वह राष्ट्रवाद ,एक मुल्क के रूप में आखिर कहां जा रहे है हम ? “
..............................................................................................................................................................
अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन की इंडोनेशिया के बाली शहर में नाटकीय गिरफ्तारी तथा उसका आनन फानन में भारत लाया जाना किसी पूर्व निर्धारित पटकथा जैसा लगता है .संभव है कि यह कवायद काफी दिनों से की जा रही हो ,जिसे एक खुबसुरत मोड़ दे कर इस अंजाम तक पंहुचाया गया है . केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह इस बात से इत्तेफाक रखते है ,वे मानते है कि इस दिशा में काफी समय से काम चल रहा था .इसका मतलब यह हुआ कि छोटा राजन की गिरफ्तारी पूर्वनियोजित घटनाक्रम ही था .
वैसे तो यह माना जाता रहा है कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियां उसकी लम्बे वक़्त से मददगार रही है तथा उसे मोस्टवांटेड अंडरवर्ल्ड माफिया दाउद इब्राहीम के विरुद्ध एक तुरुप के पत्ते के रूप में संभाल कर रखे हुए थी मगर यह भी एक सम्भावना हो सकती है कि वर्तमान केंद्र सरकार में भी छोटा राजन के प्रति हमदर्दी रखनेवाले  कुछ लोग हो ,जिन्होंने उसकी ससम्मान गिरफ्तारी का प्रबंध करने में अहम् भूमिका अदा की हो ? फ़िलहाल किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है .जैसा कि हम जानते है कि अपराध जगत के सत्य उजागर होने में थोडा समय लेते है ,इसलिए वक़्त का इंतजार करना उचित होगा .
छोटा राजन की गिरफ्तारी होते ही सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के एक प्रमुख सहयोगी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेता रामदास अठावले की प्रतिक्रिया आई ,उन्होंने कहा कि छोटा राजन को इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह दलित है ,जबकि दाउद को नहीं .अठावले के बयान से देश को छोटा राजन की जाति का पता चला.तथ्यात्मक रूप से यह बात सही है कि उसका जन्म 1956 में मुंबई के चेम्बूर इलाके में एक मध्यमवर्गीय दलित परिवार में हुआ था .वह मात्र 11 कक्षा तक पढ़ा कि उसके पिता जो की जो कि एक मिल में नौकरी करते थे ,उनकी नौकरी छूट गयी .आर्थिक तंगी के चलते उसने पढाई छोड़ दी और सिनेमा के टिकट ब्लेक करने लगा .यह काम उसके लिए अपराध जगत का प्रवेशद्वार बना .यहीं से वह राजन नायर नामक माफिया की नजर में चढ़ा जो उस वक्त बड़ा राजन कहलाता था .उसके साथ मिलकर छोटा राजन ने अवैध वसूली ,धमकी ,मारपीट और हत्याएं तक की .1983 में जब बड़ा राजन को गोली का शिकार हो गया तब उसका अपराध का साम्राज्य राजेन्द्र सदाशिव निखिलांजे उर्फ़ छोटा राजन को संभालना पड़ा .फिर उसकी माफिया किंग दाउद से दोस्ती हो गयी .दोनों ने मिलकर काले कारोबार और क्राइम में जमकर भागीदारी निभाई .उनकी दोस्ती इतनी प्रगाढ़ हो गयी थी कि जब पुलिस के शिकंजे से बचने के लिए दाउद दुबई भागा तो वह अपने साथ छोटा राजन को भी ले गया .
दाउद और छोटा राजन का रिश्ता 1992 तक गाढ़ी दोस्ती का रहा ,लेकिन छोटा राजन की मुंबई पर बढती पकड़ से सतर्क हुए दाउद ने उसके साथ विश्वासघात करना शुरू कर दिया .एक तरफ तो साथ में सारे काले कारोबार ,दूसरी तरफ छोटा राजन के खास सहयोगियों पर अपने शूटरों द्वारा प्रहार ,दो तरफ़ा खेल खेल रहा था दाउद .शुरू शुरू में तो छोटा राजन को यह महज़ संयोग लगा लेकिन जब उसके खास साथी बहादुर थापा और तैय्यब भाई की हत्या में दाउद का हाथ होने की पुष्टि हुयी तो दोनों के मध्य दरार आ गयी जो 1993 के मुंबई बम्ब विस्फोट से एक ऐसी खाई में बदल गयी ,जिसे फिर कभी नहीं पाटा जा सका .एक ज़माने के खास दोस्त अब जानी दुश्मन बन चुके थे .फिर जो गेंगवार मुंबई में चली उसने पुलिस का काम सरल कर दिया .माफिया एक दुसरे को ही मार रहे थे .पुलिस का काम वो खुद ही करते रहे और एक दुसरे को निपटाते रहे .इस तरह मुंबई से माफिया का सफाया होने लगा  .दाउद मुंबई बम धमाकों के बाद कराची में रहने लग गया तथा वह आई एस आई के हाथो की कठपुतली बन गया और छोटा राजन अपनी सुरक्षा के लिहाज़ से बैंकाक भाग गया .भारत से दूर दुनिया के दो अलग अलग देशों से दोनों के बीच दुश्मनी और जंग जारी रही . भारत सरकार दोनों को भारत लाने की वचनबद्धता दोहराते रही पर कामयाब नहीं हो पाई ..और अब अचानक अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन सहजता से बाली पुलिस के हत्थे चढ़ गया .वहां की सरकार ने भी बिना कोई हील हुज्जत किये आराम से इतने बड़े अपराधी को भारत को परोसने को एकदम से राज़ी हो गयी !
अंततः 27 साल के लम्बे अरसे  बाद 6 नवम्बर 2015 की सुबह 5  बजकर 45 मिनट पर  55 वर्षीय अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन की भारत में वापसी हो गयी  .मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक डॉन ने दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर उतरते ही भारत भूमि को चूमा ,धरती माता (भारत माता ) को प्रणाम किया .छोटा राजन के इस एक कारनामे से राष्ट्र निहाल हो गया और देश में उसके लिए सकारात्मक माहौल बनने लग गया . संभव है कि आने वाले समय में उसे आतंकवाद के खिलाफ ज़िन्दगी भर लड़नेवाला योद्धा भी मान लिया  जाये .जिस तरह से उसकी गिरफ्तारी की पूरी घटना कारित की गयी है ,वह इसी तरफ कहानी के आगे बढ़ने का संकेत देती है .
क्या यह महज़ संयोग ही है कि छोटा राजन का एक भाई दीपक निखिलांजे उस  रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया का बड़ा नेता है ,जिसके नेता ने छोटा राजन के प्रति सबसे पहले हमदर्दी जताई है .दीपक हाल ही में प्रधानमंत्री की मुंबई यात्रा के दौरान उनके साथ मंच पर  भी दिखाई दिया था ,उसी पार्टी के नेता और भाजपा के सहयोगी दलित नेता रामदास अठावले छोटा राजन को दलित बता कर एक वर्ग की सहानुभूति बनाने का प्रयास करते है . क्या इसे भी सिर्फ इत्तेफाक ही माना जाये कि छोटा राजन का साला राहुल वालनुज  सिर्फ एक महीने पहले  शिवसेना छोड़कर भाजपा में शामिल होता है और भाजपाई श्रमिक संगठन राष्ट्रीय एकजुट कामगार संगठन का उपाध्यक्ष बनाया जाता है .छोटा राजन के परिजनों की भाजपा से लेकर प्रधानमंत्री तक की  परिक्रमा और रामदास अठावले का दलित सम्बन्धी बयान सिर्फ संयोग मात्र  नहीं हो सकते है ,इतना ही नहीं बल्कि छोटा राजन के एक भाई  आकाश निखिलांजे का यह कहना कि –वह कोई आतंकी नहीं है और अब खुद छोटा राजन द्वारा मीडिया के समक्ष अपने आपको मुंबई पुलिस का प्रताड़ित पीड़ित बताना और यह कहना कि मुंबई पुलिस ने दाउद के इशारों पर उस पर बहुत अत्याचार किये है .बकौल छोटा राजन मुंबई पुलिस में दाउद के बहुत सारे मददगार है ,जिनके नामों के खुलासे होने के दावे किये जा रहे है .
ऐसा लग रहा है कि छोटा राजन के साथ एक अपराधी सा बर्ताव नहीं करके उसे  भारत के खास देशभक्त हिन्दू डॉन  के रूप में प्रस्तुत करके उसका राजनितिक लाभ लेने  का प्रयास  किया जा रहा है ,उसके पक्ष में  हवा बनायीं जा रही है .छोटा राजन के  बयान और भारत सरकार के बयान सब एक खास तरह का माहौल  और कथ्य निर्मित कर रहे है .छोटा राजन ने कह दिया है कि वह ज़िन्दगी भर आतंकवाद के खिलाफ लड़ा है और आगे भी लड़ता रहेगा .तो इसका मतलब यह निकाला जाये कि  अब 70 आपराधिक मामलों में वांछित अपराधी आतंक से लड़ने वाला हीरो बना दिया जायेगा ( ऐसे अपराध जिनमे 20 हत्या के और 4 आतंक निरोधक कानून के अंतर्गत भी मामले है ) यह आतंकवाद को धर्म ,सम्प्रदाय और रंग के चश्मों से देखनेवाली एक खास किस्म की विचारधारा की सफलता नहीं  है ?
वैसे तो सत्तासीन गठबंधन के लिए छोटा राजन हर दृष्टि से मुफीद है ,वह दलित है ,उसका परिवार अम्बेडकरवादी नव बुद्धिस्ट परिवार रहा है ,उसकी माँ लक्ष्मी ताई निखिलांजे ने मुंबई के तिलकनगर में एक बुद्ध विहार बनवाने में अहम् भूमिका निभाई थी ,वह मुंबई पुलिस से प्रताड़ित एक स्वधर्मी डॉन है ,जिसने बाबरी मस्जिद ढहा दिये जाने के बाद मुंबई धमाकों का बदला लेने वाले धर्मांध और देशद्रोही दाउद के खिलाफ लम्बी जंग लड़ी ,सन्देश साफ है कि जो काम  भारत की सरकारों और सुरक्षा एजेंसियों को करना चाहिए था वह अकेले छोटा राजन ने किया है ,वह कथित इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला वतनपरस्त भारतीय है ,उसका सम्मान होना चाहिए ,उसकी सुरक्षा होनी चाहिए और उसकी मदद से हमें दाउद जैसे दरिन्दे को धर दबोचना चाहिए .उसकी नाटकीय गिरफ्तारी के तुरंत बाद से ही भक्तगण ऐसा माहौल बनाने में लगे हुए है .इस बीच महाराष्ट्र पुलिस ने सी बी आई की  अन्तराष्ट्रीय अपराधों के अनुसन्धान में विशेष दक्षता को देखते हुए छोटा राजन के खिलाफ सारे मामल उसे  सोंप दिये है .अब छोटा राजन केंद्र सरकार का विशिष्ट अतिथि है तथा उसके जान माल की सुरक्षा करना इस कृतज्ञ राष्ट्र की ज़िम्मेदारी है !
छोटा राजन की तयशुदा गिरफ्तारी ,उसके लगभग पूर्वनिर्धारित  प्रत्यर्पण और वायुसेना के विशेष विमान गल्फस्ट्रीम -3 से भारत पदार्पण और दीवाली से ठीक पहले स्वदेश आगमन को एक उत्सव का रूप देना और उसे आतंकवाद के खिलाफ आजीवन लड़नेवाला एक दलित यौद्धा निरुपित कर दिया जाना जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की तरफ ईशारा कर रहा है वह वर्तमान के जेरेबहस असहिष्णु राष्ट्र से भी कई ज्यादा भयानक है .राष्ट्रभक्ति के नाम पर ,आतंकवाद से लडाई के नाम पर एक अपराधी को राष्ट्रनायक बनाने के हो रहे प्रयास निसंदेह डरावने है .हत्यारे  को नायक बनाया जा रहा है. एक माफिया डॉन को दलितों का मसीहा बना कर पेश किया जा रहा है .क्या यह देश इतना कमजोर हो गया है कि हमें आतंकवाद के विरुद्ध लडाई भी आतंकियों को देशभक्ति का चोला पहना कर लड़नी पड़ रही है  ?
हमें याद रखना होगा कि आतंक को धर्म के चश्मे से देखने की यह अदूरदर्शी नीति एक दिन देश विभाजन का कारक बन सकती है .लोग जवाब चाहेंगे कि एक दिन इसी तरह ख़ुफ़िया एजेसियों के द्वारा याकूब मेमन भी लाया गया था ,सरकारी साक्षी बनने के लिए ,फिर वो समय भी आया जब उसे लम्बे समय तक कैद में सड़ाने के बाद फांसी के फंदे पर लटका दिया गया और जिसने इसका विरोध किया वो सभी राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिये गये ,क्या इस इतिहास की पुनरावृति छोटा राजन मामले में नहीं होगी ,इसकी कोई गारंटी है ? आज यह सवाल खड़ा हो रहा है कि यह किस तरह का देश हम बना रहे है, जहाँ  पर अक्षम्य अपराधों और दुर्दांत जालिमों को राष्ट्रवाद के उन्माद चादर तले ढंक कर सुरक्षित करने की सुविधा निर्मित कर ली गयी है .हम कितने आत्मघाती सोच को अपना चुके है जहाँ अगर आतंक का रंग हरा है तो वह खतरनाक और आतंक का रंग गैरुआ है तो वह राष्ट्रवाद मान लिया जायेगा .निर्मम सत्ता का यह स्वभक्षी समय है ,हम खुद नहीं जानते कि हम कहां जा रहे है ,पर इतनी सी गुजारिश तो की ही जा सकती है कि छोटा राजन जैसे अपराधी को देश और दलितों का आदर्श बनाने की भूल मत कीजिये .
_ भंवर मेघवंशी
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार है और दलित ,आदिवासी एवं अल्पसंख्यक समुदायों के प्रश्नों पर राजस्थान में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता है )


Tuesday, November 3, 2015

एक गांधीवादी की मौत

                       गांधीवादी गुरुशरण की मौत
राजस्थान में सम्पूर्ण शराबबंदी तथा मजबूत लोकायुक्त की मांग को लेकर पिछले 31 दिन से अनशन कर रहे बुजुर्ग गांधीवादी नेता गुरुशरण छाबड़ा की मौत से राजस्थान सरकार पर संवेदनहीन होने के आरोप लगाये जा रहे है तथा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ती जा रही है .
2 अक्टूबर 2015 से अनशन कर रहे 72 वर्षीय  गुरुशरण छाबड़ा की कल हालत बेहद नाजुक हो गयी थी ,उन्हें गहन चिकित्सा ईकाई में वेंटिलेटर पर रखा गया ,उपचार के दौरान वे कोमा में चले गए  और अंततः आज सवेरे 4 बजे उनकी मौत हो गयी .प्रदेश में सम्पूर्ण शराबबंदी की मांग को लेकर पूर्व विधायक गुरुशरण छाबड़ा काफी लम्बे समय से आन्दोलनरत थे ,उन्होंने प्रसिद सर्वोदयी नेता गोकुलभाई भट्ट के साथ मिलकर  शराबबंदी के लिए चलाये गए अभियान में प्रमुख भूमिका निभाई.1977 में वे सूरतगढ़ से जनता पार्टी से वे विधायक चुने गए थे .प्रदेश के सर्वोदयी तथा गांधीवादी आन्दोलन से उनका नजदीकी रिश्ता था .
वर्ष 2014 के अप्रैल - मई में भी उन्होंने 45 दिन का अनशन किया था ,जिसके फलस्वरूप वसुंधराराजे सरकार ने उनके साथ एक लिखित समझौता किया था कि शीघ्र ही एक सशक्त लोकायुक्त कानून तथा शराबबंदी के लिए कमेटी गठित की जाएगी और उस कमेटी की सिफारिशों को माना जायेगा ,मगर लिखित वादे पर एक साल बाद भी क्रियान्वयन नहीं होने पर गुरुशरण छाबड़ा इस साल गांधी जयंती पर फिर से अनशन पर बैठ गए .इस बार प्रदेश के कई संगठनो तथा सक्रीय लोगों ने उनके आन्दोलन का समर्थन किया .अनशन के 17वे दिन पुलिस ने उन्हें अनशन स्थल से उठा लिया तथा जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में जबरन भर्ती करा दिया ,वहां पर भी छाबड़ा ने अपना अनशन जारी रखा तथा राज्य में सम्पूर्ण शराबबंदी और मज़बूत लोकायुक्त कानून बनाने की मांग को बलवती किया .
उल्लेखनीय है कि पूर्ववर्ती सरकारों में भी गुरुशरण छाबड़ा गांधीवादी तरीकों से अपनी मांग के समर्थन में आन्दोलन करते रहे है .वर्ष 2003 में गहलोत के शासन में भी उन्होंने अनशन किया था ,तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनकी कईं मांगों को मानकर अपने हाथ से जूस पिला कर उनका अनशन तुड़वाया था .बाद में 2014 में तकरीबन डेढ माह तक उनका अनशन व मौनव्रत चला जो राज्य सरकार के साथ लिखित समझौते से समाप्त हुआ ,मगर इस बार राजस्थान सरकार ने छाबड़ा के आन्दोलन के प्रति उपेक्षा का रवैया अख्तियार कर लिया तथा उन्हें अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिया गया .एक माह से अनशन कर रहे बुजुर्ग गांधीवादी नेता गुरुशरण से संवाद तक करना भी सरकार ने उचित नहीं समझा ,अलबता उनके शांतिपूर्ण अनशन व आन्दोलन को कुचलने की कोशिशें जरुर की गयी .राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे ने एक बार भी इस बारें में आन्दोलनकारी गांधीवादी से मिलने  तथा बात करने की जरुरत नहीं समझी .कल 2 नवम्बर को जब अनशनकारी छाबड़ा की स्थिति बहुत ज्यादा बिगड गयी तब लोक दिखावे के लिए सुबह चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्रसिंह अस्पताल पंहुचे तथा डॉक्टर्स को दिशा निर्देश दे कर चले आये ,बाद में जब और भी हालात नाजुक हुए तो सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री अरुण चतुर्वेदी एस एम एस पंहुचे,मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी .
राजस्थान सरकार गुरुशरण छाबड़ा की मांगो को लेकर कितनी गंभीर थी ,इसका अंदाज़ा मुख्यमंत्री के खासमखास माने जाने वाले चिकित्सा मंत्री राजेन्द्रसिंह राठौड़ के बयान से लगता है ,मंत्रीजी का साफ कहना है कि प्रदेश में शराबबंदी संभव नहीं है  ,क्योंकि यह राजस्व से जुड़ा मामला है .मंत्री महोदय का यह भी मानना है कि जिन राज्यों ने शराबबंदी की है उनके अनुभव अच्छे नहीं रहे है .मजबूत लोकायुक्त की मांग पर उन्होंने कहा कि एडवोकेट जनरल की अध्यक्षतावाली कमेटी बनी है जो अन्य राज्यों के साथ अध्ययन कर रही है ,जल्दी ही निर्णय हो जायेगा .आशय यह है कि राज्य में मजबूत लोकायुक्त कानून के लिए अध्ययन जारी है और राजस्व को देखते हुए शराबबंदी की मांग को नहीं माना जा सकता है .
राज्य की सकल राजस्व आय के आंकड़ों पर नज़र डालें तो शराब से होने वाली आय इतनी ज्यादा भी नहीं है कि यह कहा जा सके कि राज्य का संचालन उसके बिना संभव नहीं है और उसका कोई विकल्प नहीं है .बजट अध्ययन केंद्र राजस्थान के साथ कार्यरत युवा अर्थशास्त्री भूपेन्द्र कौशिक के अनुसार राजस्थान सरकार को वित्तीय वर्ष 2011 -12 में आबकारी से 12.29 % ,वर्ष 2012-13 में 12 .11 % ,वर्ष 2013 -14 में 13 .21 % ,वर्ष 2014 -15 में 13 .08 % तथा वर्ष 2015 -16 में 13 .38 % की राजस्व आय शराब से हुयी है .इसका मतलब यह है कि व्यापक लोकहित में सरकार अन्य प्रकार के टेक्सों में मामूली बढ़ोतरी करके शराब से होने वाली आय की भरपाई कर सकती है ,मगर माना जाता है कि राज्य शासन में शराब लॉबी इतनी सशक्त है कि सरकार उन पर पाबन्दी लगाने की बात तो दूर उनको छेड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकती है ,ऐसे में शराबबंदी की मांग को अव्यवहारिक और राज्य के विकास के लिए हानिकारक बता कर पल्ला झाड़ने की कोशिस की जाती रही है .
बात सिर्फ राजस्व घाटे की पूर्ति या कर उगाही की नहीं है और ना ही एक सशक्त कानून लाने भर की है ,बात यह है कि एक लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुयी कल्याणकारी सरकार अपने नागरिकों की कितनी सुनती है ? सुनती भी है या नहीं ? आखिर एक पूर्व विधायक और नामचीन गांधीवादी बुजुर्ग की ही परवाह नहीं की गयी , वह भूख हड़ताल करते हुए ही संसार को अलविदा कह गए ,तो आम इन्सान की क्या सुनी जाएगी .जनता के आंदोलनों का क्या मूल्य है इस सरकार के लिए ? गांधीवादी गुरुशरण छाबड़ा की मांग और तरीके को लेकर मतभेद हो सकता है ,उनकी मांग की व्यावहारिकता और प्रासंगिकता को लेकर बहस हो सकती है ,उसे मानना या नहीं मान पाने की राजनीतिक व आर्थिक मजबूरियां गिनाई जा सकती है ,मगर यह कैसे संभव है कि एक शांतिपूर्ण आन्दोलनकर्ता को यूँ ही मरने के लिए छोड़ दिया जाये ,उसकी सुनी ही नहीं जाये और अंततः वह मर ही जाये . तब भी सरकार अपने सामन्ती रौब और सत्ता के नशे में ही ऐठीं रहे .यह स्वस्थ प्रजातंत्र की निशानी नहीं है ,यह रुग्ण राजतन्त्र के लक्षण है .जिनकी चौतरफा भर्त्सना आवश्यक है .
अब तो राजस्थान के आमजन की भी यह धारणा बन गयी है कि वसुंधराराजे की यह सरकार संवादहीनता और संवेदनहीनता नामक दो प्रमुख दुर्गणों का जनविरोधी मेल होती जा रही है .रिसर्जेंट राजस्थान में शायद गुरुशरण छाबड़ा जैसे गांधीवादी बुजुर्गों की कोई जरुरत नहीं है .सोशल मीडिया पर राज्य सरकार की निष्ठुरता और मुख्यमंत्री की संवेदनहीनता की सर्वत्र आलोचना हो रही है और मुख्यमंत्री वसुंधराराजे से इस्तीफ़ा माँगा जा रहा है .दूसरी ओर एक निष्काम कर्मयोगी की भांति जीवन भर जनहित में लगे रहे गांधीवादी नेता गुरुशरण छाबड़ा को लोग अश्रुपूर्ण श्रधांजलि दे रहे है ,लोग नत मस्तक है कि वे जब तक जिए लोगों के लिए जिए और मरे तो अपनी देह को भी मेडिकल के विद्यार्थियों के लिए दान कर गए और अपनी अंतिम साँस भी अपने उस ध्येय के लिए समर्पित कर दी ,जिसके लिए जीवन भर साँस लेते रहे .
-          -  भंवर मेघवंशी

-    (लेखक स्वतंत्र पत्रकार है ) 

Monday, November 2, 2015

प्रगतिशील होने का पाखंड

                        
राष्ट्रवादी ढोंगियों ने विकास का नारा लगा कर प्रगतिशीलता की खाल तले खुद का ढंक लिया है .
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
“ भाई मैं जंतर मंतर में भरोसा नहीं करता ,मैं लोकतंत्र पर भरोसा करता हूँ और यही मेरा जन्तर मंतर और ताबीज़ है “ यह शब्द भारत के चक्रवर्ती सम्राट नरेंद्र मोदी के है जो उन्होंने बिहार चुनाव प्रचार के दौरान मधुबनी में आयोजित एक रैली में लोगों से कहे .इससे पूर्व भी वे बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार की इस बात के लिए आलोचना कर चुके है कि उन्होंने किसी तांत्रिक से मुलाकात की है .प्रधानमन्त्री मोदी ने लालू प्रसाद ,नितीश कुमार के महागठबंधन को महास्वार्थबंधन कहते हुए उसे भी जंगलराज व जन्तर मंतर राज से नवाजा .मोदी ने यह भी कहा कि लोग मुसीबत पड़ने पर बाबाओं के पास जाते है .उनका पूरा ईशारा नितीश कुमार व उनके सहयोगियों पर था कि वे कितने दकियानूसी विचार वाले है जो अब भी बाबा लोगों और तांत्रिकों के पास जाते है तथा यंत्र तंत्र में यकीन करते है जबकि दूसरी तरफ मोदी एक आधुनिक विकास पुरुष है जो इन अंधविश्वासों पर भरोसा नहीं रखते है ,वे वैज्ञानिक ,तार्किक और प्रगतिशीलता का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता है ,
सवाल यह है कि क्या वाकई मोदीजी इन सब बातों को नहीं मानते है , क्या उन्हें ज्योतिष ,तंत्र - मन्त्र और गंडे ताबीज़ एवं अंगूठियों से परहेज़ है ? क्या वे बाबा लोगों से दूर रहते है ? हालाँकि मोदीजी के भाषण के तुरंत बाद ही एक ज्योतिषी बेजान दारूवाला ने उनकी कलई यह दावा करके खोल दी कि मोदी ज्योतिष में यकीन करते है और उन्होंने मोदी की हस्तरेखा देख कर भविष्यवाणी भी की थी .बेजान दारूवाला ने अपने कथन के समर्थन में एक फोटो भी शेयर किया है जिसमे वे मोदी का हाथ पढ़ रहे है .हालाँकि यह बहस और विवाद का विषय हो सकता है कि बेजान की भविष्यवानियाँ कितनी सही साबित हुयी मगर इतना तो तय है कि मोदी ज्योतिष में यकीन भी करते है और हस्तरेखाविदों के समक्ष हाथ भी फैलाते रहते है .
ना केवल बेजान दारूवाला बल्कि देश भर के कई अन्य तांत्रिकों ,ज्योतिषियों और सामुद्रिक शास्त्र के आधार पर भविष्यवाणी करने वाले लोगों की मोदी जी निरंतर सेवा लेते रहे है .लोकसभा चुनाव के दौरान मुझे राजस्थान के भीलवाड़ा शहर में रहने वाले तंत्र ज्योतिषी प्रह्लाद राय सोमाणी ने बताया था कि उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ज्योतिषीय विचार विमर्श एवं तंत्र विद्या के ज़रिये भविष्य जानने के लिए अहमदाबाद बुलाते रहते है तथा अपने राज काज के व्यस्ततम समय में से वक़्त निकाल कर दो दो घंटे तक चर्चा करते है .मैंने जिज्ञाषावश उन तंत्र ज्योतिषी सोमाणी से पूंछा कि आपकी जानकारी क्या कहती है मोदी के बारे में ? उनका कहना था कि यह आदमी एक बार पार्टी अध्यक्ष बनेगा और बाद में सर्वोच्च पद तक पंहुच जायेगा .हालाँकि ठीक वैसा तो बिलकुल भी नहीं हुआ क्योंकि बिना राष्ट्रीय अध्यक्ष बने ही मोदी प्रधानमंत्री बन गए ,मगर फिर भी तंत्र ज्योतिषी प्रह्लाद राय सोमाणी का मोदी बहुत एहतराम करते रहे है और उनकी सलाहियत पर चलते भी रहे है .आश्चर्य की बात है कि वही मोदी अचानक अब ज्योतिष और तंत्र विद्या के विरोधी हो गए है !
इतना ही नहीं मोदी अपने सार्वजानिक जीवन में सदैव ही बाबाओं की कृपादृष्टि के भी मोहताज़ रहे है ,सारा देश जानता है कि वे आशाराम जैसे ढोंगी बाबा के बेहद नजदीकी रहे है ,योग व्यवसायी बाबा रामदेव से उनकी करीबियत किससे छुपी हुयी है ? हाल ही में उनके गुरु स्वामी दयानंद महाराज का निधन होने का समाचार देश के मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज़ रही है .इसके अलावा भी बाबाओं की उर्वरक धरती गुजरात के मुख्यमंत्री रहते वे अक्सर भांति भांति के बाबाओं के चरणों में नत मस्तक नज़र आते रहे है .अब भी उनकी पार्टी और मंत्रिमंडल में बाबा ,स्वामी और साध्वियां भरे पड़े है .फिर भी वे पूरी ढिठाई से अपने विरोधियों पर निशाना साधते है उन्हीं कर्मो व कुकर्मों के लिए, जिनमें वे स्वयं आकंठ लीन है .
उनकी एक वरिष्ठ मंत्रिमंडलीय सहयोगी स्मृति जुबिन ईरानी अपने पति के साथ मंत्री बनाए जाने के बाद भीलवाड़ा के ही कारोई गाँव के भृगु संहिता के आधार पर भविष्य बांचने वाले बुजुर्ग पंडित नाथूराम के पास हाथ दिखाने और टोने टोटके करवाने आई थी ,जिस पर देश व्यापी हंगामा मच चुका है .मोदी जी की पार्टी की अधिकृत मान्यता रही  है कि ज्योतिष एक विज्ञान है ,जिसे विश्वविद्यालयों में पढाया जाना चाहिए .इस सबके बावजूद भी प्रधानमंत्री मोदी का प्रगतिशील होने का पाखंड समझ से परे है .पर अब यह स्थापित तथ्य है कि जो बातें उनके आचरण के ठीक विपरीत होती है ,उन झूठों को भी वे पूरी सह्ज़ता से बोल लेते है .इसी पाखंडी चरित्र के चलते देश में अविश्वास का मौहाल बनता जा रहा है .आज हर कोई जानता है कि जो मोदी कहते है ,करते उसके ठीक विपरीत है .वे जिन बातों और वादों के सहारे सत्तारूढ़ हुए है ,उन्हें विस्मृत किया जा चुका है .विकास का भुलावा दे कर सत्ता में आये मोदी व्यवहार में विनाश के रास्ते पर आगे बढ़ते दिखाई पड़ रहे है .विचार और व्यवहार (कथनी और करनी) का यही अंतर मोदी को देश में अब तक का सबसे बौना प्रधानमंत्री साबित करता है ,जो चुनाव जीत कर भी अब तक  देश का भरोसा नहीं जीत पाए है .
-    भंवर मेघवंशी

{ लेखक स्वतंत्र पत्रकार है }  

Sunday, November 1, 2015

चुप्पी तोड़ दीजिये मोदी जी

              चुप्पी तोड़िये प्रधानमंत्री जी !
” देश चला रहे शख्स का संवेदनशील मामलों पर चुप रहना और उनके सहयोगियों की गैरजिम्मेदाराना बयानबाज़ी राष्ट्र की एकता को गंभीर क्षति पंहुचा रही है “
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
आज देश के हर क्षेत्र के नामचीन लोग यह कह रहे है कि देश में सहिष्णुता का माहौल नहीं है ,लोग डरने लगे  है .अविश्वास और भय की स्थितियां बन गयी है ,फिर भी सत्ता प्रतिष्ठान के अधिपति इस बात को मानने को राजी नहीं दिखाई दे रहे है .साहित्यकारों द्वारा अवार्ड लौटाए जाने को उन्होंने साज़िश करार दिया है .उनका कहना है कि ये सभी साहित्यकार वर्तमान सत्ता के शाश्वत विरोधी रहे है तथा एक विचारधारा विशेष की तरफ इनका रुझान है ,इसलिए इनकी नाराजगी और पुरुस्कार वापसी कोई गंभीर मुद्दा नहीं है .
सत्ताधारी वर्ग और उससे लाभान्वित होने वाले हितसमूह के लोग हर असहमति की आवाज़ को नकारने में लगे हुए है .ऐसा लगता है कि नकार इस सत्ता का सर्वप्रिय लक्षण है .शुरूआती दौर में जब वर्तमान सत्ता के सहभागियों के अपराधी चरित्र पर सवाल उठे और एक मंत्री पर दुष्कर्म जैसे कृत्य का आरोप लगा तो सत्ताधारी दल ने पूरी निर्लज्जता से उसका बचाव किया और उन्हें मंत्रिपद पर आरुढ़ रखा .इसके बाद मानव संसाधन जैसे मंत्रालय में अपेक्षाकृत कम पढ़ी लिखी मंत्री महोदया के आगमन पर बात उठी तो वह भी हवा में उड़ा दी गयी .ललित गेट का मामला उठा और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे तथा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का इस्तीफ़ा माँगा गया तब भी वही स्थिति बनी रही .व्यापम में मौत दर मौत होती रही मगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह निर्भयता से शासन का संचालन करने के लिए स्वतंत्र बने रहे .
मंहगाई ने आसमान छुआ. सत्ता के सहयोगी बेलगाम बोलते रहे ,मगर फिर भी प्रधानमंत्री ने कुछ भी कहना उचित नहीं समझा दहाड़ने वाले मोदी लब हिलाने से भी परहेज़ करने लगे .गोमांस के मुद्दे पर जमकर राजनीती हुयी ,सिर्फ संदेह के आधार पर  देश भर में तीन लोगों की जान ले ली गयी  .एक पशु जिसे पवित्र मान लिया गया ,उसके लिए तीन तीन लोग मार डाले गए .पर इसका सिंहासन पर कोई असर नहीं पड़ा .सत्ताधारी दल के अधिकृत प्रवक्ता इन हत्याओं की आश्चर्यजनक व्याख्याएं करते रहे ,कई बार तो लगा कि वे हत्याओं को जायज ठहराने का प्रयास कर रहे है .भूख और गरीबी के मुद्दे गाय की भेंट चढ़ गए ,फिर भी प्रधानमंत्री नहीं बोले .शायद मारे गए लोगों की हमदर्दी के लिए मुल्क के वजीरे आज़म के पास कोई शब्द तक नहीं बचे थे  ,इस सत्ता का कितना दरिद्र समय है यह ?
तर्कवादी ,प्रगतिशील ,वैज्ञानिक सोच के पैरोकार और अंधविश्वासों के खिलाफ़ जंग लड़ रहे तीन योद्धा नरेंद्र दाभोलकर ,कामरेड गोविन्द पानसरे एवं प्रोफेसर कलबुर्गी मारे गये .यह सिर्फ तीन लोगों का क़त्ल नहीं था  ,यह देश में तर्क ,स्वतंत्र विचार और वैज्ञानिक सोच की हत्या थी ,मगर प्रधानमंत्री फिर भी नहीं बोले .
देश भर में दलित उत्पीड़न की वारदातों में बढ़ोतरी हुयी ,दक्षिण में विल्ल्ल्पुरम से लेकर राजस्थान के डांगावास तथा हरियाणा के सुनपेड़ तक दलितों का नरसंहार हुआ ,दलित नंगे किये गए ,महिलाओं को बेइज्जत किया गया ,दलित नौजवान मारे गए ,मोदी जी को उनके आंसू पूंछने की फुर्सत नहीं मिली .हर नरसंहार पर सत्ता के अन्ह्कारियों ने या तो पर्दा डालने की कोशिस की या उससे अपने को अलग दिखाने की कवायद की .एक केन्द्रीय मंत्री ने तो मारे गए दलित मासूमों की तुलना कुत्तों से कर दी और हंगामा होने पर यहाँ तक कहने में भी कोई संकोच नहीं किया कि जब मैं मीडिया से बात कर रहा था ,तब वहां से कुत्ता गुजरा ,इसलिये मैंने उसका नाम ले लिया ,अगर भैंस निकल आती तो भैंस का नाम ले लेता ! यह गाय ,भैंस सरकार है या देश की सरकार है ?
महिलाओं की अस्मत पर खतरे कम नहीं हुए ,बल्कि बढे है .डायन बता कर हत्या करने ,अपहरण ,बलात्कार के मामलों में कई प्रदेश भयंकर रूप से कुख्यात हुए .मासूमों से दुष्कर्म और उनकी निर्मम हत्याओं की देशव्यापी बाढ़ आई हुयी है ,जिनकी जिम्मेदारी है इन्हें रोकने की ,वो सत्तासीन लोग उलजलूल बयानबाज़ी करके पीड़ितों के घाव कुरेदते रहे फिर भी  हमारे महान देश के पन्तप्रधान मौनी बाबा बने रहे .लोग यह कह सकते है कि उनका ज्यादातर समय बाहर के मुल्कों की यात्रा में बीता है ,इसलिए वो पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाए .मगर जब घर में आग लगी हो तो कोई घूमने नहीं जाता सिवाय हमारे प्रधानमंत्री जी के .
मोदीजी आप किस तरह के प्राइमिनिस्टर है .क्या वाकई आपको कुछ भी पता नहीं है ,या आपको सब कुछ पता है और आप ऐसा होने देना चाहते है .आपके देश में साहित्यकार धमकियों के चलते लिखना छोड़ देते है ,तर्क करने वाले मार दिये जाते है .पडौसी मुल्क के कलाकार अपने फन की प्रस्तुति नहीं कर सकते है .कहीं खेल रोके दिये जाते है तो कहीं  किसी के चेहरे पर स्याही छिडकी जाती है .प्रतिरोध के स्वरों को विरोधी दल की आवाज कह कर गरियाया जाता है .जाति और धर्म के नाम पर मार काट मची हुयी है .वंचितों के अधिकार छीने जा रहे है .अल्पसंख्यकों को भयभीत किया जा रहा है .बुद्धिजीवीयों  को हेय दृष्टि से देखा जा रहा है ,मगर आप है कि मेक इन इंडिया ,डिजिटल इंडिया और विकास का ढोल पीट रहे है .जब पूरा मुल्क ही अशांत हो तो वह कैसे विकास करेगा ? कैसा विकास और किनका विकास ? किनके लिए विकास ? सिर्फ नारे ,भाषण और नए नए नाम वाली योजनाओं की शोशेबाजी ,आखिर इस तरह कैसे यह देश आगे बढेगा .यह देश एक भी रहेगा या बाँट दिया जायेगा .कैसा मुल्क चाहते है आपके नागपुरी गुरुजन ? शुभ दिनों के नाम पर कैसा अशुभ समय ले आये आप ? और आपके ये बेलगाम भक्तगण जिस तरह की दादागिरी पर उतर आये है वे  आपातकाल नामक सरकारी गुंडागर्दी से भी ज्यादा भयानक साबित हो रही है.
बढ़ती हुयी असहिष्णुता और बिगड़ते सौहार्द्र पर  देश के साहित्यकार ,चित्रकार ,फ़िल्मकार ,उद्योगपति ,अर्थशास्त्री ,वैज्ञानिक ,सामाजिक कार्यकर्ता ,पत्रकार ,रिजर्व बैंक के गवर्नर और यहाँ तक कि राष्ट्रपति तक बोल रहे है .आप कब बोलेंगे ? कब आपकी ये अराजक वानरसेना नियंत्रित होगी ? चुप्पी तोड़िये पीएम जी ,केवल रेडियो पर मन की बात  मत कीजिये ,देश के मन की बात भी समझिये और उसके मन से अपने मन की बात को मिला कर बोलिए ,ताकि देश वासियों का भरोसा लौट सके .देश के बुद्धिजीवी तबके की आवाज़ों को हवा में मत उड़ाइए .असहमति के स्वरों को कुचलिये मत और अपने अंध भक्तों को समझाईये कि सत्ता का विरोध देशद्रोह नहीं होता है ,और ना ही प्रतिरोध करने वालों को पडौसी मुल्कों में भेजने की जरुरत होती है .एक देश कई प्रकार की आवाज़ों से मिलकर बनता है .हम सब मिलकर एक देश है ,ना कि नाम में राष्ट्रीय  लगाने भर से कोई राष्ट्र हो जाता है .
भारत अपनी तमाम बहुलताओं ,विविधताओं और बहुरंगी पहचान की वजह से भारत है .इसलिए यह भारत है क्योंकि यहाँ हर जाति ,धर्म ,पंथ ,विचार ,वेश ,भाषा और भाव के व्यक्ति मिलकर रह सकते है .तभी हम गंगा जमुनी तहज़ीब बनाते है .सिर्फ गाय का नारा लगाने और गंगा की सफाई की बातें करने और देश विदेश के सैर सपाटे से राष्ट्र नहीं बनता ,ना ही आगे बढ़ता है .सबको साथ ले कर चलना है तो भरोसा जितियेगा .डर पैदा करके सत्ताई दमन के सहारे दम्भी शासन किसी भी मुल्क को ना तो कभी आगे ले गया है और ना ही ले जा पायेगा . उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर फैलाया जा रहा कट्टरपंथ हमें एक तालिबानी मुल्क तो बना सकता है मगर विकसित राष्ट्र नहीं .यह आप भी जानते है और आपके आका भी ,फिर भी अगर आप चुप रहना चाहते है तो बेशक रहिये ,फिर यह पूरा देश बोलेगा और आप सिर्फ सुनेंगे.
-    भंवर मेघवंशी
{ लेखक राजस्थान में कार्यरत मानव अधिकार कार्यकर्ता है }


Friday, August 28, 2015

The Dalits of Bhagana: They asked for justice and got Islam instead



For about four months they faced social and economic boycott, and emotional suffering. They were not allowed to collect water from the public tap or use the common land for defecation. The only doctor (who was not a Dalit) had stopped treating them. They were not allowed to use the village’s land to bury their dead cattle or even dispose of their cattle dung. It was unthinkable that their brides or grooms could ride on horseback on their weddings. When they could not bear this misery any longer, on 21 May 2012, seventy Dalit families of Bhagana thought it best to leave the village with their livestock.
In the hope of getting justice, they assembled near the mini-secretariat in the district headquarters of Hisar and started a dharna (sit-in demonstration/protest). The Dalits of Bhagana appealed to everyone for justice: right from the sarpanch of their village panchayat to the President of India. They went to the tehsildar, took up the matter with the sub-divisional magistrate and complained to the police superintendent and the district collector. They met the then and present chief ministers several times. They approached several commissions, institutions and organizations, and wrote to the bigwigs in all the political parties in Delhi. From nowhere was there any response which might have given them some hope. They moved from Hisar to Jantar Mantar in Delhi to make their protest more forceful. Since 16 April 2014 they have been sitting in Delhi and telling the country about their plight but, in this wilderness of the state and society, there is nobody to hear them. They kept fighting for their rights all the time and at all levels. They first left their houses, then their village, and then the district and the state. Finally, after they started giving up even their religion things stirred a bit. But even now there is no talk of solving their problem. The issues being deliberated seem to be changing and nobody wants to know what circumstances forced the Dalits of Bhagana to take such a drastic step.
Bhagana is a traditional village only 17 kilometres from the district headquarters of Hisar in Haryana. The population here comprises 59% Jats, 8% general category (Brahmins, Baniyas, Punjabis), 9% other backward castes (Chambis, Telis, Kumhars, Lohars and Goswamis) and 24% Dalits (Chamars, Katiks, Domas, Valmikis and Baigs). In the year 2000 the Ambedkar Welfare Committee was formed here and Dalit organizations began to get founded. They started seeing the injustice being done to them in the village and began to come together in an effort to get their constitutional rights. As a result, the conservative forces in the village started getting uncomfortable. The Dalits asked for the title deeds of their residential properties and demanded that their share of the common land be allocated. The real fight started in 2012 when the Dalits began demanding that Chamar Chowk, which was in the village, be renamed as Ambedkar Chowk and that a statue of Ambedkar be installed there. This chowk was situated near the area where the Dalit population stayed and the houses of many Dalit families opened onto it. But the strongmen of the village could not bear the thought of Dalits acquiring the chowk. Not only this, they also could not accept the registration and allotment of the plots given to Dalits as residential land under the Mahatma Gandhi Basti Vikas Yojana. They did not like the comings and goings of Dalits on the common land. The sum and substance of the matter is that Bhagana had become a living hell for self-respecting Dalits. In such a situation, they did not have any option but to leave the village and raise their voice for justice.
And so this fight went on. In the past three years the fight has got very intense and strong: first outside the mini-secretariat in Hisar and in the end when the fight continued at Jantar Mantar. Yet despite the intensity of their struggle since 2014 they have not been able to get justice. To add to this, four minor girls from Bhagana were kidnapped and gang-raped and the response of the police was not satisfactory. As a result the anger kept increasing. The previous government in Haryana had made promises to the protesting Dalits but they lost power. The victims of Bhagana had even met Chief Minister Khattar of the BJP government four times but no action was taken. With the protest going on for very long, even the supporters from Dalit organizations who were with them left. When there was nobody left to back them, the Dalits of Bhagana had to do something.
So they decided to send pamphlets to everybody announcing a rally during the Parliament session. This rally was to take place on 8 August 2015 and during this time 100 families stated that they would convert to Islam, which has resulted in the ongoing uproar in the country. As a result, in Bhagana, a maha-panchayat of all castes took place in which the leaders of the Hindu Mahasabha, Vishwa Hindu Parishad (VHP) and Bajrang Dal also participated. They openly decided that those converting should return to the Hindu fold and that otherwise they would not be allowed to return to the village. The VHP’s international general secretary, Surendra Jain, said this was complete blackmail and said it could not be accepted under any circumstances. The Hindu Mahasabha’s Dharmpal Siwach pledged that Bhagana’s Dalits will be brought back to Hinduism at all costs. While on the one hand, in the guise of counselling the Dalits who converted and returned home, the Hindutva leaders attempted to threaten them, on the other hand the right-wing governments at the centre and in the state started harassing them. Soon after the conversion, on Saturday night the Haryana police forcefully removed the Dalit protestors, who had been on a demonstration outside the Hisar mini-secretariat for the past three years, and broke their tent. In Delhi the police tried to drive them out of Jantar Mantar on the night of 10 August 2015 by attacking the protestors and lathi-charged them when they resisted.
The situation now is such that those who have converted are shunned in the village, although it is true that they had been facing a social boycott from the villagers even earlier. They have been made to flee from Hisar and have been forced out of Jantar Mantar as well. In such a situation it would be natural to ask what the future of this long movement of Bhagana is. Will it continue or will it end here? I posed this question to Abdul Razzak Ambedkar, who has been closely associated with this movement and is the chief organizer of the conversions, and he said, “The fight against the oppressors will continue. The sit-in at Jantar Mantar is on and will continue. As far as the khap panchayat’s decision is concerned, we are not afraid. We will go to Bhagana soon. It is our democratic right.” He added, “We knew that our troubles would increase after the conversion because communal organizations are making this a Hindu-Muslim issue. But those Dalits who have converted to Islam will stay in Islam and continue their fight for justice.” In the cruel lathi-charge by the police on the night of 9 August 2015 even Razzak was seriously hurt but his resolve is steadfast. He says, “The Dalits who have converted know that their scheduled caste status does not remain but they hope that the Muslim community will come forward to help them.”
Despite the attacks from all corners, the resolve of the Dalits who have converted has not weakened. Newly converted Satish Kajala, who is now Abdul Kalam Ambedkar, says, “Come what may, we will now stay Muslims. If our ancestors had taken the step we have taken today, then we would not have had to see this day.” Virendra Singh Bagoria, who lives in Bhagana and belongs to a backward caste, says, “We have fully adopted Islam. Now no fear, pressure or temptation can make us Hindus again.” Other Dalits and most backward who have adopted Islam also seem to be strongly in favor of sticking by their decision to convert for now. The efforts of the BJP, Sangh, VHP, Bajrang Dal and Hindu Mahasabha are now concentrated on bringing those who have converted back into the Hindu fold. But the victimized Dalits of Bhagana have made their message very clear: if Hindus do not care about Dalits, then the Dalits too do not care about Hinduism. At a time when a right-wing Hindu ruler has power at the centre in Delhi, if, right below his nose, persecuted Dalits can openly challenge, distribute pamphlets and declare that they have converted to Islam, then it can become an obstacle to the creation of a Hindu nation by 2020. The Dalits of Bhagana took this decision after a lot of thought. When I had been to their sit-in a month back, I had felt that they were leaning towards conversion and that they might take up Islam.
In a democratic country any person can take up or leave any religion. This is their personal choice and there is nothing illegal about it. This is why I have no problem with the decision of the Dalits in Bhagana to take up Islam. I respect their decision. However, my personal opinion is that conversion is not the solution to any problem and that conversion itself is a problem. In organized religion appearances, hypocrisy and politics of the worst kind decide who the privileged classes are. Caste and casteism can be found in all the religions in India. Islam is also not untouched by this. As Dalit intellectual S.R. Darapuri has said, “Conversion is not the solution to Dalits’ problems. Dalits must take the path of revolution. If one must convert, then it is best to convert to Buddhism, in which there is no difference between the principles and the practice. In India, there is a difference between the principle and practice in Islam, Christianity and Sikhism.”
This is really a question to ponder over; will sacrificing one’s religion and taking up another make one free of the effects of the hatred of casteism or will it make one the victim of religious animosity as well? As has been happening with the converted Dalits of Bhagana, as soon as they converted the behaviour of the state and the community became very cruel. One will also have to consider the question if Muslims themselves feel safe today. The way the attacks of the majority are increasing on them, like the examples of Gujarat, Muzzafarnagar and Atali show, even if the Dalits hold on to the Muslims, the likelihood of their oppression ending looks bleak.The final matter is now whether the faith of Dalits of Bhagana in Babasaheb’s Constitution will be as strong or if they will look for the solutions to their problems in the Koran, sharia and their Muslim brethren? Will the causes and methods of the fight change? Will the Dalit Muslims of Bhagana still want to install a statue of Ambedkar in Chamar Chowk and fight or will this now be considered as a form of idol worship? Another question is if Indian Muslims will give Bhagana’s new Muslims an equal status or if they will have to stay backward there also and continue their battle for equality? If it is so, they will be getting into a bigger problem. I will always hope that the Dalits of Bhagana get justice but they have got Islam instead of justice, which is their choice. I stand by their constitutional right to change their religion. It is for the Indian state to ensure that nobody should be able to force them and, whatever be their choice, that they be able to follow their faith. But I still do not think that the solution to Dalit problems is conversion. Today Dalits do not need to leave one religion and adopt another. Instead of adopting any religion, they should reject all religions. Only then is freedom possible. Possibly all religions need Dalits but I believe that Dalits do not need any religion. A democracy without religion is definitely needed to lead a life of liberty, equality and fraternity.
- Bhanwar Meghwanshi
(The author works as an independent journalist covering the issues of human rights in Rajasthan)

Wednesday, August 26, 2015

ये तुम्हारे गले में किसकी आवाज़ है हार्दिक ?

        
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------
“ गुजरात में अराजकता का नया चेहरा उभर कर सामने आया है जिसकी भाषा तोगड़िया सी है और कार्यशैली केजरीवाल जैसी है ,जो बंदूक और रिवोल्वर से प्यार करता है और जिसके समर्थक ओडी तथा मर्सिडीज गाड़ियों में बैठकर आरक्षण मांगने आते है ,कानून उनके लिए कुछ भी नहीं है ,अगर उन्हें मनमानी करने से रोका जाता है तो वे दंगा फसाद से भी परहेज नहीं करते है “
................................................................................................................................
मोदी का बहुप्रचारित विकसित गुजरात आज पटेल आरक्षण की आग में धूं धूं कर जल रहा है और अराजक आवारा भीड़ के हवाले है .प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री सुरक्षित स्थानों से शांति की रटी रटाई अपीलें दोहरा रहे है ,अनियंत्रित भीड़ सरकारी सम्पतियों को निशाना बना रही है ,कहीं बसें जलाई जा रही है ,तो कहीं पटरियां उखाड़ने की कोशिशें की गयी है ,पुलिस और दंगाई आंख मिचौली खेलते दिखाई पड़ रहे है .
क्या अहमदाबाद में 25 अगस्त को हुयी पाटीदार अमानत आन्दोलन समिति की महाक्रान्ति रैली अप्रत्याशित थी ? राज्य शासन के ख़ुफ़िया विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी या अंदाज़ा लगाने में वे विफल रहे कि 6 जुलाई से निरंतर गुजरात के अलग अलग हिस्सों में  हो रही रैलियां एक दिन बड़ा आन्दोलन बनेगी .जबकि 17 अगस्त को सूरत की रैली में ही लाखों लोग शिरकत कर चुके थे ,उसके बावजूद भी हालात को यहाँ तक पंहुचने देने के पीछे कोई साज़िश रही या इसे महज़ राजनितिक ,प्रशासनिक और ख़ुफ़िया विफलता माना जाये .
एक 22 वर्षीय नौजवान हार्दिक पटेल ,जिसे आप पार्टी का समर्थक बताया जा रहा है और जिसके कारोबारी पिता भरतभाई पटेल भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता है ,जिसकी विश्व हिन्दू परिषद् नेता डॉ प्रवीण भाई तोगड़िया के साथ गर्वीले अंदाज़ की फोटुएं सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है ,इसके पीछे क्या सिर्फ पटेल समुदाय ही है या और भी कुछ ढंकी छिपी ताकतें भी काम कर रही है ? क्या इसे गुजरात में मोदी की कठपुतली मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल के विरुद्ध चल रहे सत्ताच्युत करने की साज़िश का अंग माना जा सकता है या यह पूरा प्रकरण ही गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक चल रहे भाजपाई आन्तरिक कलह का नतीजा है ? इस पर अभी ज्यादा कुछ भी नहीं कहा जा सकता है ,सिर्फ अटकलें लगायी जा सकती  है .
प्रथम द्रष्टया हार्दिक पटेल एक विरोधाभासी व्यक्तित्व का युवा दिखाई पड़ता है ,जिसका एक साफ राजनितिक एजेंडा दिखता है .वह आरक्षण विरोधी लोगों की तरह तर्क देते हुए अपने समुदाय के लिए आरक्षण मांगता दिखाई देता है ,मसलन उसका यह कहना कि –‘ या तो सबको दो अथवा आरक्षण खत्म करो ‘(अक्सर आरक्षण विरोधी यही तर्क इस्तेमाल करते है } .हार्दिक पटेल का मानना है कि –‘ पटेल समुदाय के युवा 90 प्रतिशत अंक होने के बावजूद भी डॉक्टर  की पढाई में दाखिला नहीं ले पाते है ,जबकि आरक्षण के बूते 40 फीसदी नम्बर वाले  भी दाखिला और नौकरी पा जाते है ‘. हार्दिक के इन विचारों में नया कुछ भी नहीं है ,योग्यता तंत्र की बहस के ज़रिये आरक्षण व्यवस्था पर हमला बोलने वाले लोग सदैव यही भाषा इस्तेमाल करते रहे है.दिल्ली में सत्तारूढ़ दोनों सरकारों की विचारधारा कमोबेश आरक्षण पर हार्दिक पटेल जैसी ही है .
हार्दिक पटेल के अन्य बयानों को भी देखा जाना जरुरी है ,उसका यह कहना कि –‘ एक आतंकी के लिए आधी रात को कोर्ट खुल सकती है तो गुजरात के युवाओं के लिए क्यों नहीं ? ‘ यह  भी कि-‘ आतंकियों को बिरयानी और हमें लाठियां मिल रही है ‘. यह प्रवीण तोगड़िया के पुराने भाषणों की नक़ल करने जैसा है .आज तो हार्दिक खुले आम कह रहे है कि –‘अगर सड़क पर उतर कर आन्दोलन कर रहे युवाओं की मांग को पूरा नहीं किया गया तो इनमें से कुछ नक्सली और कुछ आतंकी बन सकते है. ‘  
खैर ,यह भारतीय लोकतंत्र को संख्या बल से धमकाने का बहुलता वाले समुदायों का पुराना शगल है ,बहरहाल हार्दिक पटेल के बयान अरविन्द केजरीवाल और तोगड़िया का अजीब सा सम्मिश्रण उपस्थित करते है ,इनसे अराजकता और साम्प्रदायिकता दोनों की मिलीजुली गंध आती है ,जिसे अगर  जातिवाद का साथ मिल जाये ,तो वह समस्त लोकतान्त्रिक ढांचों को ध्वस्त करने का मंसूबा पालने वाली आत्मघाती राजनीती के विष वृक्ष को पल्लवित और पुष्पित कर सकती है .इन खतरों को नज़र अन्दाज नहीं किया जा सकता है .
हार्दिक पटेल की पटेलों को नौकरियों और प्रवेश में 27 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने की  मांग पर विचार किया जाये तो वह बहुत ही कमजोर है ,भले ही संख्या बल की दृष्टि से यह आज बहुत मजबूत लग रही है ,मगर तार्किक रूप से इस मांग की परिणिति शून्य होने वाली है .कोई भी सरकार गुजराती पटेलों को उनके द्वारा मांगे जा रहे आरक्षण से नहीं नवाज सकती है .संवैधानिक बाध्यताएं अपनी जगह है .क़ानूनी पचड़ों की अभी हम बात नहीं भी करें तो भी किसी भी सरकार के लिए यह कर पाना असम्भव ही लगता है .
यह बहस का विषय हो सकता है कि क्या राजनितिक ,सामाजिक ,शैक्षणिक और धार्मिक तथा आर्थिक रूप से सक्षम पटेल समुदाय को आरक्षण की जरुरत है या यह उन्हें राजनितिक रूप से संगठित करने का एक माध्यम भर है ? वैसे देखा जाये तो पटेल समुदाय गुजरात का सबसे वर्चस्वशाली समाज है ,आबादी के लिहाज़ से अकेला गुजरात की पूरी आबादी का 20 फीसदी है .जमीन पर स्वामित्व को देखें तो अव्वल नम्बर पर है ,कृषि भूमि की सर्वाधिक जोत पर उनका कब्जा है .व्यापार में देखें तो विश्व के हीरा कारोबार के एक तिहाई पर गुजराती पटेल ही काबिज़ है .रियल एस्टेट में उनकी प्रचुर उपस्थिति है ,निजी शिक्षा के संस्थानों पर मालिकाना हक़ में भी उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता है ,गुजरात में सरकारी और गैरसरकारी नौकरियों के 40 प्रतिशत हिस्से पर उनका आधिपत्य है .राजनितिक भागीदारी पर नज़र दौडाएं तो आज़ादी के बाद से ही दोनों प्रमुख राजनितिक दलों में पटेल अच्छी स्थिति में रहे है .देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से लेकर आनंदीबेन पटेल तक पटेल समाज कभी भी राजनितिक रूप से उपेक्षित समुदाय नहीं रहा है .आज भी गुजरात में 40 विधायक और सात मंत्री है और मुख्यमंत्री स्वयं पटेल समुदाय से आती है .कई विश्वविद्यालयों में वाईस चांसलर पटेल है .अहमदाबाद से लेकर अमेरिका तक पटेलों की मौजूदगी आश्चर्यचकित करती है .बावजूद इसके भी इतना संपन्न ,शिक्षित और सक्षम समुदाय अपने लिए आरक्षण मांग रहा है और उसके लिए हिंसक आन्दोलन कर रहा है तो यह देशवासियों की समझ से परे का मामला है .
वैसे देखा जाये तो गुजरात का यह पटेल विद्रोह सिर्फ आरक्षण की मांग का आन्दोलन मात्र नहीं हो कर उससे आगे आकार लेती एक नयी राजनीती का आगाज भी है .इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के बहुप्रचारित दावे की विफलता के रूप में भी देखा जा सकता है कि जब अपने इतना विकास कर दिया फिर भी लोग आरक्षण के ज़रिये अपना विकास चाहते है तब तो अपना गुजरात माडल असफल साबित हुआ .कुछ लोग इसे मोदी और तोगड़िया के मध्य कई बर्षों से चल रहे  शीत युद्ध के विस्फोट  के रूप में भी देख रहे है .कुछ हद तक यह परिघटना अन्ना केजरीवाल द्वारा प्रारम्भ की गयी अराजक राजनीती के बढ़ते खतरों की तरफ भी सोचने को मजबूर कर रही है .पाटीदार अनामत आन्दोलन समिति की आरक्षण की  मांग और हार्दिक पटेल का अचानक उभार प्रवासी गुजरातियों के द्वारा गुजरात की राजनीती में लगाये निवेश किये जाने वाले विदेशी धन के प्रभाव का भी संकेत दे रही है . यह सोशल मीडिया पर सक्रिय युवा पीढ़ी की राजनितिक अभिलाषाओं में हो रही वृद्धि की तरफ भी हमारा ध्यान आकर्षित करती है .
इस आन्दोलन का जीवन कितना होगा ,यह तात्कालिक या दीर्घकालिक होगा या चुनावी राजनीती तक ही इसकी अल्पजिविता होगी ,अभी कुछ भी कह पाना कठिन है .अभी तो यह आवश्यक है कि यह बहुसंख्यक भीड़ का हिंसक आन्दोलन बनने  के बजाय एक लोकतान्त्रिक आन्दोलन बने और संवाद के ज़रिये समस्या का सर्वमान्य एवं विधिसम्मत हल निकल कर आये ताकि वास्तविक गरीब ,वाकई पिछड़े और आरक्षण के असली हक़दार दलित और आदिवासी लोग आरक्षण के खिलाफ बन रहे माहौल से प्रभावित ना हो .हार्दिक पटेल के इस आन्दोलन के निहितार्थों को समझ पाने में अक्षम रही हमारी व्यवस्था को और अधिक ज़िम्मेदार एवं चाक चौबंद होने की भी जरुरत है ,वरना अराजकता का यह गुजराती व्याकरण हमारे लोकतंत्र और पूरी व्यवस्था को ही नेस्तनाबूद कर देगा .अंततः कहीं ऐसा ना हो कि हम वापस कबीलाई और सामंती अथवा फौजी शासनों की ठौकरों तले कराहने को मजबूर हो जाये .इस दिशा में सबको सोचना होगा .
-भंवर मेघवंशी

{लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मानव अधिकार कार्यकर्ता है }
आउटलुक हिंदी डॉटकॉम से साभार